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...तो भाई आनंद के लिए माया मैडम ने करीबी नसीमुद्दीन पर चलाया चाबुक!

Thu, 11 May 2017 07:12 PM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 11 May 2017 07:12 PM IST
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mayawati sacks naseemuddin to give power to her brother
मायावती के भाई आनंद कुमार
बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी के कद्दावर नेता रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी को जिस समय पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया है, उनकी आगे की सियासी रणनीति के संकेत मिलने लगे हैं। 
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माना जा रहा है कि मुस्लिमपरस्ती का ठप्पा हटाने और अपने भाई आनंद कुमार का प्रभुत्व स्थापित करने के लिए मायावती ने सिद्दीकी पर बर्खास्तगी का चाबुक चलाया।
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बसपा में मायावती के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी नंबर दो के नेता माने जाते रहे हैं। न सिर्फ पार्टी के मूल संगठन में राष्ट्रीय महासचिव के रूप में उनकी अहम भूमिका होती थी, बल्कि बहुजन वालंटियर फोर्स (बीवीएफ) का नियंत्रण भी उनके हाथ में नजर आता था। 
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सिद्दीकी मुस्लिम चेहरा होने के साथ भीड़ जुटाऊ नेता भी माने जाते थे। मायावती अपनी ऐतिहासिक रैलियों के प्रबंधन में सिद्दीकी की भूमिका की खुले मंच से तारीफ करती आई हैं। 

मुस्लिम चेहरा होने की वजह से नहीं किया था साइडलाइन

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नसीमुद्दीन ‌‌स‌िददीकी
बसपा से बाहर निकले कई नेता खुलेआम यह आरोप लगाते रहे हैं कि मायावती टिकट के लिए जो पैसे लेती हैं, वे वाया सिद्दीकी ही उन तक पहुंचते रहे हैं। बसपा अध्यक्ष के इतने करीबी होने की वजह से सिद्दीकी पार्टी के दूसरे कई नेताओं की आंख के किरकिरी भी थे। 

पर, सिद्दीकी मुस्लिम चेहरा होने की वजह से कभी भी साइडलाइन नहीं किए जा सके। इस विधानसभा चुनाव तक सिद्दीकी का बसपा अध्यक्ष पर प्रभाव काफी गहरा हो गया था। 

माना जाता है कि सूबे में मुस्लिमों की आबादी से ज्यादा एक चौथाई टिकट (403 विधानसभाओं में करीब 99 प्रत्याशी) मुस्लिम प्रत्याशियों को दिए जाने में सिद्दीकी की मुख्य भूमिका रही है। 

बीच चुनाव माफिया मुख्तार अंसारी व उनके बेटे को बसपा में शामिल किए जाने के पीछे भी सिद्दीकी को जिम्मेदार माना जाता रहा है। वे इन्हें शामिल कराने के वक्त मौजूद भी थे।

जानकार बताते हैं कि चुनाव बाद से लगातार हो रही समीक्षा में यह बात सामने आ रही थी कि पार्टी को मुस्लिम केंद्रित होकर चुनाव लड़ने से खासा नुकसान हुआ। यहां तक कि पार्टी के  बेस वोटर दलित भी नाराज हुए। बसपा अध्यक्ष पार्टी से मुस्लिमपरस्ती का ठप्पा हटाना चाहती हैं। 

नसीमुद्दीन की वजह से भाई को नहीं म‌िली तवज्जो

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आनंद कुमार
इसके अलावा मायावती ने अपने छोटे भाई आनंद कुमार को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर नंबर दो की पोजीशन दी। मगर, सिद्दीकी की सूबे में मुख्य भूमिका की वजह से उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं मिल पा रही थी। 

बताया जाता है कि बसपा अध्यक्ष सिद्दीकी को निकालना नहीं चाहती थीं। वे चाहती थीं कि उनकी कार्रवाई का संकेत समझकर सिद्दीकी खुद ही पार्टी छोड़ दें ताकि मुसलमानों में ज्यादा गलत संदेश न जाए। 

इस वजह से पहले सिद्दीकी के पर कतरते हुए यूपी में उनकी भूमिका लगभग खत्म की और मध्य प्रदेश भेजा गया। जब सिद्दीकी ने संकेत को नजरअंदाज करने की कोशिश की तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब सिद्दीकी के  बाहर होने के साथ ही आनंद पार्टी में मायावती के बाद ताकत के सीधे दूसरे केंद्र हो गए हैं।   

सिद्दीकी पर कानूनी शिकंजा बढ़ने का अंदेशा भी बना कारण

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नसीमुद्दीन सिद्दीकी - फोटो : amar ujala

- भाजपा की सरकार आने के बाद बसपाराज में चीनी मिलों की बिक्री की जांच का आदेश हुआ है। मायावती इस निर्णय से खुद को अलगकर सिद्दीकी को पहले ही जिम्मेदार ठहरा चुकी हैं। मायावती ने कहा था कि  गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग की मंत्री वे नहीं थीं बल्कि सिद्दीकी थे।

- बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ भाजपा नेता दयाशंकर सिंह ने आपत्तिजनक बात की तो माहौल बसपा के पक्ष में नजर आने लगा था। सिंह के बयान के विरोध में आयोजित धरना-प्रदर्शन की अगुवाई सिददीकी ने की थी। वहां सिंह की बेटियों के खिलाफ जिस तरह आपत्तिजनक बयानबाजी हुई, उससे बसपा को बैकफुट पर जाना पड़ा। पक्ष में बनता नजर आ रहा माहौल खिलाफ हो गया। सिद्दीकी सहित कई नेताओं के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज हुई। भाजपा के सत्ता में आने के बाद इस मामले की जांच तेज होने की संभावना है।

- स्मारक घोटाले की भी जांच हो चुकी है। इस मामले में पिछली सपा सरकार ने कोई निर्णय नहीं किया। भाजपा सरकार आने पर इस मामले के भी खुलने की अटकलें चल रही हैं। बसपा सुप्रीमो इस मामले में अपनी सफाई दे चुकी हैं। इसमें भी सिद्दीकी का नाम लिया जाता रहा है।

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