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राममंदिर को भूले मोदी, याद आया रामराज
अखिलेश वाजपेई/लखनऊ
Updated Fri, 20 Dec 2013 11:06 PM IST
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नरेन्द्र मोदी की काशी रैली भी हो गई। उन्होंने शुक्रवार को इस धरती पर गुजरात के सोमनाथ को काशी-विश्वनाथ की धरती से जोड़ा।
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संकट मोचन से लेकर काशी विश्वनाथ के दरबार में माथा टेंका। मंच पर आए तो गंगा की गरिमा के सहारे लोगों को भारतीय संस्कृति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताने की कोशिश की।
राममंदिर के बजाय रामराज का जिक्र किया। यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश के लोगों में ही रामराज स्थापित करने की सामर्थ्य है।
जिससे पता चलता है कि हमारे पूर्वज कितने सजग व समर्थ थे। वह मुसलमानों काध्रुवीकरण न होने देने की कोशिश करते ही नहीं दिखे बल्कि मुस्लिमों का भरोसा हासिल करने के प्रयास में नजर आए।
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लोगों में इस बात को लेकर काफी उत्सुकता थी कि काशी में मोदी शायद मंदिर मुद्दे पर चुप्पी तोड़ दें।
मोदी के जब संकट मोचन और काशी विश्वनाथ मंदिर जाने की चर्चा आम हुई तो इन अटकलों ने और जोर पकड़ा। पर, मोदी ने अपने मूड का खुलासा नहीं किया।
अयोध्या के नजदीक बहराइच और मथुरा के करीब आगरा में जब मोदी मंदिर पर चुप्पी साधे रहे थे तभी यह संकेत मिलने लगे थे कि चुनाव में मंदिर मुद्दा नहीं होगा। पर, अब जब मोदी ने काशी में भी मंदिर पर मुंह बंद रखा तो यह बात और पुख्ता हो गई।
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दो दिन पहले गाजियाबाद में हुई संघ परिवार की समन्वय बैठक और मंदिर पर मोदी के मौन से यह साफ हो गया कि पूरा भगवा खेमा लोकसभा चुनाव में मुसलमानों का ध्रुवीकरण नहीं होने देना चाहता।
गाजियाबाद बैठक में यह बात कही गई थी कि संघ परिवार के संगठन कुछ भी ऐसा न करें जिससे भाजपा विरोधी दल मुसलमानों को हिंदुओं के विरोध में लामबंद करने में सफल हो जाएं। इसीलिए मोदी यूपी में पहली रैली से ही इस मुद्दे पर चुप्पी साधकर आगे बढ़ रहे हैं।
नतीजों से उत्साहित
भाजपा के एक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने रैली के बाद अनौपचारिक बातचीत में कहा भी कि चार राज्यों के नतीजों और मोदी की रैली में जुट रही भीड़ के बाद साफ हो गया है कि माहौल भाजपा के पक्ष में स्वत: बन रहा है।
ऐसे में क्यों ऐसा कोई काम करें जिससे भाजपा विरोधियों को लामबंद होने का मौका मिले। इसीलिए मोदी ने वह सारी बातें की जो उनकी भारतीय संस्कृति और आस्था के प्रति प्रतिबद्धता तो जाहिर कर दे लेकिन उनके खिलाफ मुस्लिमों को लामबंद न होने का मौका न दे।
मुसलमानों का भरोसा जीतने की कोशिश
काशी में मोदी ने दो कदम आगे बढ़ते हुए मुसलमानों का भरोसा हासिल करने की भी कोशिश की। जो रैली पहले 12 बजे होनी थी, उसे मोदी ने उस समय संबोधित करने का फैसला किया जब जुमां की नमाज हो चुकी हो।
मोदी ने वाराणसी के एक मुस्लिम की चिट्ठी का उल्लेख भी किया। कहा, ‘इस मुस्लिम भाई ने उनसे अपेक्षा की है कि वाराणसी आने पर मैं यहां और आसपास पावरलूम की बदहाली पर भी कुछ बोलूं। इस भाई की पीड़ा यह है कि यह पावरलूम खड़खड़ की काफी आवाज करते हैं।'
मोदी ने कहा कि यह मुस्लिम भाई जहां भी हो वह सुन लें। गुजरात के सूरत में भी कई पावरलूम हैं। दस साल पहले सूरत में पावरलूम का वैसा ही हाल था जैसा मुस्लिम भाई ने चिट्ठी में यहां के बारे में लिखा है।
दस साल में सूरत की ‘सूरत’ बदल गई। आज सूरत का पावरलूम उद्योग बेहतर स्थिति में है। मोदी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि जब उन्होंने सूरत की ‘सूरत’ बदल दी तो काशी क्षेत्र के पावरलूम की काया भी बदल सकते हैं। बस उन्हें मौका दिया जाए।
रिश्तों की डोर पर भावुकता का रंग
मोदी ने वह कोई मुद्दा नहीं छोड़ा जो पूर्वांचल व गुजरात के लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ सकता था। उन्होंने गंगा का उल्लेख करते हुए साबरमती का उदाहरण दिया।
कहा कि वह वादे नहीं बल्कि इरादों के साथ काशी आए हैं। गुजरात में साबरमती नदी भी 10 साल पहले नाली के रूप में तब्दील हो गई थी। वह आज कलकल करते हुए बह रही है। मौका मिले तो गंगा को भी साफ करके दिखा देंगे।