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पश्चिमी यूपी का मुस्लिम मन समझने में लगीं मायावती, कैराना के बहाने जाट-दलित समीकरण भी परखने की कोशिश

Wed, 28 Mar 2018 11:36 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 28 Mar 2018 11:36 AM IST
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mayawati is preparing strategy for kairana and noorpur byelection
बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : amar ujala
उपचुनाव में अब किसी दल का समर्थन न करने का बसपा सुप्रीमो मायावती का एलान यूं ही नहीं है। इसके पीछे गठबंधन का आगे का गणित समझने और उस आधार पर बात करने की रणनीति छिपी दिखी रही है।
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प्रदेश में लोकसभा की कैराना और विधानसभा की नूरपुर सीट पर उपचुनाव होने हैं। मायावती खासतौर से पश्चिमी उप्र का मुस्लिम मन समझना चाहती है। साथ ही जाट व दलितों के रुख और उससे बनने वाले समीकरण की शक्ति को परखना चाहती हैं। भाजपा सांसद हुकुम सिंह और विधायक लोकेन्द्र चौहान के निधन के चलते ये दोनों सीटें रिक्त हैं।
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दरअसल, उपचुनाव में किसी का समर्थन न करने के मायावती के फैसले की वजह समझने के लिए यह याद रखना जरूरी है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कैराना से हिंदुओं के पलायन को मुद्दा बनाया था। उस समय भाजपा के स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ ने पश्चिमी उप्र की लगभग सभी सभाओं में कहा था, ‘कैराना को कश्मीर नहीं बनने देंगे।’
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इस मुद्दे के सूत्रधार कैराना से सांसद हुकुम सिंह ही थे। उन्होंने तत्कालीन सपा सरकार पर निशाना साधते हुए उसकी मुस्लिम तुष्टीकरण नीति को हिंदुओं के पलायन की वजह बताया था। लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने मुजफ्फरनगर दंगा, हिंदुओं के उत्पीड़न और मुस्लिम तुष्टीकरण का मुद्दा उठाया था। पश्चिमी यूपी में इस मुद्दे के चलते वोटों का जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ। हालांकि, कैराना से हुकुम सिंह की बेटी मृगांका विस चुनाव नहीं जीत पाईं।

इसलिए हो रही कवायद

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मायावती पश्चिमी उप्र के सामाजिक समीकरण तथा वहां के लोगों के दिल दिमाग में चल रही हलचल को कैराना की कसौटी पर परखना चाहती हैं। लोकसभा की कैराना सीट पर  चार लाख से अधिक मुस्लिम, लगभग डेढ़ लाख जाटव और लगभग इतने ही जाट हैं। पिछले कुछ दिनों से वहां जाट और मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों की अगुवाई में गांव-गांव बैठकें करके दोनों के बीच सुलह कराने का सिलसिला चल रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर तनाव कम हुआ है और परिस्थितियां बदली हैं।

मायावती इन्हीं बदले हालात की जमीनी सच्चाई समझना चाहती हैं। अभी यह नहीं पता कि कैराना में सपा लड़ेगी या वह और कांग्रेस मिलकर वहां रालोद को लड़ाएंगे। पर, जो भी लड़ेगा उसके नतीजे मायावती के आगे के लिए फैसला करने की राह आसान कर देंगे। मुस्लिम और जाट यदि भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर वोट करेगा तो मायावती को पता चल जाएगा कि इन दोनों वर्ग में वैसा बंटवारा अब नहीं है जैसा 2014 और 2017 में था।

ऐसे में वह पश्चिमी उप्र की कई सीटों पर दलितों और उनमें भी खासतौर से जाटव की बड़ी मौजूदगी के सहारे भावी गठबंधन से जाट व मुस्लिम के वोटों को जोड़कर भविष्य की तैयारी कर सकती हैं। अगर जाट व मुस्लिम एक साथ न दिखे तो वह कुछ और फैसला करेंगी। वैसे, अजित सिंह ने राज्यसभा चुनाव में बसपा को वोट न देने वाले अपने विधायक को पार्टी से निकालकर यह संदेश दिया है कि वह मायावती के साथ हैं।
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