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बड़ा सवाल: इन घोटालों को क्यों छिपा रहे हैं अखिलेश?

Thu, 25 Sep 2014 10:55 AM IST
अजित बिसारिया/अमर उजाला, लखनऊ
अजित बिसारिया/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 25 Sep 2014 10:55 AM IST
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officers do scam on fee policy.

केस एक: गोरखपुर के तत्कालीन जिला पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारी ने शुल्क प्रतिपूर्ति की राशि नोशनल एकाउंट से निकालकर अपने खाते में डाल ली। इस गैरकानूनी काम में डीलिंग क्लर्क की भी मिलीभगत थी। बाद में इस रकम को ठिकाने लगा दिया गया। दोनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, मगर गिरफ्तारी अभी तक किसी की नहीं हुई है। यह गड़बड़ 2012-13 में की गई थी।

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खास बात यह कि तत्कालीन जिला पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारी जगन्नाथ पांडे डेपुटेशन पर आए हैं। उनका मूल विभाग उत्तराखंड का शिक्षा विभाग है। डीलिंग क्लर्क भी ग्राम्य विकास विभाग से डेपुटेशन पर आया था। बाबू तो सस्पेंड कर दिया गया, मगर जगन्नाथ पांडे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है। तब से वह फरार है।
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केस दो: गौतमबुद्ध नगर में शुल्क प्रतिपूर्ति में 11 करोड़ रुपये का घपला सामने आया। एक छात्र के खाते में कई बार धनराशि भेजी गई। 21 अगस्त को तत्कालीन जिला पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारी, तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी, तत्कालीन अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी और बैंक कर्मियों समेत 76 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई।
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लेकिन इतने बड़े गबन में एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई और लगातार मामला दबाने की कोशिश हो रही है। 1718 फर्जी लाभार्थी दिखाकर यह धनराशि हड़पी गई। जानकारों के अनुसार अगर निष्पक्ष जांच कराई जाए तो ऐसे सैकड़ों और मामले इसी जिले में सामने आएंगे।

डीएम को सौंपी जांच पर नतीजा कुछ नहीं

officers do scam on fee policy.

शुल्क की भरपाई में करोड़ों का हेरफेर सामने आने पर राज्य सरकार ने नई नियमावली तो बना ली लेकिन सरकारी खजाने को चूना लगाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई पर अभी तक किसी का ध्यान नहीं है।

इस गोलमाल में शामिल अधिकारी, कर्मचारी और संस्थान चलाने वालों का त्रिकोण अभी टूटा नहीं है। आरोपी अधिकारी, कर्मचारी और लाभार्थी खुलेआम घूम रहे हैं। ऐसे में यह आशंका भी वाजिब है कि इन हालात में नई नियमावली का तोड़ भी घपलेबाज अफसर और कर्मचारी निकाल ही लेंगे।

पिछले साल राज्य सरकार के महाधिवक्ता ने भी हाईकोर्ट में स्वीकार किया कि लखनऊ और गाजियाबाद में शुल्क की प्रतिपूर्ति में घपले हुए।

लखनऊ में तो डीएम को जांच भी सौंपी गई, मगर इसका नतीजा आज तक कुछ नहीं निकला। इससे संबंधित मामलों की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा था कि यूपी में छात्रों को दी जा रही यह सुविधा पूरी तरह से अफसरों की मनमानी का शिकार हो गई है।

दो साल में हड़प लिए 30 करोड़ रुपये

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कहीं ज्यादा आय वर्ग के छात्रों के शुल्क की भरपाई कर दी जाती है तो कहीं कम आय वर्ग वाले छात्र इससे वंचित रह जाते हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार को पारदर्शी व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए थे।

इसी का नतीजा है कि राज्य सरकार ने शुल्क प्रतिपूर्ति के नियमों में भारी बदलाव करते हुए नई नियमावली जारी कर दी। इसमें शुल्क की भरपाई की अधिकतम सीमा 50 हजार रुपये तय की गई है। पारदर्शिता लाने के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं।

पिछले दो-तीन साल में अलग-अलग जिलों में सामने आए घपलों के दर्जनों मामलों में एफआईआर तो दर्ज करा दी गई, मगर आगे की कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ। मसलन, पिछले दो वर्ष में गौतमबुद्ध नगर, हापुड़ और गोरखपुर में ही शुल्क प्रतिपूर्ति मद के करीब 30 करोड़ रुपये अफसरों की मिलीभगत से हड़प लिए गए हैं।

इन जिलों में अफसरों ने निदेशालय और एनआईसी स्तर से जारी लाभार्थियों की सूची को दरकिनार करते हुए फर्जी सूची बनाई और उसी के आधार पर पेमेंट कर दिया।

जेल भेजे गए बैंक कर्मचारी

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गौतमबुद्ध नगर व गोरखपुर में पिछड़ा वर्ग कल्याण निदेशालय ने एफआईआर दर्ज कराई, जबकि हापुड़ में डीएम ने मामला पुलिस को सौंपा। हैरत की बात यह कि भ्रष्टाचार के इन मामलों में एक भी अफसर सलाखों के पीछे नहीं पहुंचा।

अलबत्ता हाथरस में हुआ घपला मीडिया में काफी उछलने पर पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग और बैंक के कर्मचारी जरूर जेल भेजे गए। ऐसे मामले कई और जिलों में भी सामने आए।

दोषी जिलास्तरीय अधिकारियों, छात्रों और शिक्षण संस्थानों के खिलाफ एफआईआर जरूर दर्ज करा दी गई मगर हकीकत यह है कि इन्हें दंड दिलाने में निदेशालय स्तर के अफसर भी रुचि नहीं ले रहे। इसके पीछे राजनीतिक दबाव भी बताया जाता है।

सही बात तो यह कि शुल्क प्रतिपूर्ति की धनराशि राज्य मुख्यालय ट्रेजरी से सीधे छात्रों के खाते में भेजने का विरोध समाज कल्याण निदेशालय के अधिकारियों ने ही किया। यही कारण है कि नई नियमावली-2014 निदेशालय स्तर पर तैयार नहीं हुई, जबकि इस तरह के नियम- कायदों की ड्राफ्टिंग निदेशालय स्तर पर ही करने की परिपाटी रही है।

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