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तब नहीं पड़ेगी जरुरत एंजलीना की तरह मैस्टेक्टॉमी सर्जरी की
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Mon, 10 Feb 2014 12:22 PM IST
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हॉलीवुड की टांब रेडर ‘एंजलीना जॉली’ को ब्रेस्ट कैंसर की वजह से जब मैस्टेक्टॉमी सर्जरी का चयन करना पड़ा।
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इस घटना ने हाल ही में पूरे देश के वैज्ञानिक और कैंसर स्पेशलिस्ट का ध्यान मैस्टेक्टॉमी की तरफ खींचा। डॉक्टरों का कहना है कि अगर शुरुआती स्टेज में ब्रेस्ट कैंसर का पता किया जा सके।
इसके बाद ब्रेस्ट कंजर्वेशन ट्रीटमेंट से स्तन को दुबारा कॉस्मेटिक सर्जरी से पुरानी शेप में लाया जा सकता है।
एसजीपीजीआई के एंडोक्राइनोलॉजी एंड ब्रेस्ट सर्जरी विभाग की कार्यशाला में अंतिम दिन रविवार को बेस्ट कंजर्वेशन ट्रीटमेंट और आंकोप्लास्टिक ब्रेस्ट सर्जरी पर विशेषज्ञों ने चर्चा की।
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पैनल डिस्कशन में चेयरपर्सन पीजीआई के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजीव अग्रवाल ने बताया कि कैंसर की सर्जरी के समय खराब टिश्यूज को निकाल देते हैं। इससे ब्रेस्ट की शेप बिगड़ जाती है।
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इसके चलते कपड़े पहनने में समस्या से लेकर एक महिला के लिए बड़ी असामान्य स्थिति बन जाती है। डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, मैस्टेक्टॉमी में ब्रेस्ट को हटाने की प्रक्रिया होती है।
वहीं, ब्रेस्ट कंजर्वेशन ट्रीटमेंट में कॉस्मेटिक सर्जरी से इसे रीकंस्ट्रक्ट किया जाता है। इसमें पेट या दूसरे हिस्सों से टिश्यू लेकर ब्रेस्ट बनाया जाता है।
इस सर्जरी में ब्रेस्ट के निपल को भी बनाने में सफलता मिल चुकी है। हालांकि, यह सर्जरी अभी महंगी है।
महिलाओं की मांग को देखते हुए यह विकल्प ब्रेस्ट कैंसर के ट्रीटमेंट के समय दिया जाता है। इस सर्जरी की अभी अपनी सीमाएं हैं।
अंतिम स्टेज में आई मरीज के ब्रेस्ट को दुबारा नहीं बनाया जा सकता है। इसके बाद मैस्टेक्टॉमी कर ब्रेस्ट को अलग करना ही सुरक्षित तरीका माना जाता है।
ब्रेस्ट कंजर्वेशन ट्रीटमेंट अभी केवल शुरूआती स्टेज में डायग्नोसिस होने के बाद ही किया जा सकता है। ऐसे में सलाह दी जाती है कि 40 वर्ष की उम्र पूरी करने पर ब्रेस्ट में गांठ होने पर मैमोग्राम टेस्ट जरूर करा लें।
सेंटीनल बायोप्सी बचाएगी जान
एम्स में कैंसर विशेषज्ञ डॉ. अनुराग श्रीवास्तव ने बताया कि कभी-कभी ब्रेस्ट कैंसर के समय गांठ बगल की गिल्टी (एक्सिला ) तक पहुंच जाती है।
इसके साइड इफैक्ट की वजह से हाथ में सूजन बढ़ने लगती है। कभी-कभी तो हाथ तक उठाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में एक्सिला मैनेजमेंट बहुत जरूरी हो जाता है। इसमें एक इंजेक्शन देकर इसका असर देखा जाता है।
अगर इसमें अंतर आ रहा है तो फिर सेंटीनल नोड बायोप्सी कराने की सलाह दी जाती है। सेंटीनल नोड ब्रेस्ट और एक्सिला के बीच में चौकीदारी का काम करता है। इससे पता चलता है कि क्या कैंसर के जीन वहां प्रभावित कर चुके हैं।
मॉलीक्यूलर प्रोफाइलिंग से प्रभावी होगा इलाज
नेशनल यूनीवर्सिटी हेल्थ सिस्टम, सिंगापुर में कैंसर विशेषज्ञ डॉ. माइकल हार्टमैन ने बताया कि ब्रेस्ट कैंसर केवल बीमारी भर नहीं है।
इसकी मॉलीक्यूलर प्रोफाइलिंग से पता चला है कि यह 960 प्रकार का होता है। यह ब्रेस्ट कैंसर में बड़ा अंतर है।
इससे इलाज का तरीका बदल सकता है। इस बीमारी पर अब शोध चल रहा है। जल्द ही हम मरीजों में अंतर कर उनका प्रभावी इलाज खोज सकेंगे।
इस प्रोफाइलिंग से पता चल सकेगा कि कौनसी दवा किसी टाइप के ब्रेस्ट कैंसर पर असरदार हो रही है। इसके अलावा सर्जिकल ट्रीटमेंट में भी अंतर आ जाएगा।