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‘लोग मर्डर और जिस्म जैसी फिल्में देखने सिनेमाहॉल जाते हैं’

Wed, 21 Oct 2015 01:48 PM IST
Updated Wed, 21 Oct 2015 01:48 PM IST
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mahesh bhatt visits lucknow for khwabo ka safar

प्रसिद्ध फिल्मकार महेश भट्ट की पहचान भले ही ‘अर्थ’ और ‘सारांश’ जैसी फिल्मों से हो लेकिन उनका मानना है कि लोग तो ‘मर्डर’ और ‘जिस्म’ जैसी फिल्में ही देखने सिनेमा हाल जाते हैं। 19 अक्तूबर से शुरू इस कार्यक्रम के प्रमोशन के सिलसिले में मंगलवार को लखनऊ आए भट्ट से आलोक पराड़कर से हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

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किस तरह का कार्यक्रम है यह?
- फिल्म उद्योग आज जहां है वहां वह अपने पुरखों के कंधों पर ही बैठकर पहुंचा है। उन्होंने जो कुंआ खोदा है उसका पानी हम पी रहे हैं। यह कार्यक्रम प्रसिद्ध फिल्मकारों और स्टूडियो पर आधारित है। बाम्बे टॉकीज, आरके स्टूडियो, प्रभात स्टूडियो जैसे अनेक स्टूडियो के बारे में हम इसमें विस्तार से चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मकारों की यात्रा से गुजरते हुए लगता है कि सपने वही हैं, देखने वाले बदल जाते हैं। यह अपनी जड़ों से जुड़ने का प्रयास भी है।
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ऐसे कार्यक्रम तो पहले भी खूब आ चुके हैं। आपका कार्यक्रम किस प्रकार अलग है?
- इस कार्यक्रम के लिए काफी शोध किया गया है और संग्रहालयों से प्रसंग के अनुसार प्राचीन दृश्यों को प्रमुखता से शामिल किया गया है। जब हम राजकपूर की चर्चा करते हैं तो हम बताते हैं कि किस प्रकार ‘मेरा नाम जोकर’ जब आई तो वह फ्लाप हो गई। स्टूडियो बिकने की नौबत तक आ गई।  लेकिन राजकपूर ने ‘बॉबी’ के साथ फिर वापसी की और इस कथन को गलत साबित कर दिया कि ग्लैमर की दुनिया में दूसरा दौर नहीं होता है। फिल्म ने सफलता का नया इतिहास लिखा। फिर ‘राम तेरी गंगा मैली’ भी सफल हुई।
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‘हर चीज का दौर बदलता है’

mahesh bhatt visits lucknow for khwabo ka safar

आखिर क्या कारण होते हैं कि जो ‘जागते रहो’ और ‘श्री 420’ जैसी फिल्में बनाता रहा हो वह ‘बॉबी’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसी फिल्मों तक आ जाता है या फिर जिसने ‘अर्थ’ और ‘सारांश’ बनाई हो वह ‘मर्डर’ और ‘जिस्म’ जैसी फिल्में बनाने लगता है?
- देखिए ऐसी बात कहने का मतलब ही क्या है जिसे सुनने वाला कोई न हो? हर चीज का दौर बदलता है। पहले लोग मेहंदी हसन और जगजीत सिंह को सुनते थे अब हनी सिंह को सुनते हैं। ‘संगम’ और उसके बाद राजकपूर की फिल्मों में बदलाव आता है। फिल्म तो बिजनेस है। अगर वे चलती नहीं हैं तो उनको बनाने का कोई मतलब नहीं है।

आपके कहने का अर्थ यह है कि आज गंभीर फिल्में नहीं बनाई जा सकतीं?
- बनती हैं। ‘सिटी लाइट्स’ बनाई थी जो गांव से शहर आने वाले एक व्यक्ति के संघर्षों की कथा थी। अच्छी चर्चा हुई लेकिन इसने मामूली बिजनेस किया। ‘जख्म’ फिल्म बनाई थी, काफी चर्चा हुई, अजय देवगन को  पुरस्कार मिला लेकिन फिल्म ने बहुत कम व्यवसाय किया है। हम ‘मर्डर’ और ‘जिस्म’ की निंदा करते हैं लेकिन लोग देखने इन्हीं फिल्मों को जाते हैं।

हमारे मन में महेश भट्ट के प्रति जो आदर है वह उनकी ‘अर्थ’ और ‘सारांश’ जैसी फिल्मों के कारण ही है। पैसा कमाने की होड़ में तो आप भी भीड़ में शामिल माने जाएंगे?
-देखिए पुरस्कार और प्रशंसा से कुछ नहीं होता। हमारा घर भी चलना चाहिए। मैं तो पैसा कमाने ही घर से निकला था। मैं जिस तरह का सिनेमा बनाना चाहता था, उसे देखने वाले कितने लोग हैं?

निर्देशन आपने लंबे समय से छोड़ रखा है?
- हां फिल्में बनाता हूं, कहानियां लिखता हूं और फिल्में बनाने के बारे में शिक्षित करता हूं।

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