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लखनऊ से खास मोहब्बत थी मुंशी प्रेमचंद को
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मुंशी प्रेमचंद की जयंती है आज।
- फोटो : ??? ?????
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लखनऊ से खास मोहब्बत थी मुंशी प्रेमचंद को
मुंशी प्रेमचंद की शख्सियत को किसी शहर, सूबे या फिर मुल्क की सरहद में बांधना उनके साथ नाइंसाफी होगी। हम शहरवासी खुशकिस्मती से कह सकते हैं कि मुंशी जी ने जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा लखनऊ में बिताया।
उनकी कई ऐसी कृतियां जो देश-दुनिया में मशहूर हुईं, यहीं लिखी गईं। 31 जुलाई को उनकी जयंती के मौके पर प्रेमचंद के लखनऊ में बिताए दिनों को याद कर रहे हैं आरिफ...
प्रेमचंद की जिंदगी और साहित्य पर 30-35 वर्षों से शोध कर रहे और मुंशी जी पर छह किताबें प्रकाशित करवा चुके डॉ. प्रदीप जैन बताते हैं कि मुंशी जी की जिंदगी अलग-अलग शहरों में बीती पर लखनऊ उनका पसंदीदा ठिकाना रहा।
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जिंदगी के अंतिम दौर में भी इलाज की उम्मीद उन्हें लखनऊ खींच लाई। उस दौर के मशहूर चिकित्सक डॉ. हरगोविंद व्यास के अलावा उन्होंने बलरामपुर अस्पताल में भी इलाज करवाया।
प्रेमचंद लखनऊ तब आए जब उनके अपने प्रेस से उन्हें काफी घाटा होने लगा था। यहां दुलारे लाल भार्गव के आमंत्रण पर ‘माधुरी’ के साहित्यिक परामर्शदाता के तौर पर जुड़ गए। बाद में गंगा पुस्तक माला की पुस्तकों का संपादन में भी जुट गए। एवज में उन्हें सौ रुपये मासिक मिलते थे।
दुलारे लाल भार्गव के आग्रह पर ‘रंगभूमि’ भी यहीं प्रकाशित करवाई। इसकी एडवांस रायल्टी तौर पर उन्हें 1,800 रुपये मिले। आचार्य शिवपूजन सहाय ने पुस्तक का प्रिंट फाइनल किया था। मुंशी जी की शोहरत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहला प्रिंट ऑर्डर ही 5000 कॉपी का था।
सितंबर 1924 में वे अमीनुद्दौला पार्क के पास किराए के मकान में रहा करते थे। वहीं नवंबर 1924 में ‘करबला’ नाम का नाटक का प्रकाशन हुआ, जो बेहद प्रसिद्ध हुआ।
डॉ. जैन बताते हैं इस दौर में प्रिंट लाइन में उनका नाम पंडित कृष्ण बिहारी मिश्र के साथ संयुक्त रूप से जाता था। मार्च 1930 में उन्होंने वाराणसी से एक पत्रिका ‘अंश’ शुरू की, पर उसका संपादन वे लखनऊ से ही करते रहे। फरवरी 1931 में उन्होंने माधुरी के संपादन कार्य को अलविदा कह दिया। इसके बावजूद वे लखनऊ में ही बने रहे।
प्रेमचंद 1927 से 1932 की बीच लखनऊ में कई जगहों पर रहे। वे मारवाड़ी गली के उस मकान में रहे जहां फिल्म पत्रकार स्व. रामकृष्ण रहा करते थे।
इसके अलावा झंडेवाला पार्क के सामने आदित्य भवन, शिवाजी मार्ग के पाठक भवन, अमीनाबाद के गूंगे नवाब पार्क के निकट तथा गणेशगंज में आर्य समाज मंदिर के पास भी वे रहे।
उन्होंने 1936 में लखनऊ में हुए प्रगतिशील लेखक संघ, जिसकी स्थापना मौलाना सज्जाद जहीर ‘बन्ने भाई ’ ने की थी, उसके अधिवेशन की अध्यक्षता भी की।
