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बड़े अनोखे हैं लखनऊ के ये वैज्ञानिक

Sat, 28 Feb 2015 03:21 PM IST
अतुल भारद्वाज/अमर उजाला, लखनऊ
अतुल भारद्वाज/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 28 Feb 2015 03:21 PM IST
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multi telented lucknow scientists.

शहर में ऐसे वैज्ञानिक भी हैं जिन्होंने अपने फील्ड में तो सफलता हासिल की ही है। साथ ही फिल्म, उद्योग, पर्यावरण संरक्षण, विज्ञान प्रसार जैसे मुद्दों पर भी काम किया और इसी के दम पर अपनी एक अलग पहचान बनाई।

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आखिर बनती भी क्यों नहीं, यह वैज्ञानिक कुछ हटके जो हैं। ऐसे ही वैज्ञानिकों पर ‘अमर उजाला’ की खास रिपोर्ट...

प्रदूषण से होने वाले खतरे ने परेशान किया तो डॉ. ख्वाजा जे अहमद ने इसके लिए कुछ करने की ठानी। अपने जैसे विशेषज्ञों को लेकर एक इंटरनेशनल सोसाइटी बनाई।

सोसाइटी बनने के बाद वह इसके महासचिव बने। इसके बाद से वह लगातार वैज्ञानिकों की मदद से ही पर्यावरण को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
 
असली काम : एनबीआरआई के सीनियर डिप्टी डायरेक्टर के पद से रिटायर डॉ. अहमद का काम प्लांट बायलॉजी पर रहा।

इस दौरान उन्होंने पौधों की पर्यावरण संरक्षण की क्षमता का पता किया। वहीं, प्रदूषण और दूसरे फैक्टर्स से पेड़-पौधों को हो रहे नुकसान को भी उन्होंने अपने पेपर्स के माध्यम से बताया।
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अब तक उनके 63 रिसर्च पेपर्स सहित 80 पब्लिकेशन हो चुके हैं। सड़क किनारे पौधों पर प्रदूषण के असर की मॉनीटरिंग के लिए वह चर्चा में भी रहे।

दो शब्द : ‘हमारे आसपास मौजूद पेड़-पौधे असल में पर्यावरण संरक्षण की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। वैज्ञानिक तरीके से इनके संरक्षण के साथ लोगों को भी सही जानकारी के लिए हमें जागरूक करना होगा।’
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कार्टून से बदली सूरत

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कार्टून के जरिये व्यवस्था पर कटाक्ष करना हो या फिर उसे सुधारने का संदेश देना हो तो डॉ. प्रदीप श्रीवास्तव इस काम में माहिर है।

शहर में गंदगी से लेकर रंग भेद, पर्यावरण को खतरा, सामाजिक बदलाव पर उन्होंने बखूबी कार्टून बनाए।
 
विज्ञान को उन्होंने कार्टून की मदद से लोगों तक पहुंचाया। इसके लिए उन्हें पूरी दुनिया में सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें एक नया नाम इन कार्टून की वजह से मिला ‘साइंटूनिस्ट’। उनकी विधा को साइंटूनिक्स कहा जाता है।

असली काम : सीडीआरआई से डॉ. प्रदीप श्रीवास्तव 2013 में डिप्टी डायरेक्टर व सीनियर प्रिंसीपल साइंटिस्ट के पद से रिटायर हुए।

डॉ. श्रीवास्तव ने यहां मेडिसिनल एंड केमिस्ट्री डिवीजन में काम किया। इस दौरान उन्होंने ड्रग खोजे जाने के बाद इसकी तकनीकी इंडस्ट्री को देने के लिए तकनीकी पर काम उनका होता है।

कम से कम खर्च पर कैसे बनें, एमॉक्सिसिलीन एंटी बायटिक, ब्रेन हेमरेज हल्दी से बनाई हर्बल ड्रग, करक्यूमिन पर सबसे पहले काम शुरू किया है।

दो शब्द : ‘आम आदमी तक साइंस का संदेश पहुंचाने के कोई आसान तरीके के बारे में हमारे दूसरों से बात होती थी। कार्टून का असर देखा तो साइंटून बनाने का आइडिया आया, सफल हो गया।’

गोमती के ‌लिए लड़ी लड़ाई

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पर्यावरण सुरक्षा से लेकर गोमती नदी को बचाने के लिए लंबी लड़ाई डॉ. वीके जोशी ने लड़ी। नेशनल ग्रीन कोर की राज्य समिति के सदस्य डॉ. जोशी ने मुख्यमंत्री से लेकर स्थानीय अधिकारियों तक को पर्यावरण और गोमती नदी के वैज्ञानिक पहलुओं से रूबरू कराया।

अपने आर्टिकल से लेकर जमीनी स्तर पर भी वह पर्यावरण के लिए लोगों को जागरूक करने का बीड़ा उठाए हुए हैं।

पर्यावरण के मुद्दे पर उन्हें एक मुंहफट विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है। पालतू जानवरों के अपने प्रेम के लिए भी वह खासे चर्चित हैं।

असली काम : 1965 में भारत सरकार के कृषि मंत्रालय से कॅरिअर शुरू कर उन्होंने एक जियोलॉजिस्ट के रूप में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया लखनऊ में जॉइन किया।

निदेशक के पद से रिटायर डॉ. जोशी ने हिमालय पर्वत के नीचे दफन हुए टेथिस सागर और वहां से मिले जीवाश्म पर पेपर पब्लिश किया।

वैज्ञानिक विषयों पर अलग-अलग प्लेटफार्म पर वह करीब 250 आर्टिकल लिख चुके हैं। गोमती नदी के संरक्षण के उपायों के लिए वह जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के काम के समय भी इससे जुड़े रहे हैं।

