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मोहनलालगंज : जाति पर जोर, मुद्दे नदारद, बिरादरी के हिसाब से तय होते हैं प्रत्याशी

Mon, 22 Apr 2024 04:45 PM IST
ishwar ashish सचिन त्रिपाठी, अमर उजाला, लखनऊ
सचिन त्रिपाठी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Mon, 22 Apr 2024 04:45 PM IST
सार

मोहनलालगंज में तमाम समस्याएं हैं। यहां पर बिरादरी के हिसाब से प्रत्याशी तय होते हैं। यहां पर डिग्री कॉलेज न होने से पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

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Mohanlalganj: candidates are being decided according to caste.
- फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजधानी लखनऊ की मोहनलालगंज संसदीय सीट शुरुआत से ही अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रही है। राजनीतिक दल भी चुनाव के दौरान बिरादरी के समीकरण देखकर प्रत्याशी तय करते हैं। यही वजह है कि यहां मुद्दों से ज्यादा जाति हावी रही है। आजादी के 76 साल बाद भी क्षेत्र में कई समस्याएं बरकरार हैं, जिन पर आज भी चर्चा नहीं हो रही।

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मोहनलालगंज संसदीय सीट में लखनऊ का ग्रामीण क्षेत्र शामिल है। मोहनलालगंज, मलिहाबाद, बीकेटी और सरोजनीनगर के साथ ही सीतापुर की सिधौली विधानसभा भी हिस्सा है। ग्रामीण क्षेत्र में डिग्री कॉलेजों का अभाव है। बीकेटी के महोना में जरूर एक डिग्री कॉलेज है, लेकिन से सबसे दूर माल और मोहनलालगंज का हाल बुरा है। 
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विशेष जाति के प्रत्याशी पर लगाया जाता है दांव
मोहनलालगंज में इस समय भाजपा से कौशल किशोर सांसद हैं। पासी बिरादरी में उनकी खासी पैठ मानी जाती है। मलिहाबाद क्षेत्र में इस वर्ग के वोटर की बड़ी संख्या है। दूसरी ओर मोहनलालगंज क्षेत्र दलित बहुल है। इसके अलावा यहां यादव बिरादरी की भी अच्छी संख्या है। बिरादरी के प्रत्याशी और यादव वोटरों के दम पर सपा यहां कई बार अपना परचम लहरा चुकी है।


- पिछली दो बार से कौशल किशोर ही यहां से निर्वाचित हो रहे हैं। इस बार भाजपा ने एक बार फिर उन पर दांव लगाया है तो वहीं दूसरी ओर इंडिया गठबंधन ने मोहनलागंज क्षेत्र से विधायक रह चुके आरके चौधरी पर अपना दांव लगाया है।

पेड़ काटने को मजबूर
मोहनलालगंज संसदीय क्षेत्र में पूरी दुनिया में अपने आमों के लिए प्रसिद्ध फलपट्टी क्षेत्र मलिहाबाद भी है। यहां का दशहरी आम दुनियाभर में प्रसिद्ध है, लेकिन पिछले 15 साल में हालात इस तरह से खराब हुए हैं कि बाग मालिक खुद ही आम के पेड़ काट रहे हैं। उन्हें कृषि के तहत कोई सुविधा नहीं मिलती है।

- बाग मालिक अमरेश मिश्रा के मुताबिक कीटों की वजह से कीटनाशन का छिड़काव करना मजबूरी है। पहले एक बार में काम चल जाता था, अब इनकी संख्या पांच से सात बार हो चुकी है। दूसरी तरफ यहां फसल की कीमत में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। इसके चलते आम बाग अब घाटे का सौदा हो गया है। यही वजह है कि क्षेत्र में नए पौधे नहीं रोपे जा रहे हैं और दूसरी ओर एक के बाद एक बाग कटते जा रहे हैं।

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