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बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई कोर्ट के फैसले को चुनौती देगा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड 

Fri, 16 Oct 2020 07:55 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Fri, 16 Oct 2020 07:55 PM IST
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Muslim personal law board will challenge CBI court's decision in Babri Masjid demolition case
jammu court - फोटो : सोशल मीडिया
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की वर्किंग कमेटी की दो दिवसीय ऑनलाइन संपन्न हुई बैठक में इसका निर्णय लिया गया। बैठक में यूनिफॉर्म सिविल कोड के खतरे से निपटने के उपायों पर भी विचार किया गया। तय हुआ कि यूनिफॉर्म सिविल कोड से होने नुकसान से सियासी दलों और धार्मिक संगठनों को अवगत कराया जाएगा। इसके लिये बोर्ड के महासचिव को एक कमेटी गठित करने के लिए अधिकृत किया गया है।
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 कोरोना काल मे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की जूम एप पर बुलाई गई दो दिवसीय कार्य समिति की बैठक की अध्यक्षता बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना सैयद मोहम्मद राबे हसनी नदवी ने की और संचालन महासचिव मौलाना मोहम्मद वली रहमानी ने किया। बैठक में बोर्ड के महासचिव सहित कई सदस्यों ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस के आरोपियों के मामले में सीबीआई न्यायालय के फैसले पर आश्चर्य और दुख व्यक्त किया। सदस्यों का मानना था कि अदालत ने कई आकस्मिक गवाही और गवाह के बयानों और खुद आरोपी के कबूलनामे के बावजूद सभी आरोपियों को अपर्याप्त सबूतों के आधार पर बरी कर दिया। बोर्ड के महासचिव ने कहा कि ये पता नहीं है कि अदालत किस तरह के साक्ष्य को विश्वसनीय मानती है। बोर्ड ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि सीबीआई कोर्ट के इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देगा।
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बोर्ड की बैठक में देश की अदालतों में मुस्लिम पर्सनल लॉ से संबंधित चल रहे मामलों की भी विस्तार से समीक्षा की गई और कानूनी समिति को निर्देश जारी किए गए। बोर्ड के कार्यालय सचिव डॉ मोहम्मद वकारुद्दीन लतीफी ने बताया कि बैठक में कानूनी समिति के संयोजक यूसुफ हातिम मछाला ने सबरीमाला मामले की समीक्षा पर एक विस्तृत नोट प्रस्तुत करते हुए कहा कि इसमें धार्मिक स्वतंत्रता, संविधान के अनुच्छेद 25 का दायरा शामिल है। एक धर्म के लिए क्या आवश्यक है, ऐसे सवाल बहस में आएंगे।
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उन्होंने कहा कि इस फैसले का असर अल्पसंख्यकों सहित अन्य धर्म के लोगों के साथ ही बहुसंखयक समुदाय की मजहबी आजादी को भी प्रभावित करेगा। बोर्ड ने इस पर विचार-विमर्श के बाद तय किया कि इस मामले में बोर्ड भी हस्तक्षेप पक्षकार के रूप में शामिल होगा। कार्यालय सचिव ने बताया कि बैठक में चिंता जताई गई कि राम मंदिर, धारा 370 के बाद सरकार का अगला निशाना यूनिफॉर्म सिविल कोड हो सकता है। इस मुद्दे की नाजुकता को देखते हुए धार्मिक संगठनों, अल्पसंख्यकों और राजनीतिक दलों के अलावा नागरिक समाज के सदस्यों के साथ बैठकें कर विचार करने का निर्णय लिया गया।

समाज के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड कितना घातक और हानिकारक हो सकता है, इससे लोगो को जागरूक करने के मुद्दे पर भी चर्चा की गई। यूनिफॉर्म सिविल कोड से उत्पन्न खतरे को दूर करने के लिए बोर्ड के  महासचिव को इस मामले को देखने के लिए एक समिति बनाने के लिए अधिकृत किया गया।

कानूनविद व बुद्धिजीवियों के बनेगी कमेटी
बैठक में सीआरपीसी और आईपीसी में सुधार के लिए सरकार द्वारा गठित समिति को लेकर भी चर्चा हुई। बोर्ड के अधिकांश सदस्यों का मानना था कि समिति की सिफारिशों के दूरगामी परिणाम होंगे। सदस्यों की राय थी कि मुसलमान भी समिति की सिफारिशों से प्रभावित हो सकते हैं, इसलिए कानूनी विशेषज्ञों और विद्वानों की एक समिति गठित कर नागरिक समाज और कानूनी विशेषज्ञों के साथ इस मामले का हल निकालने का निर्णय लिया गया।


इस दौरान मस्जिदों, मकबरों, कब्रिस्तानों, ईदगाहों के मुकदमों और अदालतों के रवैये से संबंधित मामलों की समीक्षा की गई। बैठक की शुरुआत में बोर्ड के महासचिव ने बोर्ड के सदस्यों सहित अहम शख्सियतो के निधन पर शोक जताया। बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना राबे हसनी नदवी ने उनकी मगफिरत की दुआ कराई।
 
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