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39 साल पहले हुई हत्या में रिकॉर्ड के अभाव में आरोप बरी
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लखनऊ। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अहम नजीर वाले एक फैसले में 39 साल पहले हुई हत्या के मामले के सजायाफ्ता आरोपी को रिकॉर्ड के अभाव में बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि कानूनन अपील को निर्णीत करने के लिए निचली अदालत के रिकॉर्ड को देखना जरूरी है। कोर्ट ने 33 वर्ष से लंबित इस अपील के फैसले में कहा कि इस मामले में सत्र अदालत के चुनौती दिए गए निर्णय के अलावा केस से संबंधित और कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, ऐसे में करीब 39 साल पहले हुई घटना (हत्या) के पुन: ट्रायल की कोई संभावना नहीं है। अदालत ने अपील मंजूर कर तत्काल अपीलकर्ता की जेल से रिहाई का आदेश दिया है, अगर वह अन्य किसी केस में वांछित न हो।
न्यायमूर्ति वेद प्रकाश वैश और न्यायमूर्ति सरोज यादव की खंडपीठ ने यह अहम फैसला व आदेश चमन लाल की अपील पर दिया। हत्या की घटना वर्ष 1981 की थी जिसमें 1987 में लखनऊ की सत्र अदालत ने अपीलकर्ता को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस निर्णय के खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की, जिसे 5 फरवरी 1987 को कोर्ट ने विचारार्थ मंजूर करते हुए उसे जमानत पर रिहा कर दिया था। इसके बाद अपीलकर्ता के फरार होने पर कोर्ट ने उसके खिलाफ जब गिरफ्तारी वारंट जारी किया तो काफी समय बाद 10 फरवरी 2020 को उसकी गिरफ्तारी हुई और जेल भेजा गया।
जब अपील सुनवाई के लिए पेश ह़ई तो सिर्फ ट्रायल कोर्ट का निर्णय ही उपलब्ध हुआ। मामले में नियुक्त न्यायमित्र अधिवक्ता ने कोर्ट से कहा कि रिकॉर्ड के उपलब्ध न होने से अपील को गुण-दोष पर निस्तारित नहीं किया जा सकता। उधर, अपील का विरोध करते हुए सरकारी वकील का कहना था कि अपीलकर्ता ने एयू सिद्दीकी की हत्या की थी और अभियोजन की ओर से पेश किए गए सबूतों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने उसे सजा सुनाई। ऐसे में उसे सिर्फ रिकॉर्ड के अभाव में बरी नहीं किया जा सकता है।
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कोर्ट ने सुनवाई के बाद कहा कि कानूनन अपील को निर्णीत करने के लिए निचली अदालत के रिकॉर्ड को देखना जरूरी है। कोर्ट ने अपीलकर्ता को सत्र अदालत से सुनाई गई सजा के फैसले व आदेश को रद्द करते हुए उसे हत्या के इस केस में ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड के अभाव में और पुन: ट्रायल की कोई संभावना न होने पर बरी कर दिया।
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न्यायमूर्ति वेद प्रकाश वैश और न्यायमूर्ति सरोज यादव की खंडपीठ ने यह अहम फैसला व आदेश चमन लाल की अपील पर दिया। हत्या की घटना वर्ष 1981 की थी जिसमें 1987 में लखनऊ की सत्र अदालत ने अपीलकर्ता को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस निर्णय के खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की, जिसे 5 फरवरी 1987 को कोर्ट ने विचारार्थ मंजूर करते हुए उसे जमानत पर रिहा कर दिया था। इसके बाद अपीलकर्ता के फरार होने पर कोर्ट ने उसके खिलाफ जब गिरफ्तारी वारंट जारी किया तो काफी समय बाद 10 फरवरी 2020 को उसकी गिरफ्तारी हुई और जेल भेजा गया।
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जब अपील सुनवाई के लिए पेश ह़ई तो सिर्फ ट्रायल कोर्ट का निर्णय ही उपलब्ध हुआ। मामले में नियुक्त न्यायमित्र अधिवक्ता ने कोर्ट से कहा कि रिकॉर्ड के उपलब्ध न होने से अपील को गुण-दोष पर निस्तारित नहीं किया जा सकता। उधर, अपील का विरोध करते हुए सरकारी वकील का कहना था कि अपीलकर्ता ने एयू सिद्दीकी की हत्या की थी और अभियोजन की ओर से पेश किए गए सबूतों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने उसे सजा सुनाई। ऐसे में उसे सिर्फ रिकॉर्ड के अभाव में बरी नहीं किया जा सकता है।
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कोर्ट ने सुनवाई के बाद कहा कि कानूनन अपील को निर्णीत करने के लिए निचली अदालत के रिकॉर्ड को देखना जरूरी है। कोर्ट ने अपीलकर्ता को सत्र अदालत से सुनाई गई सजा के फैसले व आदेश को रद्द करते हुए उसे हत्या के इस केस में ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड के अभाव में और पुन: ट्रायल की कोई संभावना न होने पर बरी कर दिया।