लखनऊ में रहते हुए उन्होंने ‘सवा सेर गेहूं’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसी प्रसिद्ध कहानियां भी लिखीं। पहले हिंदी और फिर उर्दू में लिखा गया उनका ‘कायाकल्प’ उपन्यास भी यहीं पूरा हुआ।
उन्होंने पंडित रतन नाथ धर सरशार की किताब फसाना-ए-आजाद के एक अंश का अनुवाद ‘आजाद कथा’ भी लखनऊ में रहते हुए ही किया।
25 जून 1936 को उन्हें खून की पहली उलटी वाराणसी में हुई। इसके ठीक एक महीने बाद 25 जुलाई को दूसरी। इससे वे काफी कमजोर हो गए और इलाज के लिए लखनऊ आ गए।
शुरुआती दो महीने लाटूश रोड पर दया नारायण निगम (कानपुर से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘जमाना’ के संपादक) के मकान और फिर अमीनाबाद के सूर्य होटल में ठहरे।
इस दौर में उनके मित्र और कहानीकार गंगा प्रसाद मिश्रा और कलाकार अब्दुल हफीज ने उनकी सेवा की। बाद में वे वापस लौट गए। 8 अक्तूबर 1936 को सुबह 56 वर्ष की आयु में इस संसार को छोड़ स्वर्ग सिधार गए।
भुला नहीं पाएंगे प्रेमचंद को
वरिष्ठ साहित्यकार शारिब रुदौलवी बताते हैं कि प्रेमचंद ने जिस जबान में लिखा, वो आम लोगों की भाषा थी, जिसस वो कभी अप्रसांगिक नहीं होगी। उनके नाटक, कहानी या उपन्यास के चरित्र भले ही पुराने हो गए पर मुद्दे आज के ही हैं। जो प्रेमचंद के इतना मशहूर होने की खास वजह है।
लखनऊ में कई लिट्रेचर फेस्टिवल करवा चुके आरजू लखनवी बताते हैं कि शाम-ए-अवध के अंतर्गत ‘प्रेमचद्र और हम’ नाम से आयोजित सेमिनार में कई वरिष्ठ साहित्यकारों ने एक स्मारक बनाने की मांग की जो आज तक अधूरी है।
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मुंशी प्रेमचंद की शख्सियत को किसी शहर, सूबे या फिर मुल्क की सरहद में बांधना उनके साथ नाइंसाफी होगी। हम शहरवासी खुशकिस्मती से कह सकते हैं कि मुंशी जी ने जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा लखनऊ में बिताया।
उनकी कई ऐसी कृतियां जो देश-दुनिया में मशहूर हुईं, यहीं लिखी गईं। 31 जुलाई को उनकी जयंती के मौके पर प्रेमचंद के लखनऊ में बिताए दिनों को याद कर रहे हैं आरिफ...
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प्रेमचंद की जिंदगी और साहित्य पर 30-35 वर्षों से शोध कर रहे और मुंशी जी पर छह किताबें प्रकाशित करवा चुके डॉ. प्रदीप जैन बताते हैं कि मुंशी जी की जिंदगी अलग-अलग शहरों में बीती पर लखनऊ उनका पसंदीदा ठिकाना रहा।
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जिंदगी के अंतिम दौर में भी इलाज की उम्मीद उन्हें लखनऊ खींच लाई। उस दौर के मशहूर चिकित्सक डॉ. हरगोविंद व्यास के अलावा उन्होंने बलरामपुर अस्पताल में भी इलाज करवाया।
प्रेमचंद लखनऊ तब आए जब उनके अपने प्रेस से उन्हें काफी घाटा होने लगा था। यहां दुलारे लाल भार्गव के आमंत्रण पर ‘माधुरी’ के साहित्यिक परामर्शदाता के तौर पर जुड़ गए। बाद में गंगा पुस्तक माला की पुस्तकों का संपादन में भी जुट गए। एवज में उन्हें सौ रुपये मासिक मिलते थे।
