सत्ता पाने के लिए माया ने बनाए तीन 'पावर प्लान'
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बसपा सुप्रीमो मायावती लोकसभा चुनाव में खोई सियासी जमीन फिर से वापस पाने के मिशन में जुट गई हैं। इसके लिए त्रिस्तरीय रणनीति बनाई गई है। अब पार्टी नेता इसे मूर्तरूप देने में जुट गए हैं।
लोकसभा चुनाव में बेहद निराशाजनक प्रदर्शन के बाद बसपा के सामने पार्टी का राष्ट्रीय दल होने का दर्जा बरकरार रखने और जनाधार बढ़ाने की चुनौती है।
सार्वजनिक रूप से स्वीकार न करने के बावजूद मायावती को इस बात का बखूबी अंदाजा है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी के बेस दलित वोट ने तमाम सीटों पर भाजपा को वोट दिया है।
इसके अलावा उपचुनाव न लड़ने के फैसले से उसके पास छह माह में दोबारा गैर बसपा दल के साथ खड़े होने का मौका है।
जानिए, क्या है माया का पहला प्लान
लोकसभा चुनाव में अपने बेस मतदाताओं के बिखरने का खामियाजा भुगतने के बाद बसपा ने उपचुनाव की रणनीति बदल दी है।
राष्ट्रीय सम्मेलन में मायावती ने साफ किया कि कार्यकर्ता पार्टी समर्थक मतदाताओं के बीच जाकर चुपचाप बताएंगे कि वे सपा और भाजपा को वोट न देकर निर्दल प्रत्याशी को वोट करें।
बसपा के लोग यह काम कितना ठीक से कर सके इसे जानने के लिए पार्टी उस निर्दल प्रत्याशी का नाम भी बताएगी। निर्दल प्रत्याशी का नाम पार्टी के वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य व राम अचल राजभर तय करेंगे।
बसपा कार्यकर्ता न तो इस निर्दल प्रत्याशी का झंडा लगाएंगे और न ही उसके साथ प्रचार करेंगे। वे केवल अपने समर्थक मतदाताओं को उसे वोट देने को तैयार करेंगे।
कांशीराम को बनाया दूसरा प्लान
बसपा मीडिया की इस चर्चा पर भी बेहद सतर्क हो गई है जिसमें कांशीराम को भारत रत्न देने की बात कही जा रही है। मायावती ने सम्मेलन में जोर देकर समझाया कि कांग्रेस ने डॉ. अंबेडकर को आजादी के कई दशक बाद तक भारत रत्न नहीं दिया।
डॉ. अंबेडकर को यह सम्मान देने का काम वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री रहते किया। वह भी बसपा की मांग पर। लेकिन तब भाजपा मंडल छोड़कर कमंडल पर चली गई।
कहा भाजपा कांशीराम को भारत रत्न देने वाली नहीं है। वह दलितों को गुमराह करने के लिए ऐसा कर रही है। यह बात गांव-गांव कैडर के बीच जाकर समझाना है। इसके अलावा मोदी सरकार द्वारा प्राइवेटाइजेशन पर जोर देने से दलितों को किस तरह नुकसान होने वाला है, यह भी बताएंगे।
केजरीवाल जैसा तीसरा मायावी प्लान
विधानसभा के आम चुनाव हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड व जम्मू काश्मीर में होने हैं। पार्टी को अपनी मान्यता बनाए रखने के लिए इन प्रदेशों के चुनाव में जनाधार बढ़ाने की चुनौती है।
इसके बाद पार्टी का फोकस यूपी विधानसभा चुनाव होगा। ऐसे में पार्टी का खर्च बढ़ना लाजिमी है। सत्ता में न होने से पार्टी को आगे आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े, मायावती ने इस पर अभी से ध्यान देना शुरू कर दिया है।
उन्होंने पार्टी नेताओं व समर्थकों से इन चुनावों में सहयोग के लिए आर्थिक मदद की अपील की है। पार्टी के समर्थक व कार्यकर्ता अपने स्तर पर पार्टी का आर्थिक सहयोग करेंगे।