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यूपी का रण : योगी समेत सिर्फ तीन सीएम पूरा कर सके पांच साल का कार्यकाल

Mon, 29 Nov 2021 12:15 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Mon, 29 Nov 2021 12:15 PM IST
सार

आजादी के बाद शुरुआती दौर में देश के साथ-साथ प्रदेश की राजनीति में भी कांग्रेस का दबदबा था। उस वक्त भी कांग्रेस के बड़े नेताओं में आपसी खींचतान और गुटबाजी चरम पर थी। पहले मुख्यमंत्री पं. गोविंद वल्लभ पंत ने मई 1952 से दिसंबर 1954 तक बिना किसी कठिनाई के अपना कार्यकाल पूरा किया।

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Only three CMs including Yogi could complete five-year tenure
मायावती - अखिलेश, सीएम योगी आदित्य नाथ

विस्तार

आजादी के बाद से लेकर अब तक यूपी की सियासत काफी उतार-चढ़ाव वाली रही है। 1951 में हुए पहले आम चुनाव से लेकर प्रदेश में अब तक मायावती, अखिलेश यादव व योगी अदित्यनाथ को छोड़कर कोई भी लगातार पांच साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज नहीं रह सका। 2007 में बसपा सुप्रीमो के पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने के साथ प्रदेश में स्थिरता का दौर शुरू हुआ। इसके बाद अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ ने प्रचंड बहुमत के बलबूते अपना दबदबा बनाए रखा। एक दौर वह भी था, जब यूपी की राजनीतिक अस्थिरता किस्से-कहानियों का हिस्सा हुआ करती थीं। बीते करीब 14 वर्षों में स्थिर सरकारों ने इस धारणा को काफी हद तक बदल दिया है।

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आजादी के बाद शुरुआती दौर में देश के साथ-साथ प्रदेश की राजनीति में भी कांग्रेस का दबदबा था। उस वक्त भी कांग्रेस के बड़े नेताओं में आपसी खींचतान और गुटबाजी चरम पर थी। पहले मुख्यमंत्री पं. गोविंद वल्लभ पंत ने मई 1952 से दिसंबर 1954 तक बिना किसी कठिनाई के अपना कार्यकाल पूरा किया। 1954 में पं. गोविंद वल्लभ पंत को दिल्ली बुला लिया गया तो डॉ. संपूर्णानंद को बिना किसी विरोध के नया मुख्यमंत्री चुन लिया गया। हालांकि तब भी कांग्रेस में गुटबाजी खूब थी, लेकिन पं. गोविंद वल्लभ पंत ने इसे सतह पर नहीं आने दिया था। 1957 में दूसरी विधानसभा के चुनाव में भी सत्ता कांग्रेस के  हाथ आई। 

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डॉ. संपूर्णानंद दोबारा मुख्यमंत्री बने। उधर, पं. कमलापति त्रिपाठी और चंद्रभानु गुप्ता की महत्वाकांक्षाएं भी हिलोरें मार रही थीं। इन नेताओं के विरोध के कारण डॉ. संपूर्णानंद को दिसंबर 1960 में पद से हटना पड़ा। इसके बाद चंद्रभानु गुप्ता शेष कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री बने। 1962 में तीसरी विधान सभा के चुनाव में भी कांग्रेस जीती और चंद्रभानु गुप्ता फिर मुख्यमंत्री बने, लेकिन पार्टी के अंदर विरोध के चलते उन्हें हटाकर अक्तूबर 1963 में सुचेता कृपलानी को मुख्यमंत्री बनाया गया। इस दौर के सियासत की खास बात यह थी कि जबरदस्त गुटबाजी के बावजूद सत्तारूढ़ दल में किसी तरह की टूट-फूट नहीं हुई और तीनों विधानसभाओं ने अपना कार्यकाल पूरा किया।

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चौथी विधानसभा से शुरू हुआ अस्थिरता का दौर
मार्च 1967 में चौथी विधानसभा के गठन के साथ ही प्रदेश में अस्थिरता और टूट-फूट का दौर भी शुरू हो गया था। चौ. चरण सिंह कांग्रेस में अपनी स्थिति से खुश नहीं थे। चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी और किसानों व पिछड़ों को लामबंद करने में लग गए। 


1967 के विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस बड़ी मुश्किल से बहुमत तक पहुंच पाई। चौ. चरण सिंह ने चंद्रभानु गुप्ता को सीएम बनाने का विरोध करते हुए पार्टी तोड़ दी। उनके साथ कांग्रेस के 16 विधायक भी आ गए। चंद्रभानु गुप्ता सरकार अल्पमत में आ गई और 14 मार्च 1967 से 2 अप्रैल 1967 तक महज 19 दिन मुख्यमंत्री रहने के बाद उनको हटना पड़ा। 


