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Lucknow News: अब एक दिन में पूरी हो जाती है मतगणना
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पहले शिफ्टवार लगते थे कर्मचारी, टेंट लगाकर समर्थकों संग मौजूद रहते थे उम्मीदवार
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रावस्ती। लोकसभा चुनाव में मतगणना पहले से अब आसान हो गई है। पहले जहां एक-एक लोकसभा क्षेत्र की मतगणना तीन से चार दिनों तक होती थी। वहीं रुझान जानने के लिए समर्थकों संग प्रत्याशी टेंट लगाकर वहीं मौजूद रहते थे। भंडारा चलता था। कर्मचारी भी शिफ्टवार मतगणना करते थे। वहीं उन्हें लंच पैकेट मिलता था। मतगणना पूरी करने के लिए बकायदा टेंट लगाए जाते थे। वहीं अब चंद घंटों में ही मतगणना पूरी करके पूरे देश का रुझान मिल जाता है।
पहले से आसान हो गई मतगणना
मतगणना तो अब बहुत आसान हो गई है। इसी के साथ व्यवस्था भी पारदर्शी हो गई है। लोग मतगणना कार्मिकों पर संदेह की उंगली नहीं उठा पाते। जबकि 15 वर्ष पहले तक हालात अलग थे। मतगणना के लिए शिफ्टवार ड्यूटी लगती थी। पहले अलग-अलग बैलेट पेपर छांटे जाते थे। फिर सौ-सौ की गड्डी बनती थी। इस गड्डी को एकत्र कर एक हजार की गड्डी बनाई जाती थी। बाद में दस हजार का बंडल बनाकर रखा जाता था। ताकि गणना में आसानी रहे। -डाॅ. जीसी लाल
मतपत्रों की छंटाई व बंडल बनाने में लगता था समय
पहले मतगणना के लिए चैलेंज होता था मतपत्रों को छांटना। अक्सर धोखे से मतपत्र का स्थान बदल जाता था तो एजेंट शोर मचाने लगते थे। कभी-कभी तो मोहर बॉर्डर लाइन पर लगने के कारण चैलेंज होता था। सबसे ज्यादा समय मतपत्रों की छंटाई व बंडल बनाने में लगता था। इसी बंडल के कारण अक्सर आरोप भी लगते थे। एजेंट व हारा हुआ प्रत्याशी हमेशा यही कहता था कि उसके बंडल 110 के बने व जीतने वाले का 90 का बना। पहले मतगणना में बहुत समय लगता था, लेकिन अब चंद घंटों का काम है। -कृष्ण बहादुर मिश्रा, समाजसेवी
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रावस्ती। लोकसभा चुनाव में मतगणना पहले से अब आसान हो गई है। पहले जहां एक-एक लोकसभा क्षेत्र की मतगणना तीन से चार दिनों तक होती थी। वहीं रुझान जानने के लिए समर्थकों संग प्रत्याशी टेंट लगाकर वहीं मौजूद रहते थे। भंडारा चलता था। कर्मचारी भी शिफ्टवार मतगणना करते थे। वहीं उन्हें लंच पैकेट मिलता था। मतगणना पूरी करने के लिए बकायदा टेंट लगाए जाते थे। वहीं अब चंद घंटों में ही मतगणना पूरी करके पूरे देश का रुझान मिल जाता है।
पहले से आसान हो गई मतगणना
मतगणना तो अब बहुत आसान हो गई है। इसी के साथ व्यवस्था भी पारदर्शी हो गई है। लोग मतगणना कार्मिकों पर संदेह की उंगली नहीं उठा पाते। जबकि 15 वर्ष पहले तक हालात अलग थे। मतगणना के लिए शिफ्टवार ड्यूटी लगती थी। पहले अलग-अलग बैलेट पेपर छांटे जाते थे। फिर सौ-सौ की गड्डी बनती थी। इस गड्डी को एकत्र कर एक हजार की गड्डी बनाई जाती थी। बाद में दस हजार का बंडल बनाकर रखा जाता था। ताकि गणना में आसानी रहे। -डाॅ. जीसी लाल
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मतपत्रों की छंटाई व बंडल बनाने में लगता था समय
पहले मतगणना के लिए चैलेंज होता था मतपत्रों को छांटना। अक्सर धोखे से मतपत्र का स्थान बदल जाता था तो एजेंट शोर मचाने लगते थे। कभी-कभी तो मोहर बॉर्डर लाइन पर लगने के कारण चैलेंज होता था। सबसे ज्यादा समय मतपत्रों की छंटाई व बंडल बनाने में लगता था। इसी बंडल के कारण अक्सर आरोप भी लगते थे। एजेंट व हारा हुआ प्रत्याशी हमेशा यही कहता था कि उसके बंडल 110 के बने व जीतने वाले का 90 का बना। पहले मतगणना में बहुत समय लगता था, लेकिन अब चंद घंटों का काम है। -कृष्ण बहादुर मिश्रा, समाजसेवी
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