वाह जी वाह! वेतन सरकार से नियम इसरो के
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ऐसे में साइंस और टेक्नोलॉजी विभाग के तहत संचालित इस सेंटर में काम करने वालों को वेतन तो प्रदेश सरकार से मिलता है, लेकिन उसके नियम-कायदे यहां लागू नहीं होते।
सेंटर की गवर्निंग बॉडी की मंजूरी से ही सभी काम हो जाते हैं। शासन अब जल्द से जल्द नई नियमावली लागू करना चाहता है। बहरहाल नई नियमावली को संबंधित विभागों के पास उनके राय-मशविरा के लिए भेज दिया गया है।
उनकी राय आने के बाद इसे कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। वहां से मंजूरी मिलने के बाद इसे लागू कर दिया जाएगा।
सन् 1985 में
तत्कालीन मुख्यमंत्री की अनुमति से रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर की
स्थापना की गई थी। प्रमुख विभागों की मंजूरी लेकर इस सेंटर को शुरू कर दिया
गया। उस वक्त इसके लिए कैबिनेट की अनुमति भी नहीं ली गई।
सेंटर की शुरुआत
के समय यहां इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) के कुछ नियम लागू किए
गए, जो अब भी लागू हैं।
हालांकि करीब तेरह साल पहले इसरो केनियमों को
हटाने की पहल की गई थी और गवर्निंग बॉडी ने इसे मंजूर भी कर लिया था, लेकिन
शासन और सरकार में बैठे लोगों को रिमोट सेंसिंग सेंटर के अधिकारियों ने
मैनेज कर लिया।
रिमोट सेंसिंग सेंटर में
अभी तक जितने भी निदेशक नियुक्त हुए, उन्होंने अपने राजनैतिक आकाओं को खुश
रखा और उनका ज्यादा ध्यान इसमें रहा कि नियमावली न बने।
ऐसे में न तो
नियमावली बनी और न ही सरकार ने इसका बजट रोका। शासन भी चुप्पी साधे रहा।
असल में सेंटर के अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं और उपाध्यक्ष के पद पर
सत्ताधारी पार्टी के खास लोगों की नियुक्ति होती है।