{"_id":"5dcd38ea8ebc3e5af9334b02","slug":"memories-related-to-lucknow-university","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"'वीसी ने लड़ा था क्रांतिकारियों के खिलाफ केस, लखनऊ यूनिवर्सिटी पर लगा ताला'","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
'वीसी ने लड़ा था क्रांतिकारियों के खिलाफ केस, लखनऊ यूनिवर्सिटी पर लगा ताला'
Thu, 14 Nov 2019 04:52 PM IST
ishwar ashish
सचिन त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
सचिन त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Thu, 14 Nov 2019 04:52 PM IST
विज्ञापन
लखनऊ यूनिवर्सिटी
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लखनऊ विश्वविद्यालय का गौरवशाली इतिहास सिर्फ शिक्षा तक ही सीमित नहीं रहा है। बात जब देशप्रेम की आई तो विद्यार्थी से लेकर शिक्षक तक अंग्रेजों के खिलाफ सभी एकजुट हो गए। अंग्रेजों का सहयोग करने और क्रांतिकारियों का विरोध करने वालों को भी छात्रों के कोप का सामना करना पड़ा।
इस कोप से पूर्व कुलपति पंडित जगत नारायण ‘मुल्ला’ (जो काकोरी ट्रेन डकैती मामले में क्रांतिकारियों के खिलाफ सरकारी वकील थे) भी नहीं बच पाए। उनका विरोध इतना बढ़ा कि लखनऊ विश्वविद्यालय अनिश्चितकाल के लिए बंद करना पड़ा। आजादी की लड़ाई में नौ अगस्त 1925 को हुई काकोरी ट्रेन डकैती एक बड़ी घटना है।
लखनऊ और लखनऊ विश्वविद्यालय से इसका गहरा नाता रहा है। इस मामले में क्रांतिकारियों के खिलाफ हजरतगंज स्थित जीपीओ भवन में मुकदमे की सुनवाई हुई। अंग्रेजों की तरफ से सरकारी वकील के रूप में जगत नारायण मुल्ला ने इसका केस लड़ा। करीब 10 महीने इसकी सुनवाई हुई।
विज्ञापन
इसमें रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह तथा अशफाक उल्लाह खां को फांसी तथा अन्य 13 लोगों को सजा हुई थी। वर्ष 1930 में पंडित जगत नारायण ‘मुल्ला’ को लखनऊ विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया। लविवि के रिकॉर्ड बताते हैं कि क्रांतिकारियों के खिलाफ मुकदमा लड़ने की वजह से उन्हें जबर्दस्त विरोध झेलना पड़ा।
विज्ञापन
इस कोप से पूर्व कुलपति पंडित जगत नारायण ‘मुल्ला’ (जो काकोरी ट्रेन डकैती मामले में क्रांतिकारियों के खिलाफ सरकारी वकील थे) भी नहीं बच पाए। उनका विरोध इतना बढ़ा कि लखनऊ विश्वविद्यालय अनिश्चितकाल के लिए बंद करना पड़ा। आजादी की लड़ाई में नौ अगस्त 1925 को हुई काकोरी ट्रेन डकैती एक बड़ी घटना है।
विज्ञापन
लखनऊ और लखनऊ विश्वविद्यालय से इसका गहरा नाता रहा है। इस मामले में क्रांतिकारियों के खिलाफ हजरतगंज स्थित जीपीओ भवन में मुकदमे की सुनवाई हुई। अंग्रेजों की तरफ से सरकारी वकील के रूप में जगत नारायण मुल्ला ने इसका केस लड़ा। करीब 10 महीने इसकी सुनवाई हुई।
विज्ञापन
इसमें रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह तथा अशफाक उल्लाह खां को फांसी तथा अन्य 13 लोगों को सजा हुई थी। वर्ष 1930 में पंडित जगत नारायण ‘मुल्ला’ को लखनऊ विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया। लविवि के रिकॉर्ड बताते हैं कि क्रांतिकारियों के खिलाफ मुकदमा लड़ने की वजह से उन्हें जबर्दस्त विरोध झेलना पड़ा।
