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हाथ की लकीरों से जिंदगी नहीं बनती: मिल्खा सिंह
शैलेष अरोरा/लखनऊ
Updated Fri, 20 Dec 2013 01:46 AM IST
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‘हाथ की लकीरों से जिंदगी नहीं बनती, अजम हमारा भी कुछ हिस्सा है जिंदगी बनाने में...’ जो लोग सिर्फ भाग्य के सहारे रहते हैं वह कभी सफलता नहीं पा सकते।
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सफलता के लिए कठोर परिश्रम और संघर्ष करना पड़ता है। इसकी जिंदा मिसाल हैं फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह। मिल्खा सिंह गुरुवार को राजधानी के मेहमान बने।
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इस उन्होंने अपने दिल की कई बातें साझा की। उन्होंने कहा कि देश में प्रशिक्षकों और खिलाड़ियों के भीतर जीत का जज्बा न होने के कारण आज भी देश ओलंपिक पदक के लिए तरस रहा है।
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इस दौरान उन्होंने युवाओं से क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों की ओर भी ध्यान देने का आह्वान किया। जयपुरिया स्कूल के एक कार्यक्रम में आए मिल्खा ने कहा कि पहले खिलाड़ियों को मेडल जीतने पर पैसा नहीं मिलता था।
लेकिन आज तो कोई एक भी मेडल ले आए तो उस पर रुपयों की बरसात होने लगती है। मुझे आज भी याद है जब 1958 के कॉमनवेल्थ गेम्स में मैंने गोल्ड मेडल जीता तो मुझे पंडित जवाहर लाल नेहरू जी की तरफ से पूछा गया कि क्या चाहिए।
मैंने उनसे कहा कि अगर कुछ देना है तो एक दिन के लिए देश में अवकाश घोषित कर दें। मैं चाहता तो आसानी से जमीन या पैसा मिल सकता था लेकिन ऐसा नहीं किया।
पहले खिलाड़ी पैसे के लिए नहीं देश के लिए खेलता था। आज भी ऐसे कई खिलाड़ी हैं। लेकिन यह भी सच है कि रुपयों की चमक ने कहीं न कहीं खिलाड़ियों को प्रभावित किया है।
मिल्खा ने कहा कि अपने जीते जी मैं भारत में वह मेडल आते देखना चाहता हूं जो मैंने रोम ओलंपिक में खोया था। मैं देश में बस पांच-छह एथलीटों को ही जानता हूं।
गुरबचन रंधावा, श्रीराम, पीटी ऊषा, अंजू बॉबी जॉर्ज और सुधा सिंह। मेरी यह दिली इच्छा है कि देश का कोई न कोई एथलीट ऐसा हो जो दौड़े तो कोई उसे छू न पाए।
इस दौरान जब मिल्खा सिंह से पूछा गया कि क्या उनके जीवन पर बनी फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ से उन्हें नई पहचान मिली है। इस पर उन्होंने कहा कि मिल्खा को लोग जानते हैं।
लेकिन युवा पीढ़ी ने मिल्खा को इस फिल्म से ही जाना है। उन्होंने कहा कि ऐसी फिल्में बननी चाहिए क्योंकि कहीं न कहीं ये इनकी कहानियां युवाओं में उत्साह बढ़ाने का काम करती हैं और उनके जीवन की दिशा तय करती हैं।
कई युवाओं को इससे संघर्ष करने की प्रेरणा भी मिलती है। वहीं, जब उनसे पूछा गया कि खेल मंत्री के लिए किसी खिलाड़ी को न चुनने का केंद्र का निर्णय सही है क्या।
इस उन्होंने इस निर्णय को नकारते हुए कहा कि यह बिलकुल भी सही नहीं है। बल्कि मैंने तो सचिन तेंदुलकर को खेल मंत्री बनाने के लिए सुझाव भी दिया था।
असल में एक खिलाड़ी ही खेल और उसकी जरूरत को समझ सकता है, कोई राजनेता नहीं। राज्य और केंद्र सरकार दोनों ही जगह खेलमंत्री के लिए किसी खिलाड़ी को चुना जाना चाहिए। ऐसा करने से देश में खेल की दशा सुधरेगी।