आधी आबादी का सच, तहजीब का शहर भी बेअदब
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अपनी तहजीब के लिए दुनिया में नजीर माना जाने वाला शहर-ए-अदब आखिर ‘वीमेन फ्रेंडली लखनऊ’ क्यों नहीं हो पा रहा है?
पुरुषों की कब्जाई मानसिकता क्या इतनी बेअदब हो गई है कि महिलाओं को छोटे-छोटे हकों की खातिर भी जूझना पड़ रहा है।
हकीकत के आईने में हमारे शहर की जो तस्वीर उभरती है, वह तो इसी कड़वे सच को पुख्ता करती है।
मगर तस्वीर का दूसरा पहलू इस बाबत मुतमइन करने वाला है कि हाल के दौर में महिलाओं ने अपने वजूद की जरूरी शर्त, उन हकों को पाने के लिए जंग की जुस्तजू को और धार दी है।
शहर-ए-तहजीब में महिलाओं के लिए कितना अदब है? यहां खुद को कितनी सुरक्षित महसूस करती हैं महिलाएं? सड़कों पर क्या वह बेखौफ होकर निकलती हैं या आज भी रात नौ बजे के बाद उन्हें घर पहुंचना ही उचित लगता है?
ऐसे कई सवाल लिए ‘अमर उजाला’ ने शहर की महिलाओं से जानने की कोशिश की कि अदब और तहजीब की पहचान रखने वाला लखनऊ महिलाओं की आकांक्षाओं पर कितना खरा है? जवाबों से जो निष्कर्ष सामने आए वे खुद सवाल छोड़ रहे हैं...
हर कदम दुश्वारियां
शहर कितना भी आधुनिक होने के दावे कर ले, लेकिन महिलाओं की सोच आज भी पुरानी सोच के इर्द-गिर्द ही है। राजधानी की महिलाएं इससे पार तो पाना चाहती हैं लेकिन सर्वे में आई इन वजहों के आगे बेबस हैं।
•अधिकतर महिलाएं मानती हैं कि आज भी रात नौ बजे के बाद घर से अकेले निकलना उनके लिए संभव नहीं।
•खाकी वर्दी में ड्यूटी करने वाली महिलाएं भी मानती हैं कि माहौल ही ऐसा है कि रात में कोई लड़की अकेले निकलने का साहस नहीं कर सकती।
•गलियों, वर्कप्लेस और घर, हर जगह महिलाओं को रोज सुरक्षा और भेदभाव की चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है।
•दरअसल इसके पीछे कहीं न कहीं खाकी भी जिम्मेदार है। जिन्हें मित्र पुलिस का दर्जा मिला है, वह भी समय पर मददगार नहीं होती।
•सिर्फ आर्थिक मोर्चे पर ही महिलाओं की सजगता, उनकी आत्मनिर्भरता एक सुखद एहसास कराती है।
बदल रही सोच, पर रफ्तार धीमी
लेकिन शहर की तस्वीर उतनी धुंधली भी नहीं है। बदलाव हो रहा है, सोच भी बदल रही है, हां लेकिन रफ्तार अभी धीमी है।
महिलाएं घर के फैसलों में भागीदार बन रही हैं। वजूद को असरदार बना रही हैं। उन्हें कौन सी जॉब करनी है, किस जॉब को छोड़ना है इसके फैसले खुद ले रही हैं।
घर में उनका दखल बढ़ा है। अहमियत बढ़ी है। पैतृक संपत्ति से लेकर फैमिली प्लानिंग तक हर जगह उनकी राय महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बदलाव की ये बयार सुखद अहसास कराने वाली है।
तस्वीर का दूसरा पहलू भी है
शहर धीरे-धीरे ही सही बदलाव को स्वीकार कर रहा है। जॉब से लेकर इन्वेस्टमेंट तक आज महिलाओं के फैसलों को तरजीह दिया जाने लगा है। सर्वे के कुछ सवाल, जिनके सकारात्मक जवाब मिले।
जॉब करने के फैसले खुद लेती हैं?
हां: 80 फीसदी
(यानी जॉब करने के फैसले में परिवार का दखल महज 20 फीसदी ही है।)
परिवार का हस्तक्षेप आपके इन्वेस्टमेंट में होता है?
हां: 50 फीसदी
(यानी 50 फीसदी मामलों में इन्वेस्ट के फैसले खुद करती हैं। )
सैलरी और उससे जुड़े खर्च में पति और परिवार सवाल-जवाब करते हैं?
हां: 20 फीसदी (यानी 80 फीसदी मामलों में सवाल नहीं उठाए जाते। भरोसा बढ़ रहा है।)
पैतृक संपत्ति में आपके हक को स्वीकार किया गया?
हां: 50 फीसदी (यानी हक को जमीन मिल रही है )
फैमिली प्लानिंग
क्या परिवार बढ़ाने का फैसला पति-पत्नी दोनों की सहमति से लिया?
हां: 70 फीसदी (राय में भागीदारी का महत्व बढ़ा है।)
परिवार नियोजन की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं पर ही है?
हां: 100 फीसदी (यानी इस मामले में पुरुषवादी मानसिकता हावी है।)
बेहतर हो सकते हैं हालात अगर
अगर इन मुद्दों पर ध्यान दिया जाए, तो हालात बदल सकते हैं।
•पैदाइशी हक से लेकर फैसले तक के हक में लैंगिक भेद समाप्त हो।
•समय पर जारी हों सरकारी आंकड़े, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
•शिक्षा को हथियार बनाएं, तब ही खुलेंगे विकास के दरवाजे।
•शिक्षा-स्वास्थ्य की नीति में लैंगिक नजरिए से लाना होगा बदलाव।
•स्कूलों के प्रबंधतंत्र व शिक्षक जेंडर के मु्ददे पर संवेदनशील हों।