'मैंने माफ किया, पर किसी और के साथ ऐसा न करना'
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मैंने माफ कर दिया...। पर मेरे साथ जो हुआ, किसी और के साथ मत करना। शायद किसी वजह से गुस्से में रहा होगा...। उनको अपने किए की सजा मिल गई। गलती का एहसास भी होगा...। गलती हो गई...। उसके भी बीवी-बच्चे हैं...। इतना कहते बुजुर्ग किशन कुमार की आंखें छलक पड़ीं। किशन कुमार के साथ दरोगा प्रदीप कुमार ने शनिवार को बदसुलूकी की थी। लात चलाए...।
पिता ओम प्रकाश का गिफ्ट दिया टाइपराइटर तोड़ दिया...। पर इतनी जिल्लत के बावजूद किशन कुमार के ये शब्द बताते हैं कि वे एक पिता हैं। एक पति हैं। जिंदगी के कई उतार-चढ़ाव देखे, इसलिए दूसरों की पीड़ा जानते हैं।
गोमतीनगर के विरामखंड निवासी 65 वर्षीय किशन कुमार बदसुलूकी के सवाल पर कहते हैं- सचिवालय चौकी इंचार्ज प्रदीप कुमार कई बार पहले भी धमकियां दे चुके थे। फुटपाथ खाली कराने को लेकर कई बार चेतावनी दी। पर नहीं सोचा था कि इस तरह किसी दिन बदसुलूकी करेंगे।
मैं खुशनसीब हूं कि वहां मीडिया वाले मौजूद थे। मुख्यमंत्री ने सुन ली तो डीएम-एसएसपी भी मेरे घर पहुंच गए। नई मशीन दे गए। मैं खुश हूं। मेरी जिंदगी पटरी पर लौट आई है। दरोगा प्रदीप कुमार से गलती हो गई। उनके भी पत्नी-बच्चे होंगे। शायद उन्हें जीवन का सबसे बड़ा सबक मिला है, इस घटना के बाद।
अपनी गलती का एहसास होगा उसके भी पत्नी-बच्चे परेशान होंगे
मैंने डीएम व एसएसपी से कहा है साहब, कठोर कार्रवाई मत करना। डीएम और एसएसपी साहब मुझसे बोल गए थे कि कोई भी समस्या हो तो सीधे हमारे पास चले आना। काश! हर गरीब को ऐसे मददगार मिलें।
अफसरों के पास वे सीधे पहुंच सकें और अपना दुखड़ा उन्हें सुना सकें। मैंने डीएम-एसएसपी से भी कहा-साहब प्रदीप कुमार के खिलाफ कठोर कार्रवाई मत करना। गोमतीनगर के ईडब्ल्यूएस कॉलोनी में रविवार को किशन कुमार की ही चर्चा होती रही।
रविवार को सुबह से ही उसके घर पर मोहल्ले वालों का तांता लगा रहा। कॉलोनी के लोग अपनी खिड़कियों से झांक-झांककर वहां पर आने वाले अधिकारियों और मीडिया कर्मियों की गाड़ियों को निहारते रहे। कॉलोनी के लोगों का कहना है कि साइकिल से चलने वाले किशन कुमार अब उनके लिए वीवीआईपी बन चुके हैं।
मदद के लिए बढ़े हाथ
पुराना टाइपराइटर तोड़ने और बदसुलूकी की घटना के बाद सुर्खियों में आए किशन कुमार की मदद में शहर ही नहीं बल्कि देशभर के लोगों के हाथ बढ़ गए। उन्होंने किशन कुमार के मोबाइल पर फोन करके अकाउंट नंबर तक मांगे। सुबह से लगभग पांच अलग अलग जगह पर किशन कुमार को सम्मानित करने का कार्यक्रम चलता रहा।
टाइपराइटर से दिनभर की मेहनत के बाद किशन कुमार रोज 100 से 150 रुपये तक कमा लेते हैं। एक पेज का 10 रुपये के हिसाब से कभी 10 तो कभी 15 पेज का काम मिल जाता है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1980 में डेढ़ से दो रुपये रोज मिल जाते थे। इतना बहुत था।
अब शायद कंप्यूटर का दौर है। हिंदी की पूछ कम हो गई है या फिर कोई और वजह, बहुत कम ही लोग टाइपराइटर को पसंद करते हैं। शायद इसीलिए दरोगा ने भी उसकी कद्र नहीं समझी और अतिक्रमण हटाने के नाम पर उसे तोड़ डाला।