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मच्छर भगाने के लिए घर में ये सब जलाते हैं तो जान को है खतरा

Tue, 15 Dec 2015 11:38 AM IST
Updated Tue, 15 Dec 2015 11:38 AM IST
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mosquito coil and liquid repellent can cause asthma

ठिठुराती ठंड के बीच बंद कमरों में मच्छरों से बचाव के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मॉस्किटो कॉयल और लिक्विड रिपलेंट बच्चों को सांस की बीमारी दे रहे हैं।

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डॉक्टरों का मानना है कि मॉस्किटो कॉयल और लिक्विड में मौजूद केमिकल्स और गैस से सांस की नली में सिकुड़न आने लगती है, जिससे बच्चों को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। समस्या गंभीर होने पर बच्चों की जान भी खतरे में पड़ सकती है।
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अकेले डफरिन अस्पताल में मॉस्किटो कॉयल और लिक्विड के चलते सांस के रोग से पीड़ित 50 से अधिक बच्चे रोज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। इस अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सलमान खान की मानें तो मॉस्किटो कॉयल और लिक्विड रिपलेंट के जलने पर उससे निकलने वाला धुआं और गैस एक दिन से पांच वर्ष तक के बच्चों को नुकसान पहुंचता है।

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रूम हीटर भी खतरनाक

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डॉ. सलमान बताते हैं कि रूम हीटर से निकलने वाली गर्मी सांस की नली की नमी को सूखा देता है। नली जैसे ही सूखेगी बच्चे की सांस फूलने लगती है और पसलियां तेज चलने लगती हैं।

सर्दियों में ऐसी समस्या से पीड़ित बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ती है। बचाव के लिए रूम हीटर दीवार की तरफ कर लगाना चाहिए, जिससे गर्मी दीवार से टकराकर रूम में पहुंचे।
पालतू जानवरों से भी बरतें सावधानी

डॉ. सलमान के मुताबिक, घर के पालतू जानवर जैसे कुत्ते, बिल्ली, खरगोश और चिड़ियों की पहुंच से भी बच्चों को दूर रखना चाहिए। इनके बालों से निकलने वाली दुर्गंध और गंदगी सांस नली को ब्लॉक कर सकती है और कई बार बाल मुंह में जाकर सास की नली में फंस जाए तो सडेन डेथ का कारण बन सकती है।

ब्रांको डायलेटर से बचेगी जान

डॉ. सलमान बताते हैं कि सांस नली को सामान्य स्थिति में लाने के लिए ब्रांको डायलेटर का इस्तेमाल किया जाता है। ये इलेक्ट्रॉनिक मशीन है, जिसमें तेज प्रेशर के साथ लिक्विड ऑक्सीजन निकलता है। डायलेटर से लिक्विड बॉल्स सीधे श्वास तंत्रिका में पहुंचती हैं। बच्चे की सांस नली में नमी वापस आते ही उसकी स्थिति सुधरने लगती है।

अमेरिका में कॉयल, रिपलेंट पर है बैन

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डॉ. सलमान खान के मुताबिक, डफरिन अस्पताल की ओपीडी में रोजाना 150 से अधिक बच्चे पहुंचते हैं। उसमें करीब 50 बच्चे ब्रांकोलाइटिस अस्थमा से पीड़ित होते हैं। इस बीमारी में सांस की नली सिकुड़ जाती है। इस बीमारी को लेकर बच्चों के परिवारीजनों से जब पूछा गया तो पता चला कि सोते वक्त अधिकतर लोग कमरे में मॉस्कि टो कॉयल या लिक्विड जलाते हैं।

डॉ. सलमान बताते हैं कि छोटे बच्चों की सांस नली यानी विंड पाइप बहुत छोटी और कोमल होती है। इस नली के बीच नियमित स्राव होता रहता है, जिससे गंदगी बाहर निकलती रहती है। इसी नली से हवा भीतर जाती है।

मॉस्किटो कॉयल या लिक्विड के जलने पर उसमें से निकलने वाली एस-2 गैस इस नली को सिकोड़ने लगती है और फेफड़ों पर बुरा असर डालती है। इससे बच्चों को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। अमेरिका में एस-2 केमिकल युक्त कॉयल या लिक्विड की बिक्री पर बैन है।

मच्छरदानी बेहतर विकल्प

केजीएमयू के बाल रोग विभाग के विशेषज्ञ डॉ. एसएन सिंह मच्छर भगाने की वाली दवाओं के नुकसान से बचाने के लिए मच्छरदानी के इस्तेमाल का सुझाव देते हैं।

वह बताते हैं कि मॉस्किटो कॉयल और लिक्विड से परेशानी बढ़ने पर नवजात मुंह खोलकर लगातार रोता रहता है।

उसे हमेशा उलझन और बेचैनी रहती है और व दूध पीना पूरी तरह बंद कर देगा। एस-2 गैस से बच्चे की श्वान तंत्रिकाओं को नुकसान हो सकता है। लगातार इस गैस में रहने से फेफड़ा खराब हो सकता है।

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