दुलारे लाल भार्गव के आग्रह पर ‘रंगभूमि’ भी यहीं प्रकाशित करवाई। इसकी एडवांस रायल्टी तौर पर उन्हें 1,800 रुपये मिले। आचार्य शिवपूजन सहाय ने पुस्तक का प्रिंट फाइनल किया था। मुंशी जी की शोहरत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहला प्रिंट ऑर्डर ही 5000 कॉपी का था।
सितंबर 1924 में वे अमीनुद्दौला पार्क के पास किराए के मकान में रहा करते थे। वहीं नवंबर 1924 में ‘करबला’ नाम का नाटक का प्रकाशन हुआ, जो बेहद प्रसिद्ध हुआ।
डॉ. जैन बताते हैं इस दौर में प्रिंट लाइन में उनका नाम पंडित कृष्ण बिहारी मिश्र के साथ संयुक्त रूप से जाता था। मार्च 1930 में उन्होंने वाराणसी से एक पत्रिका ‘अंश’ शुरू की, पर उसका संपादन वे लखनऊ से ही करते रहे। फरवरी 1931 में उन्होंने माधुरी के संपादन कार्य को अलविदा कह दिया। इसके बावजूद वे लखनऊ में ही बने रहे।
प्रेमचंद 1927 से 1932 की बीच लखनऊ में कई जगहों पर रहे। वे मारवाड़ी गली के उस मकान में रहे जहां फिल्म पत्रकार स्व. रामकृष्ण रहा करते थे।
इसके अलावा झंडेवाला पार्क के सामने आदित्य भवन, शिवाजी मार्ग के पाठक भवन, अमीनाबाद के गूंगे नवाब पार्क के निकट तथा गणेशगंज में आर्य समाज मंदिर के पास भी वे रहे।
उन्होंने 1936 में लखनऊ में हुए प्रगतिशील लेखक संघ, जिसकी स्थापना मौलाना सज्जाद जहीर ‘बन्ने भाई ’ ने की थी, उसके अधिवेशन की अध्यक्षता भी की।
लखनऊ में रहते हुए उन्होंने ‘सवा सेर गेहूं’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसी प्रसिद्ध कहानियां भी लिखीं। पहले हिंदी और फिर उर्दू में लिखा गया उनका ‘कायाकल्प’ उपन्यास भी यहीं पूरा हुआ।
उन्होंने पंडित रतन नाथ धर सरशार की किताब फसाना-ए-आजाद के एक अंश का अनुवाद ‘आजाद कथा’ भी लखनऊ में रहते हुए ही किया।
25 जून 1936 को उन्हें खून की पहली उलटी वाराणसी में हुई। इसके ठीक एक महीने बाद 25 जुलाई को दूसरी। इससे वे काफी कमजोर हो गए और इलाज के लिए लखनऊ आ गए।
शुरुआती दो महीने लाटूश रोड पर दया नारायण निगम (कानपुर से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘जमाना’ के संपादक) के मकान और फिर अमीनाबाद के सूर्य होटल में ठहरे।
इस दौर में उनके मित्र और कहानीकार गंगा प्रसाद मिश्रा और कलाकार अब्दुल हफीज ने उनकी सेवा की। बाद में वे वापस लौट गए। 8 अक्तूबर 1936 को सुबह 56 वर्ष की आयु में इस संसार को छोड़ स्वर्ग सिधार गए।
भुला नहीं पाएंगे प्रेमचंद को
वरिष्ठ साहित्यकार शारिब रुदौलवी बताते हैं कि प्रेमचंद ने जिस जबान में लिखा, वो आम लोगों की भाषा थी, जिसस वो कभी अप्रसांगिक नहीं होगी। उनके नाटक, कहानी या उपन्यास के चरित्र भले ही पुराने हो गए पर मुद्दे आज के ही हैं। जो प्रेमचंद के इतना मशहूर होने की खास वजह है।
लखनऊ में कई लिट्रेचर फेस्टिवल करवा चुके आरजू लखनवी बताते हैं कि शाम-ए-अवध के अंतर्गत ‘प्रेमचद्र और हम’ नाम से आयोजित सेमिनार में कई वरिष्ठ साहित्यकारों ने एक स्मारक बनाने की मांग की जो आज तक अधूरी है।