यहां कोई और नहीं, अपने ही हैं मोदी के दुश्मन
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प्रदेश की इन सीटों पर मोदी लहर के बावजूद भाजपा को मुंह की खानी पड़ सकती है, इसका कारण मजबूत प्रतिद्वंदी की मौजूदगी नहीं अपनों का ही दुश्मन होना है।
मोदी की लहर के बावजूद कुछ स्थानों पर भाजपा की राह में खड़ी मुश्किलें पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई हैं। मुश्किलें भी बाहर वालों के कारण नहीं बल्कि अपनों के चलते हैं।
इन्हें खत्म करने के लिए संघ परिवार के कई लोगों को लगाया गया है लेकिन स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है।
कुछ जगहों पर बाहरी व इलाकाई का झगड़ा है तो कुछ पर पर बाहर से आए प्रत्याशियों के तंत्र और संगठन में तालमेल नहीं बैठ पा रहा है।
यहां की कहानी है अनसुलझी
भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी इस बात पर है कि कीर्तिवर्धन को टिकट दिलाने वाले पार्टी नेता अभी तक कीर्तिवर्धन के पिता आनंद सिंह से न तो सपा से त्यागपत्र दिला पाए और न विधानसभा की सदस्यता से।
इसी नाराजगी और उपेक्षा के चलते कई बार के पार्टी विधायक रामप्रताप सिंह भाजपा छोड़ सपा में शामिल हो चुके हैं।
बरेली में पूर्व मंत्री व कई बार के सांसद संतोष गंगवार की मुसीबतों को पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) रामलाल के दौरे ने कुछ कम कर दिया है।बावजूद इसके खेमेबाजी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है।
मनमुटाव के कारण नहीं हो रहा प्रचार
यहां भाजपा नेताओं के तालमेल के अभाव में प्रचार व प्रबंधन भी बिखरा-बिखरा है। डुमरियागंज में जगदंबिका पाल भाजपा में आए तो थे सांसदी पक्की करने लेकिन अजीबोगरीब स्थिति बन गई है।
इसके चलते न सिर्फ उनका रास्ता बल्कि पार्टी का रास्ता मुश्किलों भरा हो गया है। पाल के साथ न उनके पुराने साथी कांग्रेसी आए न भाजपा के लोग ही हैं।
भाजपा के नाराज कई कार्यकर्ता घर बैठे हैं तो कई ने भाजपा विधायक जयप्रताप सिंह की पत्नी का झंडा उठा लिया है, जो अब कांग्रेस के टिकट पर पाल से मुकाबिल हैं। अन्य कई सीटों पर भी इसी तरह की मुश्किलें दिखाई दे रही हैं।
जिसमें से कुछ ऐसी सीटें हैं जहां भाजपा को कड़ी टक्कर मिल रही है।
अलग-अलग तरह की मुश्किलें
सीतापुर में ऊपरी तौर पर भले ही स्थिति सामान्य होती दिख रही हो लेकिन अंदरूनी तौर पर हालत चिंताजनक ही बने हुए हैं।
भदोही में टिकट न मिलने से नाराज रामरती बिंद पार्टी छोड़ चुके हैं। यहां प्रत्याशी घोषित वीरेन्द्र सिंह मस्त व संगठन के लोगों में अभी पूरी तरह से तालमेल बैठ नहीं पा रहा है।
गाजीपुर की स्थिति काफी दिलचस्प हो गई है। पूर्व सांसद मनोज सिन्हा यहां से अरुण सिंह को उम्मीदवार बनाने की पैरवी कर रहे थे पर, पार्टी ने मनोज सिन्हा को ही यहां टिकट दे दिया।
सबकी अपनी अपनी मुश्किलें
उधर, टिकट न मिलने से नाराज अरुण सिंह का खेमा भी विरोध का झंडा उठाए है। पूरी ताकत लगाने के बावजूद भाजपा जौनपुर में स्वामी चिन्मयानंद व यहां की विधायक सीमा द्विवेदी की संयुक्त ताकत को पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में नहीं जुटा पाई है।
मतलब साफ है कि मोदी लहर के बावजूद अपनों की नाराजगी इन सीटों पर भजपा को भारी पड़ सकती है। खास बात है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इन सबसे बेखबर दिखता है।
लिहाजा इन सीटों पर भाजपा को झटका लग सकता है, इसके अलावा प्रदेश प्रभारी अमित शाह पर भी चुनाव आयोग द्वारा प्रचार के लिए रोक लगाए जाने से भाजपा की मुश्किलें बढ़ गई हैं।