इस प्रयोग को संविद सरकार नाम दिया गया। विचारधारा के अंतर्विरोधों की वजह से चौ. चरण सिंह सरकार एक साल भी नहीं चल पाई। वे 3 अप्रैल 1967 से 25 फरवरी 1968 तक मुख्यमंत्री रहे। उनके इस्तीफा देने के बाद 1968 में प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। यूपी के राजनीतिक इतिहास में यह पहली विधानसभा थी जो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थी।


पांचवीं विधानसभा में पांच सीएम
पांचवीं विधानसभा इस लिहाज से भी याद की जाएगी कि इसमें पांच मुख्यमंत्री बने। 1969 में पांचवीं विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस 425 में से 211 सीटें ही जीत पाई थी। स्पष्ट बहुमत पाने में नाकाम कांग्रेस ने जोड़-तोड़ करके चंद्रभानु गुप्त को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन एक साल में ही उन्हें हटना पड़ा। चौ. चरण सिंह मुख्यमंत्री बने। वह भी 8 महीने ही सीएम रह पाए। फिर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। कांग्रेस ने अक्तूबर 1970 में जोड़-तोड़ करके त्रिभुवन नारायण सिंह के नेतृत्व में फिर सरकार बनाई। करीब साढ़े तीन महीने बाद हटाकर पं. कमलापति त्रिपाठी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। वह भी बमुश्किल सवा दो साल ही सीएम रह पाए। फिर राष्ट्रपति शासन लगा। इसके बाद हेमवती नंदन बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया गया। वह नवंबर 1973 से मार्च 1974 तक मुख्यमंत्री रहे।

कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी गठजोड़ नाकाम
मार्च 1974 में छठवीं विधानसभा का गठन हुआ। कांग्रेस 215 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। हेमवती नंदन बहुगुणा 5 मार्च 1974 को फिर सीएम बने। वह 29 नवंबर 1975 तक मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद 21 जनवरी 1976 से 30 अप्रैल 1977 तक नारायण दत्त तिवारी प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इस बीच कांग्रेस के खिलाफ मजबूत विकल्प के लिए संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी व भारतीय क्रांति दल का विलय करके भारतीय लोक दल की स्थापना हुई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाई इमरजेंसी के बाद विपक्ष एकजुट होकर जनता पार्टी के रूप में 1977 के चुनाव में उतरा। केंद्र व प्रदेश से कांग्रेस का सफाया हो गया। जनता पार्टी को 352 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस महज 47 पर ही सिमट गई। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहली बार 23 जून 1977 को पिछड़ी जाति के राम नरेश यादव बैठे। घटक दलों की आपसी फूट के कारण वह पौने दो साल ही मुख्यमंत्री रह पाए। 28 फरवरी 1979 को बाबू बनारसी दास को मुख्यमंत्री बनाया गया। जनता दल के घटक दलों के अंतर्विरोधों के कारण फरवरी 1980 में बाबू बनारसी दास को इस्तीफा देना पड़ा।

फिर हुई कांग्रेस की वापसी
1980 में हुए आठवीं विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस की फिर 309 सीटों के साथ जबर्दस्त वापसी हुई। विपक्ष सवा सौ सीटें भी नहीं हासिल कर सका। 9 जून 1980 से 19 जुलाई 1982 तक विश्वनाथ प्रताप सिंह, 19 जुलाई 1982 से 2 अगस्त 1984 तक श्रीपति मिश्र, 3 अगस्त 1984 से 10 मार्च 1985 तक नारायण दत्त तिवारी प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। 1985 में नौवीं विधानसभा चुनाव में भी यह सिलसिला जारी रहा। कांग्रेस 269 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत लेकर आई। नौवीं विधानसभा में पहले नारायण दत्त तिवारी, फिर वीर बहादुर सिंह और उसके बाद फिर नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने। 1989 से लेकर 2007 तक कोई भी मुख्यमंत्री पांच साल पद पर नहीं रह सका। 2007 में पूूर्ण बहुमत से आईं मायावती ने पहली बार पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

सिन्हा बोले, फोन रखो...

किस्सा 2017 के चुनाव का है। सभी को याद होगा कि विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री के लिए मनोज सिन्हा का नाम काफी तेजी से चला था। वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र भट्ट बताते हैं कि उन्हें सिन्हा के नजदीकी एक व्यक्ति ने बताया था कि यह चर्चा चलने पर मनोज सिन्हा ने अपने एक पुराने ज्योतिषी को फोन लगाया। वह यह जानना चाहते थे कि भविष्य के लिए उनकी क्या स्थिति है। कुछ देर बाद उधर से फोन आया। ज्योतिषी ने कहा-भाई साहब अभी योग नहीं दिख रहा है। जाहिर है कि सिन्हा को इस बात से काफी झटका लगा था। नाराजगी भरे लहजे मेंे उन्होंने ज्योतिषी से कहा, फोन रखो।
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