काकोरी कांड के अभियुक्त के दाखिले की चंद्रभानु गुप्त ने की थी पैरवी
सजा से पहले ली गई काकोरी कांड के क्रांतिकारियों की तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी हुई तो विरोध ने आंदोलन का रूप ले लिया। माहौल इतना खराब हुआ है कि जुलाई 1931 को यहां अनिश्चितकाल के लिए ताला लगाना पड़ा। एक महीने की बंदी के बाद विवि 15 अगस्त को फिर से खुला।
काकोरी ट्रेन डकैती कांड के अभियुक्त शचींद्रनाथ ने वर्ष 1927-28 में लविवि में दाखिले के लिए आवेदन किया था। काकोरी कांड में अभियुक्त होने की वजह से लविवि ने उनको दाखिले से मना कर दिया था। मगर पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त (जो उस समय लविवि कोर्ट के सदस्य थे) ने उन्हें दाखिला देने की पैरवी की थी।
काकोरी ट्रेन डकैती कांड के अभियुक्त शचींद्रनाथ ने वर्ष 1927-28 में लविवि में दाखिले के लिए आवेदन किया था। काकोरी कांड में अभियुक्त होने की वजह से लविवि ने उनको दाखिले से मना कर दिया था। मगर पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त (जो उस समय लविवि कोर्ट के सदस्य थे) ने उन्हें दाखिला देने की पैरवी की थी।
जानिए, कब और क्यों लगा लखनऊ यूनिवर्सिटी पर ताला
छात्रसंघ भवन
- फोटो : अमर उजाला
जानिए, कब और क्यों लगा लखनऊ विवि पर ताला
1931- वीसी द्वारा क्रांतिकारियों के खिलाफ केस लड़ने की वजह से।
1947- फीस बढ़ोतरी पर।
1953- छात्रसंघ चुनाव के नियमों में बदलाव और एक छात्र की मौत।
1959- चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी और छात्रों की हड़ताल।
1965- परीक्षा फीस सात दिन पहले जमा कराने के मुद्दे पर।
1970- परीक्षा के दौरान पुलिस की ड्यूटी लगने पर ।
1973- पीएसी और छात्र आंदोलन।
1978- विवि में छात्र के रहने की अवधि अधिकतम 7 साल करने पर।
1997- छात्र की गिर तारी तथा गुंडा एक्ट लगाने की वजह से।
2006- लिंगदोह समिति के मुताबिक छात्रसंघ चुनाव कराने के फैसले पर।
1931- वीसी द्वारा क्रांतिकारियों के खिलाफ केस लड़ने की वजह से।
1947- फीस बढ़ोतरी पर।
1953- छात्रसंघ चुनाव के नियमों में बदलाव और एक छात्र की मौत।
1959- चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी और छात्रों की हड़ताल।
1965- परीक्षा फीस सात दिन पहले जमा कराने के मुद्दे पर।
1970- परीक्षा के दौरान पुलिस की ड्यूटी लगने पर ।
1973- पीएसी और छात्र आंदोलन।
1978- विवि में छात्र के रहने की अवधि अधिकतम 7 साल करने पर।
1997- छात्र की गिर तारी तथा गुंडा एक्ट लगाने की वजह से।
2006- लिंगदोह समिति के मुताबिक छात्रसंघ चुनाव कराने के फैसले पर।
वीसी के बेटे जगाते रहे आजादी की अलख
लखनऊ यूनिवर्सिटी में लगी मूर्तियां
- फोटो : अमर उजाला
एक ओर जहां कुलपति के विरोध की वजह से विवि पर ताला लगाना पड़ा। वहीं दूसरी ओर उनके पुत्र बृज नारायण मुल्ला उस समय भी जगह-जगह सभाएं करते रहे और आजादी की अलख जगाते रहे। बृज नारायण मुल्ला उस समय क्रिश्चियन कॉलेज यूनियन के अध्यक्ष भी थे।