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अखिलेश की ताजपोशी, मुलायम की हार नहीं बल्कि रणनीतिक जीत!

Thu, 19 Jan 2017 06:42 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 19 Jan 2017 06:42 PM IST
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Mulayam becomes helpless in front of akhilesh yadav.
मुलायम ‌सिंह यादव - फोटो : amar ujala

मुलायम सिंह यादव यूं ही अपने प्रत्याशी उतारने से पीछे नहीं हटे हैं। चुनाव आयोग के फैसले के बाद अखिलेश को पार्टी सुप्रीमो मानने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा था। उनके पास न कोई पार्टी थी और न ही सिम्बल। नए दल के पंजीकरण का भी वक्त नहीं था।

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सपा विधायकों और सांसदों का बहुमत अखिलेश के साथ था। जनभावनाएं भी मुलायम के साथ नहीं दिख रही थीं। 90 फीसदी सीटों को लेकर मतभेद नहीं है, इसलिए लगभग 10 प्रतिशत सीटों (38) पर अपने करीबी लोगों को टिकट देने की सिफारिश करके उन्होंने अखिलेश के साथ चलने का फैसला लिया।
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मुलायम सपा के संस्थापक अध्यक्ष रहे हैं। रजत जयंती वर्ष में उनका यह रुतबा खत्म हो गया है। चुनाव आयोग के फैसले से एक दिन पहले मुलायम ने सपा दफ्तर में कार्यकर्ताओं के बीच जिस तरह के तेवर दिखाए, उससे लग रहा था कि विधानसभा चुनाव में बाप-बेटे आमने-सामने होंगे।
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मुलायम ने बाबरी मस्जिद के जमाने की याद दिलाकर मुस्लिमों को रिझाने की कोशिश की, अखिलेश पर हमला किया। कहा, आयोग का फैसला जो भी हो, अखिलेश के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे। उस समय तक मुलायम खेमा मान रहा था कि साइकिल चुनाव चिह्न उसे मिलेगा या फिर सीज हो जाएगा। चुनाव आयोग ने उनकी संभावनाओं पर पानी फेर दिया।

अखिलेश के प्रति पहले से ही नरम था रुख

Mulayam becomes helpless in front of akhilesh yadav.

सपा और साइकिल अखिलेश के हवाले हो गई। ऐसे में विकल्प यही था कि मुलायम गुट किसी अन्य दल के सिम्बल पर अपने प्रत्याशी उतारे। लोकदल के अध्यक्ष सुनील सिंह से मुलायम की बात भी हुई थी। यह बेटे (अखिलेश) के खिलाफ बाप की बगावत होती।

पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम को देखें तो मुलायम का रुख अखिलेश के प्रति नरम था। उन्होंने कहा था, हम अखिलेश का नुकसान नहीं चाहते। हमारे पास जो कुछ था, अखिलेश को सौंप दिया, अब क्या बचा है?

सिम्बल मिल जाता तो उतरते मैदान में
यदि चुनाव आयोग से मुलायम को साइकिल सिम्बल मिल जाता तो वह अलग चुनाव लड़ते। उनके नजदीकी लोगों का कहना है कि सिम्बल मिल जाने पर वही पार्टी अध्यक्ष होते। ऐसे में बहुत सारे टिकट के दावेदार पाला बदलकर उनके पास आ सकते थे। सिम्बल फ्रीज होने पर भी मामला बराबर का होता।

ऐसी स्थिति में सपा के दोनों खेमों को अस्थायी मान्यता व चुनाव चिह्न आवंटित हो जाता और मुलायम अपने उम्मीदवार उतारने पर विचार कर सकते थे। लेकिन सिम्बल व सपा का नाम छिन जाने के बाद उनके सारे विकल्प लगभग समाप्त हो चुके थे। ऐसे में सपा को बचाए रखने के लिए मुलायम बैकफुट पर आए। अखिलेश की मुलाकातों ने भी माहौल को सकारात्मक बनाया।

लोकदल के साथ लड़ना था घाटा का सौदा

Mulayam becomes helpless in front of akhilesh yadav.

