कोठे तक सीमित नहीं थी लखनऊ की तवायफें, और भी थी खूबियां
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लखनऊ लिटरेचर कार्निवाल का समापन रविवार को तवायफों के योगदान पर आधारित कोठे से ग्रामोफोन तक संगीत नाटिका से हुआ। इसमें मुख्यत: गौहरजान और कुछ अन्य तवायफों के जीवन और संगीत यात्रा को गीत-संगीत एवं कथा के साथ रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया।
हमारी उर्दू मोहब्बत ग्रुप की इस प्रस्तुति को काफी संख्या में लोगों ने देखा और सराहा। यह नाटिका लखनऊ, बनारस और आसपास के ऐसे तवायफों पर आधारित थी जो अपनी गायकी के कारण मशहूर हो गईं।
अपनी इच्छाशक्ति और संघर्ष से उन्होंने अपने फन को बन्द कमरों से निकालकर देश के कोने कोने में लोकप्रिय कर दिया। नाटिका में मुख्यत: गौहर जान की कथा थी जिनका हर रिकॉर्ड मेरा नाम गौहरजान के साथ खत्म होता था। गौहर जान ने गौहर पिया के नाम से कई रचनाएं भी कीं जिनमें कैसी ये धूम मचाई.. काफी लोकप्रिय है।
जान और वेश्याओं में था ये अंतर
नाटिका में बताया गया कि किस प्रकार कोठों पर केवल गायन करने वाली को बाई, गायन और नृत्य करने वाली को जान और मर्दों के साथ रिश्ते रखने वाली को वेश्या कहा जाता था।
बनारस में बड़ी संख्या में ऐसी कोठेवालियां थीं।
नाटिका में विस्तार से गौहर और उनकी मां के नाम बदलने के प्रसंग से लेकर वाजिद अली शाह के कोलकाता जाने पर वहां जाने, बिन्दादीन महाराज से भेंट, महज 12 वर्ष की उम्र में 45 साल के नवाब के साथ नथ उतारने की रस्म, राजा छग्गन के साथ बनारस जाने के प्रसंगों का वर्णन था।
इस कथा में बीच-बीच में गीतों-गजलों की संगीतमय प्रस्तुतियां और नृत्य प्रभावपूर्ण रहे। नाटिका में सईदा हमीद, जाकिया जहीर और लोकेश जैन ने पटकथा प्रस्तुत की जबकि रीनी सिंह ने गायन और शिवानी वर्मा ने नृत्य किया।
इस मौके पर सत्या सरन ने अपनी पुस्तक बात निकलेगी के बहाने गजल गायक जगजीत सिंह की संगीत यात्रा को प्रस्तुत किया। जीवन और संगीत पर विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने कई गजलों के वीडियो भी दिखाए।