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यूपी में वामदल: कभी जीती थीं 81 सीटें, अब खाता खोलने में छूट रहे पसीने

Fri, 13 Jan 2017 02:35 AM IST
अजीत बिसारिया/अमर उजाला, लखनऊ
अजीत बिसारिया/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 13 Jan 2017 02:35 AM IST
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performance of left parties in Uttar Pradesh.

कभी यूपी विधानसभा में तीसरी सबसे बड़ी ताकत रहे वाम दलों को अब चुनाव में खाता खोलने में भी पसीने छूट रहे हैं। पिछले दो विधानसभा चुनावों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी या भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का कोई भी उम्मीदवार नहीं जीता।

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अर्श से फर्श पर पहुंचने में उनकी खुद की खामियां और कमजोरियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। हालांकि, वाम राजनीति के पुरोधा मानते हैं कि जातिगत और सांप्रदायिक राजनीति ने उन्हें हाशिए पर धकेल दिया, पर अब वे अपना खोया हुआ गौरव पाने की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
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वर्ष 1957 से 2002 के बीच हुए 13 विधानसभा चुनावों में वाम दलों के उम्मीदवार लगातार जीतते रहे। 1969 के चुनाव में तो भाकपा के 80 और माकपा का एक उम्मीदवार जीता था। उस बार कांग्रेस और भारतीय क्रांति दल के बाद विधानसभा में भाकपा का ही नंबर था, लेकिन धीरे-धीरे यह ग्राफ गिरता गया।

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...और इस तरह हाशिये पर चले गए वामदल

performance of left parties in Uttar Pradesh.
माकपा महासचिव सीताराम येचुरी

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि नब्बे के दशक में वाराणसी की जानी-मानी साहूपुरी फर्टिलाइजर्स और बरेली की रबर फैक्ट्री समेत सूबे की काफी छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां बंद हो गईं। इससे ट्रेड यूनियन आंदोलन कमजोर पड़ा।

ट्रेड यूनियन आंदोलन के दौरान प्रदेश में अपनी धाक जमा चुके वाम नेता उसके बाद कोई कारगर मुद्दा नहीं पकड़ सके। उन्होंने जो मुद्दे पकड़े, वे जनमानस को नहीं छू सके। नतीजतन, वाम राजनीति अपना प्रभाव खोती गई।

पिछले 10-15 वर्षों से यह सिलसिला लगातार बना हुआ है। अलबत्ता, प्रदेश में सक्रिय छह वामदलों ने इस बार मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है। उन्होंने सौ सीटों पर 10-15 हजार वोट पाने का लक्ष्य रखा है, ताकि अन्य राजनीतिक दल प्रदेश में उन्हें गंभीरता से लें।

इन दलों के नेताओं का दावा है कि पिछले दो साल से वे विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। इसलिए इस बार कुछ सीटें जरूर जीतेंगे।

फिर दोहराएंगे गौरवशाली इतिहास

performance of left parties in Uttar Pradesh.

इस पर माकपा के राज्य सचिव मंडल के सदस्य बीएल भारती का कहना है कि यह कहना उचित नहीं कि वाम सिद्धांत यहां अपनी प्रासंगिकता खो रहे हैं। हां, यह बात सही है कि लोगों का समर्थन विधानसभा सीटों के रूप में सामने नहीं आया।

इसकी मुख्य वजह अयोध्या विवाद के बाद सांप्रदायिक और जातिगत राजनीति का हावी हो जाना है। लेकिन, अब मतदाताओं को समझ में आने लगा है कि ये उनके असली मुद्दे नहीं हैं।

असली मुद्दे तो रोजी-रोटी, रोजगार, सस्ती शिक्षा और दवाई के हैं, जिनके लिए वाम दल ही संघर्ष कर सकते हैं। इस बार हम विधानसभा के अंदर भी अपने मुद्दे प्रभावशाली ढंग से उठाने की स्थिति में होंगे।

आंकड़ों में देखें यूपी में कैसा रहा वामदलों का प्रदर्शन

performance of left parties in Uttar Pradesh.

विधानसभा चुनाव सीपीआई व सीपीएम को मिलीं सीटें
1957--9
1962--14
1967--14
1969--81

1974--18
1977--10
1980--7
1985--8

1989--8
1991--5
1993--4

1996--5
2002--2
2007--0
2012--0

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