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UP: सियासत के केंद्र में आ गए दलित

Wed, 05 Nov 2014 10:07 PM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 05 Nov 2014 10:07 PM IST
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Parties give Rajya Sabha tickets to Dalit candidate.

राज्यसभा की दो सीटों के लिए दलित उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर बसपा ने साफ कर दिया है कि वह अपनी जड़ों की ओर लौट रही है। इसे लोकसभा चुनाव में दलित वोटरों की नाराजगी को समाप्त कर उन्हें मनाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।

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लोकसभा चुनाव में दलितों ने पूरी तरह बसपा का साथ नहीं दिया। चुनाव नतीजों में इसकी झलक साफ देखी गई। दलित वोटरों को करवट बदलते देख दूसरे दलों की ओर से भी उन्हें रिझाने कोशिशें तेज हुई हैं। अपने पुराने जनाधार को डगमगाते देख बसपा ने दलित उम्मीदवार देकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसे अपनी भूल का एहसास है।
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मायावती शायद इस सच को भी समझती हैं कि यदि यह वर्ग उनसे कटा तो प्रदेश में उनकी सियासी ताकत कमजोर हो जाएगी। पहले विधानसभा, फिर लोकसभा चुनाव और कुछ दिन पहले उपचुनाव में निर्दलीय प्रत्याशियों को समर्थन देने की बसपा की रणनीति जिस तरह फेल हुई है, उससे मायावती सतर्क हो गई हैं।
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वह खुलकर स्वीकार भले न करें, लेकिन उन्हें इस बात का भान जरूर है कि इस तरह की लगातार नाकामी के पीछे बेस वोटर की कहीं न कहीं नाराजगी जरूर है। भले ही वह पार्टी में सवर्णों को ज्यादा तवज्जो देने के नाते ही क्यों न हो?

दलितों को संदेश देने की कोशिश

Parties give Rajya Sabha tickets to Dalit candidate.

शुरू में चर्चा थी कि मायावती दलित वर्ग से राजाराम को टिकट देने के साथ एक टिकट बृजेश पाठक को दे सकती हैं। वजह, मायावती के सबसे नजदीकी सलाहकारों में सतीश चंद्र मिश्र माने जाते हैं। और बृजेश, सतीश चंद्र मिश्र की टीम के प्रमुख सदस्य माने जाते हैं। मायावती ने संभवत: बृजेश पाठक को टिकट न देकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि निर्णय वही लेती हैं। पार्टी हित पर सतीश चंद्र मिश्र भी उन्हें प्रभावित नहीं कर सकते।

कांग्रेस : मायावती के बाद पुनिया सबसे बड़ा दलित चेहरा
सूबे में दलित नेता के रूप में यदि कोई दूसरा नाम सामने आता है तो वह पुनिया का। सूबे में दलितों को जोड़कर 2017 की रणनीति सजाने की राजनीतिक दलों में जिस तरह चालें शुरू हुई हैं, कांग्रेस ने पुनिया को राज्यसभा का प्रत्याशी बनाकर अपना ट्रंप कार्ड चल दिया है। केंद्र में मोदी सरकार आने के बावजूद पुनिया एससी-एसटी आयोग के चेयरमैन बने हैं।

राजग सरकार ने तमाम राज्यपालों को रुखसत कर दिया लेकिन पुनिया को हटाने की हद तक नहीं गई। शायद दलितों में गलत संदेश न जाने के नाते ही भाजपा ने इस ओर से आंखें हटाकर रखी। दूसरा, पुनिया दलितों के मामले में मुखर होकर बोलते भी हैं।

ऐसे में कांग्रेस ने राज्यसभा टिकट के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल व बेनी प्रसाद वर्मा की बनिस्बत पुनिया को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाकर आने वाले दिनों में सूबे की दलित सियासत में पार्टी की मुखर मौजूदगी की चाल चल दी है।

बसपा के हथियार से दलितों पर डोरे

Parties give Rajya Sabha tickets to Dalit candidate.

सपा ने लोकसभा चुनाव में दलितों के बसपा के साथ न जाने का आकलन किया तो उपचुनाव में वह दलितों को साथ जोड़ने की नई रणनीति पर जुट गईं। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने उपचुनाव में बसपा की नामौजूदगी का फायदा उठाया।

उन्हीं के दलों के उन प्रभावशाली लोगों को टिकट दे दिया जो चुनाव तो लड़ना चाहते थे लेकिन बसपा के उपचुनाव न लड़ने की वजह से मैदान से बाहर हो जा रहे थे। इसका नतीजा ये रहा कि बसपा प्रत्याशी के मैदान में न होने से बसपा कैडर का सपा प्रत्याशी पाकर भी दलित वोटर उसके साथ चला गया।

सपा ने लोकसभा चुनाव के झटके से उबरते हए विधानसभा की 13 में से कई सीटों को तो इसी रणनीति से झटक लिया। सपा के रणनीतिकार दलितों के एकमुश्त साथ न आने की हकीकत समझते हुए इस तरह अपने साथ जोड़ने के एजेंडे पर अभी भी काम कर रहे हैं।

भाजपा : दिवाकर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर दिया संदेश

Parties give Rajya Sabha tickets to Dalit candidate.

बसपा के बाद दलितों में यदि किसी की सबसे ज्यादा पैठ मानी जाती है तो वह है भाजपा। वजह, न सिर्फ भाजपा के पास इस वर्ग को जोड़ने के लिए अनुसूचित जाति जनजाति मोर्चा नाम से राष्ट्रीय स्तर का संगठन है बल्कि संघ परिवार का इस वर्ग में बड़ा आधार भी।

लोकसभा चुनाव में दलितों द्वारा भाजपा का साथ देने की हकीकत को शायद ही कोई नजरंदाज कर रहा हो। हाल ही में संघ के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी में राजधानी में दलितों को जोड़ने के लिए जिस जमीनी रणनीति पर चर्चा हुई, भाजपा को भी उससे आगे बड़ी उम्मीदें हैं।

इधर कांग्रेस ने दलित चेहरे के रूप में पीएल पुनिया और बसपा ने राज्यसभा के लिए सिर्फ दलित प्रत्याशियों पर दांव लगाकर संदेश देने की कोशिश की है, भाजपा ने अनुसूचित मोर्चा में सूबे से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर इस वर्ग में संदेश देने की कोशिश की है।

दिवाकर सेठ को भाजपा ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है। वे जाटव समाज से आते हैं और दलितों के बीच अर्से से सक्रिय रहे हैं।

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