यूपी: मायावती का 'वोट ट्रांसफर फॉर्मूला' भी पिटा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
निर्दलीय प्रत्याशियों को अपने मतदाताओं का वोट ट्रांसफर कराने का बसपा का फॉर्मूला नाकाम साबित हुआ। बसपा ने जिन निर्दलीय प्रत्याशियों को समर्थन किया, उनमें से कोई भी इतना वोट नहीं पा सका कि उसे बसपा के समर्थन से मिला हुआ माना जा सके।
लोकसभा चुनाव में भी मुंह की खाने के बावजूद पार्टी के साथ दलितों की चट्टानी एकता के दावे की भी पोल खुल कर सामने आ गई है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने रणनीति के लिहाज से उपचुनाव में प्रत्याशी न उतारने का ऐलान किया था।
साथ ही अपने कार्यकर्ताओं के जरिये पार्टी समर्थक मतदाताओं को संदेश भिजवाया था कि वे सपा अथवा भाजपा को किसी भी दशा में वोट न करें। बसपा जिस निर्दल प्रत्याशी का समर्थन करे, उसे वोट दें।
हर सीट पर 15-22 फीसदी दलित
प्रदेश की ज्यादातर सीटों पर दलितों की भागीदारी 15 से 22 प्रतिशत तक है। विश्लेषकों के अनुसार बसपा ने वोट ट्रांसफर रणनीति के जरिये संभवत: लोकसभा चुनाव में दलितों के साथ न देने की चर्चा का जवाब देने की योजना बनाई थी।
यदि बसपा समर्थित प्रत्याशी अच्छा वोट पाते तो बसपा दलितों के समर्थन का दमदारी से दावा करती। लेकिन नतीजों ने उसके मंसूबे पर पानी फेर दिया।
पार्टी के एक नेता दु:ख जताते हैं कि उपचुनाव न लड़ने का फैसला गलत साबित हुआ। पार्टी का वर्कर इसके लिए तैयार नहीं था। कई सीटों पर पार्टी मजबूत स्थिति में थी।
भाजपा से नाराज मतदाता ने बसपा को विकल्प में न देखकर सपा को वोट किया। बलहा में बसपा के अच्छे कार्यकर्ताओं को सपा ने टिकट देकर चुनाव जीत लिया।
बसपा यदि उपचुनाव लड़ती और न भी जीतती तो भी कैडर एकजुट रहता। निर्दल का समर्थन करने से दलितों पर ढीली पकड़ की ढकी-छिपी कमजोरी भी उजागर हो गई।
बसपा के वोट तक फटके भी नहीं समर्थित निर्दल
राजधानी लखनऊ में बसपा ने पूर्व एमएलसी व निर्दल प्रत्याशी एसपी सिंह को समर्थन दिया था। इस सीट पर बसपा को पिछले विधानसभा चुनाव में 28040 जबकि लोकसभा चुनाव में 14615 वोट मिले थे। सिंह 7115 वोट ही पा सके।
उनकी सियासी पृष्ठभूमि के हिसाब से यह नहीं कहा जा सकता कि ये वोट बसपा समर्थन के नाते मिले। विधानसभा की सहारनपुर सीट पर बसपा को पिछले विधानसभा चुनाव में 36140 जबकि लोकसभा चुनाव में 15101 वोट मिले थे।
इस चुनाव में समर्थित निर्दल को महज 132 वोट मिले। इसी तरह नोएडा सीट पर पार्टी को लोकसभा में 49 हजार से ज्यादा जबकि विधानसभा में 26 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। यहां समर्थित प्रत्याशी को 312 वोट ही मिले।
बाकी सीटों पर भी बसपा बेहाल
इसी तरह बहराइच की बलहा सीट पर लोकसभा में 38895 व लोकसभा में 28431 वोट मिले थे। उपचुनाव में समर्थित निर्दल 3799 वोट ही मिला।
वाराणसी के बसपा समर्थित निर्दल को 30 हजार से अधिक वोट जरूर मिले हैं। पर, वहां इस बात की खुली चर्चा रही कि अपना दल को सीट दिए जाने से नाराज भाजपा समर्थकों ने उसकी ज्यादा मदद की।
मैनपुरी लोकसभा केउपुचनाव में बसपा समर्थित निर्दल राम सरन को 2259, सिराथू विधानसभा सीट से पुनीत कुमार मौर्या को 2266, निघासन खीरी से संतोष सिंह कुशवाहा 1235, हमीरपुर में ओम प्रकाश को 1412, चरखारी महोबा में देवेंद्र सिंह को 1467, बिजनौर से मोहनलाल को 1017 तथा ठाकुरद्वारा से महिपाल सिंह को महज 2449 वोट मिले।