दो शब्द : ‘जीएसआई जब 1995-2000 के बीच गोमती नदी पर काम कर रही थी। उस समय नदी को नजदीक से जानने का मौका मिला। उसके बाद से पर्यावरण को बचाने की कवायद शुरू हो गई।’

लैब से बॉलीवुड तक

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फिल्म इश्कजादे के ठाकुर साहब, अभिनेता अर्जुन कपूर के दादा और जेड प्लस के मुख्यमंत्री के तौर पर डॉ. अनिल रस्तोगी की पहचान है।

उन्होंने डीडी वन के लिए उड़ान, मंजिलें हम से हैं, सरीखे सीरियलों में काम किया। राज्यसभा के लिए वह संविधान में काम कर चुके हैं।

ना बोले तुम, ना मैंने कुछ कहा, हम हैं ना, क्राइम पेट्रोल, सीआईडी, दरीबा डायरीज में काम कर चुके अनिल अब लाइफ ओके पर कलश सीरियल में दिखेंगे।

मार्च में उनकी एक फिल्म गुड्डू रंगीला रिलीज होगी, जो खाप पंचायतों पर बनी है।

बड़े पर्दे के साथ टीवी पर जाना पहचाना चेहरा बने डॉ. अनिल रस्तोगी हकीकत में एक वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं।

करीब 42 साल तक वह देश के टॉप संस्थान सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीडीआरआई) में वैज्ञानिक रहे।

साइंटिस्ट ‘जी’ के पद से रिटायर हुए डॉ. रस्तोगी बायोटेक्नोलॉजी के एचओडी भी रहे। अपने वैज्ञानिक कॅरिअर के बीच में उन्होंने डायबिटीज, कालाजार, सांस की बीमारियों के लिए ड्रग बनाने में मदद की। अपने काम के लिए उन्हें नेशनल साइंस अकादमी ने फेलोशिप भी दी।

‘वैज्ञानिक में प्रोफेशन से हूं। दिल में थिएटर और एक्टिंग कॉलेज के समय से ही बसे हुए थे। विज्ञान के साथ थिएटर को भी जिंदा रखा। रिटायर होने के बाद आज इसी के लिए पूरी तरह समर्पित होकर काम कर रहा हूं।’

आम आदमी तक पहुंचे विज्ञान

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जानी-पहचानी आवाज सुनाई देती है। विज्ञान को आम आदमी की भाषा और लहजे में उन तक पहुंचाने वाली यह आवाज डॉ. चंद्रमोहन नौटियाल की होती है।

विज्ञान के तकनीकी शब्दों और विषय को आसान तरीके से बताने का काम भी वह खुद ही करते हैं। बच्चों के बीच जाकर बात करने से लेकर नेशनल साइंस फिल्म फेस्टिवल की ज्यूरी में भी वह दिखे। उनकी पहचान एक सफल साइंस कम्यूनिकेटर के रूप में राजधानी और बाहर भी बनी हुई है।

साइंस कम्यूनिकेटर के रूप में मशहूर डॉ. नौटियाल हकीकत में रेडियो कार्बन डेटिंग के विशेषज्ञ हैं। उनका काम लाखों-करोड़ों साल पुराने जीवाश्म की आयु को सटीकता से पता करना होता है।

बीएसआईपी में रेडियो कार्बन लैब के इंचार्ज डॉ. नौटियाल को हाल ही यूपी की ऐतिहासिक महत्व की जीवाश्म साइटों की स्टडी का जिम्मा दिया गया है। उनके अब तक 100 से ज्यादा पेपर पब्लिश हो चुके हैं।

‘विज्ञान को आम आदमी तक पहुंचाना सबसे कठिन काम माना जाता है। मुझे लगता है कि ऐसा करके मैं उनकी मदद कर रहा हूं। संविधान में भी इसकी अनिवार्य व्यवस्था है और यह मुझे अपनी जिम्मेदारी लगती है।’

हर्बल चॉकलेट से बच्चों को रखते हैं स्वस्थ

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आमतौर पर बाजार में मौजूद टॉफी और चॉकलेट में पोषण केवल उसके रैपर तक सीमित होता है।

डॉ. एसपीएस खनुजा ने इसे पकड़ा। दूसरे लोगों से इसका विकल्प बनाने के लिए कहा तो लोगों ने एंटरप्रिन्यॉरशिप के खतरे बताना शुरू कर दिए।

खुद ही इसकी शुरुआत की। वालंटियर रिटायरमेंट लेकर खुद की कंपनी शुरू की। आज प्रोटीन और फाइबर से भरपूर हर्बल चॉकलेट व स्पोर्ट्स डायट बनाने का काम उनकी कंपनी स्काइज लाइकर रही है।

डॉ. खनुजा मूलरूप से वैज्ञानिक हैं। वह 2001 तक सीमैप जैसी संस्था के निदेशक भी रहे। यहां से उन्होंने वालंटियर रिटायरमेंट लेकर एंटरप्रिन्यॉरशिप की शुरुआत की।

अपने वैज्ञानिक कार्यकाल में उन्होंने मेंथा की पांच किस्म किसानों को दीं। इसके अलावा मलेरिया की दवा के लिए जरूरी आर्टिमीशिया की खेती को उन्होंने शुरू कराया। उनके ही प्रयासों से भारत ने जर्मेनियम के उत्पादन में चीन को पीछे छोड़ा।

‘जब भी किसी को एंटरप्रिन्यॉरशिप के लिए बोलता, सभी नकारात्मक हो जाते। खुद ही इसकी जिम्मेदारी ली। नौकरी छोड़ी और लोगों को एक सेहतमंद चॉकलेट मैंने उपलब्ध कराई।’

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