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Lucknow News: इमामबाड़े पर कलई का कलंक
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गौरी त्रिवेदी
आसफ़ुद्दौला-ए-मरहूम की तामीर-ए-कुहन
जिसकी सनअ''त का नहीं सफ़्हा-ए-हस्ती पे जवाब।
लखनऊ। इमामबाड़ा के ऐतिहासिक महत्व और खूबसूरती का जो जिक्र चकबस्त ब्रिज नारायण अपनी इस नज्म में कर रहे हैं, उस खूबसूरती पर कलई का कलंक लगा डाला। जी-20 सम्मेलन के अवसर पर मेहमानों की खातिरदारी के नाम पर उसे ऐसा रंगा कि वह अपना मूल रंग ही खो बैठा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) महीनों इस मसले पर चुप रहा और आज जब सवाल उठ रहे हैं, तो जिम्मेदारी की गेंद दूसरे के पाले में डाल रहा है।
पुराने जमाने पर चूने में रंग मिलाकर भवनों पर कलई की जाती थी। बड़ा इमामबाड़ा संरक्षित इमारत है। इसका पुरातन स्वरूप बरकरार रहे, वजूद बरकरार रहे, इसकी जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की है। पर, जी-20 के आयोजन के दरम्यान एएसआई यह सब भूल गया। इमामबाड़ा को पोता जाता रहा, वह चुप्पी साधे रहा। अब कह रहा है कि प्रशासन के आदेश पर यह सब हुआ। हमने नहीं हुसैनाबाद ट्रस्ट ने पुताई कराई। पर बड़ा सवाल है कि एएसआई क्या कर रहा था? ऐसे तो किसी भी संरक्षित इमारत के स्वरूप से छेड़खानी की जा सकती है। अगर पुताई करानी जरूरी थी, तो एएसआई खुद कराता। इसमें उसकी विशेषज्ञता है।
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एएसआई तो भारतीय पुरातत्व अवशेष अधिनियम भी भूल गया
भारतीय पुरातत्व अवशेष अधिनियम (यथा संशोधित 2010) के प्रावधानों के तहत किसी भी संरक्षित इमारत के स्वरूप से छेड़छाड़ करना संज्ञेय एवं दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।
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हाईकोर्ट का भी संरक्षित स्मारकों के मामले में सख्त रुख
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने हाल ही राज्य सरकार से पूछा था कि लखनऊ शहर व आसपास के संरक्षित स्मारकों की हिफाजत व उन्हें अतिक्रमणमुक्त करने के लिए पिछले 10 साल में क्या कारवाई की? कोर्ट ने 2013 में दाखिल जनहित याचिका पर राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है।
उठ रहे सवाल
ऐसे तो मूल स्वरूप ही खो देंगी इमारतें
इतिहासकार रवि भट्ट पुताई कराए जाने पर सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं, ऐतिहासिक इमारतों का संरक्षण विशेषज्ञों से ही कराया जाना चाहिए। अन्यथा ये इमारतें अपना मूल स्वरूप खो देंगी। इससे हमारी आने वाली पीढ़ी उसके वास्तविक स्वरूप से रूबरू नहीं हो पाएगी। वहीं, इतिहासकार व सिविल इंजीनियर रोशन तकी भी ऐसा ही सवाल उठाते हैं। वह कहते हैँ, ऐसा कोई नियम नहीं है, जो इस प्रकार से संरक्षित इमारत की पुताई कराने को कहता हो। यह सब बेहद दुखद है।
लापरवाही से बिगड़ रहा स्वरूप
इतिहासकार मो. हैदर लापरवाही की एक और कहानी बताते हैं। वह कहते हैं, हाल में दिल्ली की 13 सदस्यीय टीम ने बताया कि पहले कराए गए काम में सीमेंट का प्रयोग करने की वजह से इसे नुकसान पहुंचा है। अंदर ही अंदर होल हो रहे हैं। सरकार को चाहिए कि संरक्षित इमारत की देख-रेख करने से हुसैनाबाद ट्रस्ट को रोके। क्योंकि इनकी देखरेख तकनीकी होती है, जो एएसआई के विशेषज्ञ ही कर सकते हैं।
पहले भी कलर वॉश करके हो चुका खिलवाड़
एएसआई के पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद इंदु प्रकाश बताते हैं, 15 साल पहले भी बड़ा इमामबाड़ा का कलर वॉश कराया गया था। यानी पहले भी इसके मूल स्वरूप से खिलवाड़ हुआ। एएसआई के ही एक और पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद चंद्र भाल मिश्रा इस सबपर एएसआई को ताकीद करते हैं। वह कहते हैं, संरक्षित इमारत का मूल स्वरूप कायम रहे, विभाग को इसपर गंभीरता दिखानी चाहिए।
बड़ा इमामबाड़ा...एक अनूठी राहत परियोजना की मिसाल
बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण 1780 में शुरू किया गया था, जो एक बड़े अकाल का दौर था। इस भव्य परियोजना को शुरू करने के पीछे नवाब आसफ-उद-दौला का उद्देश्य था क्षेत्र में लोगों को लगभग एक दशक तक रोजगार प्रदान करना। ऐसा कहा जाता है कि आम लोग दिन में इमारत बनाने का काम करते, जबकि कुलीन लोग रात में उसे तोड़ने का काम करते थे। राहत के लिए रोजगार सृजन की यह अनूठी परियोजना थी। इमामबाड़ा का निर्माण 1794 में पूरा हुआ था। नवाब इसकी सजावट पर सालाना चार से पांच लाख रुपये खर्च करते थे।
अब आरोप-प्रत्यारोप
एएसआई ने सहमति दी, अब झूठ बोल रहा
जी 20 के मेहमानों के स्वागत में प्रशासन के आदेश पर एएसआई की सहमति लेकर पुताई करवाई गई। एएसआई अब झूठ बोल रहा है। हमारे पास कागज मौजूद हैं।
- ब्रजेश कुमार वर्मा, प्रभारी अधिकारी हुसैनाबाद ट्रस्ट
बहुत कुछ प्रशासन के हाथ
पुताई का यह काम एएसआई ने नहीं कराया। बहुत सारी चीजें प्रशासन के हाथों में होती है। इनमें एएसआई कुछ नहीं कर सकता है।
डॉ. आफताब हुसैन, अधीक्षण पुरातत्वविद, एएसआई
एएसआई ने ही पुतवाया, ट्रस्ट ने भुगतान किया
जी 20 सम्मेलन के पहले से एक गेट एएसआई ने पुतवाया था। पुताई का पूरा काम एएसआई ने ही कराया है। एएसआई ने न केवल सहमति दी थी, बल्कि उन्हीं के लोगों ने कार्य कराया। यह बात अलग है कि उनके पास बजट नहीं था, तब भुगतान हुसैनाबाद ट्रस्ट की ओर से किया गया था।
- अमित कुमार, सेक्रेटरी एडीएम सिटी, हुसैनाबाद ट्रस्ट
एएसआई का नियम कहता है
एएसआई के नियमों के अनुसार किसी भी संरक्षित इमारत को नया रूप न देकर उसका संरक्षण करना होता है, ताकि इमारत का ऐतिहासिक वजूद कायम रहे, लेकिन जिम्मेदारों ने इस नियम को ताक पर रख दिया। उसके मूलस्वरूप का जो रंग था, उसे बदल दिया गया। इस बारे में अब जब जानकारों द्वारा आपत्ति हो रही है तो जिम्मेदार एक-दूसरे को आरोपी करार दे रहे हैं।