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मौलिक अधिकारों के लिए लड़ी 'एंटीगनी'
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Wed, 21 May 2014 02:09 PM IST
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एंटीगनी के जीवन का फलसफा था कि ‘जुल्म करने वाले से सहने वाला बड़ा गुनहगार है’।
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इसीलिए जब चील-कौवों के नोचने के लिए उसके भाई पॉलिनाइसिस की लाश छोड़ी गई तो वह प्राकृतिक न्याय और मौलिक अधिकारों की खातिर उसे रात में ही दफनाने पहुंच गई।
वह भी बगैर शासकों के डरे। जिन्होंने लाश पर कड़ा पहरा लगा रखा था। एंटीगनी के इसी साहस का मंचन मंगलवार को रायउमानाथ बली प्रेक्षागृह में हुआ।
प्राचीन यूनानी नाटककार सोफोक्लीज के तीन नाटकों की सीरीज के अंतिम नाटक ‘एंटीगनी’ का निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी पुनीत अस्थाना ने किया।
ढाई हजार साल पुराने नाटक को रोचक बनाने के लिए वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जरूरी बदलाव भी किए गए।
निर्देशन में भरपूर कसावट नजर आई। पर अभिनय केस्तर पर कलाकार दर्शकों को बांध नहीं पाया। बड़े-बड़े दृश्यों ने भी दर्शकों को बोर किया। एंटीगनी की भूमिका में दीपिका बोस रहीं।
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इसके अलावा प्रभात बोस, अचला बोस, श्रद्धा बोस, अशोक लाल, तारिक इकबाल, शुभम और आनंद प्रकाश शर्मा ने भी अभिनय किया। मंच का संचालन आमिर मुख्तार ने किया। जबकि नाटक का उर्दू में अनुवाद वासी खान ने किया।
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