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सेक्स या एडोलिसेंट एजुकेशन पर कोर्ट ने मांगा जवाब

Sat, 05 Jul 2014 09:24 AM IST
शत्रुघ्न सिन्हा/अमर उजाला, लखनऊ
शत्रुघ्न सिन्हा/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 05 Jul 2014 09:24 AM IST
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PIL filled against sex education in schools

किशोरावस्था में छात्रों को यौन शिक्षा देने के विवाद के बजाय उन्हें कैशौर्य शिक्षा (एडोलिसेंट एजूकेशन) दिए जाने के अनुरोध वाली एक जनहित याचिका पर हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने केंद्र व राज्य सरकार के साथ अन्य पक्षकारों से जवाब मांगा है। इसके लिए उन्हें दो हफ्ते का वक्त दिया गया है।

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जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा व जस्टिस अश्वनी कुमार सिंह की खंडपीठ ने शुक्रवार को यह आदेश नैतिक पार्टी व एक अन्य की तरफ से दायर पीआईएल पर दिया।

यौन शिक्षा शब्द है आपत्ति

PIL filled against sex education in schools

इसमें 13 से 19 वर्ष के किशोरों के लिए कैशौर्य शिक्षा कार्यक्रम 2005 (एईपी) को प्रभावी ढंग से लागू किए जाने के निर्देश दिए जाने का अनुरोध किया गया है।

याचियों के अधिवक्ता सीबी पांडेय का कहना था कि यौन शिक्षा शब्द उचित नहीं है, क्योंकि इस पर हमेशा ही विवाद रहा है।

लिहाजा इसके स्थान पर स्कूली पाठ्यक्रम में कैशौर्य शिक्षा को शामिल किया जाना चाहिए। इस पर मामले में पक्षकारों की तरफ से जवाब का वक्त दिए जाने का आग्रह किया गया है। इसके लिए कोर्ट ने दो हफ्ते का समय दिया है।

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सेक्स एजुकेशन पर हमेशा हुआ विवाद

PIL filled against sex education in schools

बताते चलें कि स्कूलों में यौन शिक्षा दिए जाने पर हमेशा से ही विवाद होता रहा है। हाल ही में केंद्रीय स्वास्‍थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के सेक्स एजुकेशन को लेकर दिए गए बयान पर बवाल हो गया था।

डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि सेक्स एजुकेशन समाज को लिंग भेदभाव, कम उम्र में प्रेगनेंसी, एचआईवी एड्स और पोर्नोग्राफी का आदी बना दी देती ह‌ै।

हालां कि बाद में केंद्रीय मंत्री ने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा कि यूपीए सरकार की ओर से लागू किया गया सेक्स एजुकेशन प्रोग्राम महज अश्लीलता और आपत्तिनजक तस्वीरों का ग्राफिक के जरिए प्रदर्शन करता है। ये सेक्स एजुकेशन नहीं है।

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