'राम की धरती' पर चिंतन से बढ़ीं भगवा सेना की मुश्किलें!
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चित्रकूट का चिंतन भाजपा रणनीतिकारों की चिंता को और बढ़ा गया। वैसे यह बैठक बहुत चुनिंदा लोगों की थी। फिर भी उन्होंने सांसदों व मंत्रियों की कार्यशैली पर जैसे सवाल उठाए, चुनौतियों का जिक्र करते हुए पदों पर बैठे लोगों की कार्यशैली पर टीका टिप्पणी की, पार्टी में सामूहिक निर्णय की परंपरा रोकने की बात उठी, पुराने लोगों को दरकिनार करने का मामला उठा, फैसलों में कार्यकर्ताओं की राय की अनदेखी को संकट बताया गया, उसके बाद प्रदेश प्रभारी ओम माथुर और राष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री (संगठन) शिवप्रकाश की समझ में आ गया होगा कि यूपी में पार्टी के आगे बढ़ने की राह में एक-दो नहीं, ढेर सारी मुसीबतें हैं।
अगर कुछ लोगों की बैठक में शिकवा-शिकायत और एक-दूसरे को लेकर ऐसी खींचतान उजागर हो रही है तो अन्य कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों व नेताओं के दिल व दिमाग का हाल क्या होगा?
शायद इसीलिए शिव प्रकाश और माथुर ने पदों पर बैठे लोगों की मनमानी पर अंकुश लगाने का आश्वासन देना जरूरी समझा।
भाजपा नेताओं में मतभेद से मनभेद
काफी अरसे बाद प्रदेश भाजपा की किसी बैठक में पूर्व प्रदेश अध्यक्षों को बुलाया गया था। पर, ओमप्रकाश सिंह, डॉ. रमापति राम त्रिपाठी और सूर्यप्रताप शाही को छोड़ बाकी पूर्व अध्यक्षों ने दूरी बना ली। कल्याण सिंह और केशरी नाथ त्रिपाठी राज्यपाल बन चुके हैं।
इसलिए उनका न आना तो समझ में आता है लेकिन कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह और विनय कटियार का न आना यह साबित कर गया कि सूबे में भाजपा नेताओं के बीच मतभेद अब मनभेद तक पहुंच गए हैं।
हालांकि विनय कटियार बैठक में न जाने की वजह स्वास्थ्य खराब होना बताते हैं लेकिन पार्टी सूत्रों के अनुसार उनके न आने के पीछे मौजूदा प्रदेश नेतृत्व की तरफ से लंबे समय से किया जा रहा उपेक्षापूर्ण व्यवहार है। यही वजह कलराज और राजनाथ के न आने की भी रही।
जनता से दूर होते जा रहे भाजपाई सांसद
एक बार फिर यह साफ हो गया कि पार्टी के प्रदेश नेताओं के बीच उस स्तर का समन्वय व संवाद नहीं बन पाया है, जैसा भगवा खेमे का शीर्ष नेतृत्व चाहता है। रही-सही कसर पूरी कर दी बैठक में उठे इस सवाल ने कि चिंतन तो ठीक है लेकिन ऐसी बैठकों के निर्णयों और सामने आए निष्कर्षों पर ईमानदारी से काम करने का संकल्प लिए बगैर कुछ नहीं होगा।
इसके लिए पार्टी के मौजूदा नेतृत्व को पुराने और पूर्व नेताओं से निरंतर संवाद, संपर्क और समन्वय पर ध्यान देना होगा। सांसदों और मंत्रियों की मनमानी पर भी सवाल उठा। कहा गया कि सांसद जनता से दूर होते जा रहे हैं। मंत्रियों के यहां सुनवाई नहीं है।
उमा भारती के कामकाज से बुंदेलखंड में पनपी नाराजगी और उससे हुए नुकसान का जिक्र भी हुआ। कहा गया कि स्थानीय स्तर पर लोग समस्याओं के निराकरण के लिए कार्यकर्ताओं के पास आते हैं।
कार्यकर्ता नेताओं से कहते हैं लेकिन कुछ नहीं होता। इसे ठीक करने के बारे में सोचना होगा। पार्टी से जुड़े जनप्रतिनिधियों को लेकर जनता में नकारात्मक सोच बनती जा रही है। विधानसभा चुनाव में इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।
पदाधिकारियों पर लगाम, सामूहिक निर्णय पर जोर
इसीलिए माथुर व शिवप्रकाश ने आश्वस्त किया कि पार्टी में सामूहिक निर्णयों की परंपरा फिर शुरू होगी। ब्लाक से लेकर प्रदेश तक के पदाधिकारी परस्पर विचार-विमर्श और निश्चित फोरम पर बातचीत किए बगैर कोई निर्णय नहीं करेंगे।
सभी सांसदों व विधायकों को सदस्यता का कोटा सौंपने का फैसला करते हुए यह भी साफ कर दिया गया कि संगठन के फैसलों को सभी को मानना ही होगा।
प्रदेश सरकार के खिलाफ आंदोलन के बारे में हिदायत दी गई कि किसी प्रकरण पर तुरत-फुरत आंदोलन घोषित न हो जाए। परस्पर बात करके और पूरी तैयारी से इसकी घोषणा हो ताकि किरकिरी न हो।
जिले में जिलास्तरीय समस्या को लेकर आंदोलन हो तो क्षेत्रीय स्तर पर उस क्षेत्र की समस्याओं को लेकर। प्रदेश स्तर पर कानून-व्यवस्था या पूरे प्रदेश के मामलों को लेकर आंदोलन चलाए जाएं।