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Lucknow : मोदी की हैट्रिक के लिए यूपी में पिछड़ों को आगे रखेगी भाजपा, राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कवायद

Wed, 18 Jan 2023 06:25 AM IST
दुष्यंत शर्मा सचिन मुद्गल, लखनऊ
सचिन मुद्गल, लखनऊ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 18 Jan 2023 06:25 AM IST
सार

यह कहावत बहुत पुरानी है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ होकर जाता है। लेकिन 2014 के बाद से भाजपा की लगातार जीत से यह सिद्ध हो गया है कि यूपी के पिछड़े और अति पिछड़े वोट बैंक को साधे बिना प्रदेश और केंद्र की सत्ता पर काबिज होना मुश्किल है।

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Lucknow: For Modi's hat-trick, BJP will keep the backward people ahead in UP
bjp, भाजपा - फोटो : ANI

विस्तार

यह कहावत बहुत पुरानी है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ होकर जाता है। लेकिन 2014 के बाद से भाजपा की लगातार जीत से यह सिद्ध हो गया है कि यूपी के पिछड़े और अति पिछड़े वोट बैंक को साधे बिना प्रदेश और केंद्र की सत्ता पर काबिज होना मुश्किल है। भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2024 में भी प्रदेश के पिछड़े और अति पिछड़े वोट बैंक को साधकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जीत की हैट्रिक बनाने की तैयारी की है। 16-17 जनवरी को दिल्ली में हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में यूपी से उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य से राजनीतिक प्रस्ताव का अनुमोदन कराकर लोकसभा चुनाव में पिछड़ों को साधने का संदेश दिया गया।

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लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा ने पहली बार प्रदेश के गैर यादव पिछड़े और अति पिछड़ों को साधने की रणनीति पर काम शुरू किया था। यह प्रयोग सफल रहा। भाजपा ने 80 में से 73 सीटें जीतकर पीएम मोदी के नेतृत्व में पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। उसके बाद से प्रदेश में भाजपा की राजनीति पिछड़े वर्ग के इर्द-गिर्द घूमती है। पार्टी ने सत्ता से लेकर संगठन में पिछड़ों की भागीदारी को बढ़ाया। केशव प्रसाद मौर्य को 2016 में भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। पिछड़े वोट बैंक के बूते पार्टी ने 2017 में रिकॉर्ड सीटों के साथ यूपी में सरकार बनाई। 
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लोकसभा चुनाव 2019 में भी सपा-बसपा के गठबंधन के बावजूद पिछड़े वोट बैंक के बूते ही भाजपा 80 में से 64 सीटें जीतने में सफल रही। 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर दो दर्जन से अधिक पिछड़े वर्ग के सांसद चुने गए। योगी सरकार के 52 सदस्यीय मंत्रिमंडल में पिछड़े वर्ग से 18 मंत्री हैं। 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 137 सीटों पर पिछड़े वर्ग के प्रत्याशी उतारे थे। इनमें से 89 चुनाव जीते। यूपी से प्रमुख पिछड़ी जातियों में जाट, शाक्य, राजभर, यादव, कुर्मी, निषाद, गुर्जर समाज के नेताओं को राज्यसभा भेजा गया है।
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हारने के बावजूद पिछड़े वर्ग के चेहरे के रूप में केशव का लगातार बढ़ा कद
राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के साथ ही भाजपा ने लोकसभा चुनाव का शंखनाद कर दिया है। ऐसे में यूपी में जीत का सिलसिला बरकरार रखने के लिए पार्टी ने पिछड़ों को साधे रखने की रणनीति अपनाई है। प्रदेश में पिछड़े वर्ग में केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी का चेहरा माना जाता है। विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद पार्टी ने केशव को उप मुख्यमंत्री बनाया। इसके बाद विधान परिषद में नेता सदन की जिम्मेदारी सौंपकर उनका कद बढ़ाया। अब राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में केशव से राजनीतिक प्रस्ताव का अनुमोदन कराकर भी पार्टी ने यूपी यह संदेश देने कि कोशिश की है कि पिछड़ा वर्ग पार्टी के केंद्र में है।

इसलिए भी पिछड़ा वर्ग फोकस में
जानकारों का मानना है कि यूपी में निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण पर उच्च न्यायालय की रोक से पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग में नाराजगी है। सरकार ने ट्रिपल टेस्ट के लिए आयोग गठित कर उसकी संस्तुति पर ही चुनाव का एलान कर डैमेज कंट्रोल की कोशिश कर ली है। इसके बावजूद राष्ट्रीय कार्यसमिति में केशव को राजनीतिक प्रस्ताव के अनुमोदन का मौका देकर पिछड़ों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और उनकी नाराजगी दूर करने का प्रयास किया है। 


भूपेंद्र और स्वतंत्र देव को भी रणनीति के तहत तवज्जो
भूपेंद्र चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने पश्चिमी यूपी में जाट समाज को साधने का प्रयास किया। वहीं कुर्मी वोट बैंक को संदेश देने के लिए जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह को राष्ट्रीय कार्यसमिति में शामिल किया। जानकार मानते हैं कि पिछड़े वर्ग को साधकर पार्टी 2024 में ने सिर्फ मोदी सरकार की हैट्रिक बनाना चाहती है, बल्कि 50 फीसदी से अधिक वोट हासिल कर मिशन 75 को पूरा करना चाहती है।

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