सरकार को कर्मचारी विरोधी साबित करने में जुटे सरकार के ही कई अफसर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रदेश के कई अफसर योगी सरकार को कर्मचारी विरोधी साबित करने पर तुल गए हैं। सरकार के फैसलों पर कुंडली मारने की प्रवृत्ति और पारंपरिक निर्णयों को भी अटकाने की चलन बढ़ती जा रही है। दिवाली के पहले बोनस भुगतान लटकाने सहित कई मुद्दों पर निर्णय न होने से कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। अब तक जुलाई में बढ़े कर्मचारियों के 2 फीसदी डीए और पेंशनरों की महंगाई राहत का भी भुगतान नहीं किया गया है।
योगी सरकार ने 2017 में सत्ता संभाली और सरकारी खजाने से एकमुश्त 36 हजार करोड़ रुपये किसानों की कर्जमाफी के लिए खर्च किया। बजट पर इतने बड़े भार के बावजूद सरकार ने कर्मचारियों का दिवाली बोनस नहीं रोका था।
2017 में सरकार ने दिवाली से एक सप्ताह पहले बोनस देने का आदेश जारी हुआ था। इस बार सरकार के सामने ऐसी कोई विकट चुनौती नहीं है। 7 नवंबर को दिवाली है, लेकिन अफसरों ने बोनस भुगतान पर अब तक कोई निर्णय नहीं लिया है। इससे बोनस की श्रेणी वाले प्रदेश के करीब 16 लाख कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
नई पेंशन पर भी ऊपर के निर्देश का इंतजार करते रहे अफसर
नई पेंशन की जगह पुरानी पेंशन की मांग कर रहे कर्मचारियों की नाराजगी बढ़ाने में अफसरशाही का ही बड़ा योगदान रहा है। नई पेंशन में ‘प्रान’ रजिस्ट्रेशन और अंशदान की अदायगी की स्पष्ट व्यवस्था के बावजूद सही कार्यवाही नहीं की गई।
कर्मचारियों ने इस मुद्दे को उठाया तब भी विभागीय अफसरों ने चुप्पी साधे रखी। प्रान रजिस्ट्रेशन और बकाया अंशदान अदायगी का निर्देश तब जारी किया गया जब उच्च स्तर से इसके आदेश दिए गए। हड़ताल पर उतारू कर्मचारियों को मनाने के लिए मुख्य सचिव से लेकर मुख्यमंत्री को भी मशक्कत करनी पड़ी।
मुख्य सचिव समिति का गठन अब तक नहीं
राज्य वेतन समिति भंग होने के बाद सरकार कर्मचारियों की वेतन विसंगतियों को दूर करने के लिए मुख्य सचिव समिति का गठन करती है। वित्त विभाग इस समिति का गठन कराता है। फरवरी में रिपोर्ट सौंपने के साथ ही समिति की भूमिका खत्म हो गई। कर्मचारी संगठन इसके बाद वेतन विसंगतियों पर निर्णय के लिए शासन में विभिन्न स्तर पर गुहार लगा रहे हैं। मुख्य सचिव भी कई संगठनों के मामलों को मुख्य सचिव समिति को संदर्भित करने का निर्देश दे चुकेहैं। लेकिन विभाग मुख्य सचिव समिति के गठन की कार्यवाही पर कुंडली मारे बैठा हुआ है। वेतन विसंगतियों पर भी निर्णय का फोरम न होने से कर्मचारियों में जबर्दस्त नाराजगी है।
कर्मचारियों के लिए बनी कमेटी का पुनर्गठन अटका
प्रदेश सरकार ने विभिन्न सेवा संघों की मांगों पर विचार कर निर्णय के लिए 27 जुलाई 2017 को अपर मुख्य सचिव संजय अग्रवाल की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति बनाई थी। समिति को जिम्मेदारी दी गई थी कि वह विभिन्न सेवा संघों से उनकी मांगों के संदर्भ में विचार-विमर्श करेगी और समस्याओं का निराकरण कराएगी। जरूरत पर अपनी सिफारिश भी मुख्य सचिव को भेजेगी। समिति की बैठक की प्रक्रिया भी तय थी। लेकिन, अपर मुख्य सचिव अग्रवाल को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गए एक माह बीत गए हैं। फिर भी कमेटी का अब तक पुनर्गठन नहीं किया गया। कर्मचारी मांगों के लिए सीधे मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री तक दौड़ लगाने को मजबूर हैं।
लेखपालों की मांगों की फाइल भी अटकी
लेखपाल संघ ने तीन से 17 जुलाई तक हड़ताल की। कई दौर की वार्ता के बाद कई अहम मांगों पर एक माह में कार्यवाही की बात तय हुई। लेकिन, करीब साढ़े तीन माह बाद भी कई मांगों की फाइल घूम रही है। दरअसल, कर्मचारियों की मांगों की फाइलें तभी खुलती हैं जब सीएम या मुख्य सचिव स्तर पर बैठकें होनी होती है। जिन प्रकरण में निर्णय भी हुए हैं वे इतने अस्पष्ट हैं कि कर्मियों को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। अंतर्जनपदीय तबादला आदेश होने के बावजूद अब तक कार्यवाही नहीं शुरू हुई है। आय-जाति, निवास प्रमाणपत्र जारी करने के लिए पांच रुपये के भुगतान का शासनादेश भी अटका है। दो साल पहले नियुक्त हुए प्रशिक्षु लेखपालों की विभागीय परीक्षा हुए चार महीने बीत गए लेकिन रिजल्ट अब तक नहीं जारी हुआ है। इसी तरह काफी मशक्कत के बाद स्मार्टफोन की खरीद तो हो गई है, लेकिन लैपटॉप देने की कार्यवाही अटकी हुई है।