सपा के एक नेता के मुताबिक सिम्बल छिन जाने की स्थिति में लोकदल अध्यक्ष सुनील सिंह ने मुलायम को अपनी पार्टी के सिम्बल (खेत जोतता किसान) पर प्रत्याशी उतारने का सुझाव दिया था, लेकिन मुलायम को यह घाटे का सौदा लगा। यदि उनके प्रत्याशी जीतते तो वे लोकदल के विधायक कहलाते।

रालोद के संगठन में अभी मुलायम शामिल नहीं हैं। उन्हें यह भी सलाह दी गई कि यदि उनके प्रत्याशियों की परफॉरमेंस खराब रही तो सियासी तौर पर गलत संदेश जाएगा। उनका भ्रम खत्म हो जाएगा।

आदेश देने वाले कर रहे टिकट की सिफारिश
मुलायम के नजदीकी लोग कहते हैं कि विवाद की शुरुआत टिकट बांटने के अधिकार को लेकर हुई थी। अखिलेश पहले मुलायम से अपने लोगों के लिए टिकट मांग रहे थे। उस समय दबाव मुलायम पर था।

अब स्थिति उलट गई है, टिकट अखिलेश बांट रहे हैं और मुलायम उनसे अपने कुछ लोगों के लिए टिकट की सिफारिश कर रहे हैं। यानी सभी को एडस्ट करने का दबाव अब अखिलेश पर है। इससे पार्टी की चुनावी संभावनाएं प्रभावित नहीं होंगी। इसी वजह से मुलायम ने पार्टी में अखिलेश के वर्चस्व को स्वीकार कर लिया है।

मुलायम ने कूटनीति से अखिलेश को बनाया उत्तराधिकारी

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यह मानने वाले लोग भी कम नहीं हैं कि सपा का विवाद पहले से लिखी गई स्क्रिप्ट पर रचा गया ड्रामा था। लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एसके द्विवेदी कहते हैं, पूरे घटनाक्रम ने यह दिखा दिया है कि मुलायम ने सोची-समझी रणनीति के तहत अखिलेश यादव को अपना निर्विवाद राजनीतिक उत्तराधिकारी साबित कर दिया।

प्रो. द्विवेदी कहते हैं, महाभारत के युद्ध में भीष्म और द्रोणाचार्य कौरवों के साथ थे लेकिन जीत का आशीर्वाद पांडवों को देते थे। कुछ इसी तरह से सपा के ताजा विवाद को समझा जा सकता है।

मुलायम सिंह ने सुनियोजित रणनीति अपनाकर अखिलेश को राजनीतिक उत्तराधिकार सौंप दिया। कूटनीति वही होती है, जिसे लोग समझ न पाएं। यूं भी राजनीति में कहावत है कि इसमें सच दिखता नहीं है और जो दिखता है वह सच नहीं होता।

खुद किया अपने केस को कमजोर

Mulayam becomes helpless in front of akhilesh yadav.

मुलायम ने चुनाव आयोग में अपने एक भी समर्थक, विधायक, सांसद का शपथ पत्र दाखिल नहीं कराया। उन्होंने अपने केस को खुद कमजोर किया।

उनका साथ देने वाले अमर सिंह और शिवपाल अब यह नहीं कह सकते कि मुलायम ने पार्टी की लड़ाई में बेटे का साथ दिया। उन्होंने खुद कुछ नहीं कहा, लेकिन इस घटनाक्रम से संदेश दे दिया कि अखिलेश के सामने शिवपाल व अन्य नेताओं की सियासी हैसियत नहीं है।

उनके एकमात्र राजनीतिक उत्तराधिकारी सिर्फ और सिर्फ अखिलेश हैं। चुनाव आयोग के फैसले के बाद मुलायम यदि अखिलेश के खिलाफ जाते तो वह अपनी राजनीतिक कब्र खोद रहे होते।

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