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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Mayawati prepares for assembly election 2017.

पंचायत चुनाव में जीत से माया के हौंसले बुलंद, जगी उम्मीद

Fri, 06 Nov 2015 11:56 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/ अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/ अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 06 Nov 2015 11:56 PM IST
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Mayawati prepares for assembly election 2017.

...अपर कास्ट ने अगर वोट दिया होता तो बसपा कभी चुनाव न हारती। बसपा के विधानसभा चुनाव हारने के पीछे स्मारकों के निर्माण से लोगों में गुस्सा पैदा होना वजह नहीं रहा है। हमारे दलित समाज ने बसपा को पूरा वोट दिया। अपर कास्ट भटक गई।

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मुस्लिमों का काफी बड़ा हिस्सा सपा के साथ चला गया। बसपा की तरफ से जिन लोगों पर इन जातियों के बीच सही बात रखने की जिम्मेदारी थी, वे यह कर नहीं पाए।

...दलितों ने तो बसपा को ही वोट दिया, पर अपर कास्ट गुमराह हो गई। उसका वोट नहीं मिला। सपा, कांग्रेस और भाजपा ने एक-दूसरे को अपना वोट ट्रांसफर कर दिया। बसपा में मौजूद इस समाज के लोग कुछ समझ नहीं पाए। इसी कारण लोकसभा चुनाव में बसपा हार गई।
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ये दोनों ही निष्कर्ष बसपा सुप्रीमो मायावती के 2012 में विधानसभा और 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद के हैं। अब पंचायत चुनाव के बाद बसपा को फिर सर्वसमाज की फिक्र सताने लगी है।
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इसी बृहस्पतिवार को पंचायत चुनाव की समीक्षा के लिए बुलाई गई संगठन की बैठक में माया ने 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए सर्वसमाज को जोड़ने के सिलसिले में कई निर्देश दिए।

इस तरह मुकाबले में आ गईं मायावती

Mayawati prepares for assembly election 2017.

यह अकारण नहीं है। अतीत के कुछ अनुभव और पंचायत चुनाव के नतीजों से निकले संकेत से उनके भीतर जगा उत्साह ही इसका प्रमुख कारण नजर आ रहा है। पंचायत चुनाव में जिस तरह बसपा और सपा के बीच सूबे में टक्कर हुई।

बसपा के तमाम उम्मीदवार सपा और भाजपा के प्रत्याशियों को पटखनी देकर विजयी हुए। उसी से बसपा को अपना रुख बदलने को मजबूर होना पड़ रहा है।

दरअसल, इन नतीजों से बसपा प्रमुख को लगने लगा है कि सपा सरकार को लेकर लोगों में जबर्दस्त नाराजगी है। यूपी के लोगों ने भले ही लोकसभा चुनाव में भाजपा को सूबे की 80 सीटों में 73 पर जिता दिया हो, लेकिन कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर लोगों का बसपा पर भरोसा कायम है। तभी पंचायत चुनाव में बसपा को इतना समर्थन मिला है।

राजनीति की परिपक्व खिलाड़ी मायावती को यह भली-भांति पता हो गया है कि पंचायत चुनाव में बसपा के उभार में अपर कास्ट से लेकर गैर यादव पिछड़ी जातियों व मुस्लिमों का भी बड़ा सहयोग रहा।

इस वजह से बने अनुकूल समीकरणों ने ही बसपा का झंडा-बैनर लगाकर गांवों में घूम रहे लोगों को जिला पंचायत व क्षेत्र पंचायत सदस्य के चुनाव में मुकाबले में ला दिया।

जमीनी समीकरण मजबूरी

Mayawati prepares for assembly election 2017.

लंबे समय तक बसपा के संस्थापक कांशीराम के साथ काम कर चुकीं माया को अच्छी तरह पता है कि सूबे की 24 प्रतिशत दलित आबादी के सहारे ही प्रदेश की सत्ता हासिल नहीं हो सकती। ऐसा होता तो उनकी सरकार 2007 से पहले ही न जाने कब की बन जाती।

वे यह भी जानती हैं कि कांशीराम को सत्ता व संगठन की मजबूती के लिए ‘तिलक-तराजू और तलवार इनको मारो ...चार’ जैसे नारे को छोड़ना पड़ा था। तब जाकर ही 2007 में सूबे में उनकी पूर्ण बहुमत वाली सरकार बन पाई थी। मायावती ने इसे सर्वसमाज की सरकार बताया भी था।

यह भी है वजह : माया को तभी से पता है कि ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, पिछड़ों व मुस्लिम चेहरों को महत्व देना सत्ता में आने की एक बड़ी वजह रहा था। जगह-जगह बनाई गई भाईचारा कमेटियों ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

टिकट बंटवारे में बसपा ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों को छोड़कर शेष जगह पर जिस तरह दूसरी जातियों के उम्मीदवारों को लड़ाया, उससे वे यह संदेश देने में कामयाब रहीं कि बसपा वाकई बदल गई है। सभी को साथ जोड़कर ले चलने वाली राजनीतिक पार्टी बन चुकी है।

यह समीकरण भी महत्वपूर्ण : प्रदेश में दलितों की लगभग 24 प्रतिशत आबादी के अलावा पिछड़ों व सामान्य वर्ग की जातियों की आबादी क्रमश: लगभग 54 और 21 प्रतिशत है। सामान्य और पिछड़ी जातियों में लगभग 19 प्रतिशत मुस्लिम आबादी मानी जाती है। इस आधार पर नजर दौड़ाएं तो पंचायत चुनाव से बसपा के भीतर 2017 को लेकर जगी आस को हकीकत में तब्दील करने के लिए सर्वसमाज का नारा बुलंद करना जरूरी हो गया है।

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