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केजीएमयू: खून की दलाली करने वाला गिरोह काफी शातिर, तय होता है गुर्गों का अलग-अलग काम
Sat, 04 Jan 2020 05:19 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Sat, 04 Jan 2020 05:19 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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केस-1
प्रयागराज जिले के करछना निवासी दिलीप कुमार यादव का एक माह का बच्चा एनआईसीयू में भर्ती है। डॉक्टर ने खून की जरूरत बताई तो दिलीप ब्लड सैंपल लेकर शताब्दी अस्पताल पहुंचे। दिलीप का कहना है कि शताब्दी अस्पताल में मिले युवक ने बताया कि वह अस्पताल का कर्मचारी है। बिना डोनर ब्लड दिला देगा। उसने रुपये लिए और सैंपल लेकर अंदर गया। फिर हस्ताक्षर के बाद एक पर्ची दी। उसने दिलीप को काउंटर नंबर पांच पर भेजा। कहा कि वहां ब्लड मिल जाएगा। उसने अपना मोबाइल नंबर भी दिया। लेकिन काउंटर पांच पर जाने पर पता चला कि पर्ची फर्जी है और उस पर हस्ताक्षर भी फर्जी हैं।
केस-2
सीतापुर निवासी राजकुमार कन्नौजिया का भाई गांधी वार्ड में भर्ती था। वह ब्लड लेने गए तो वहां मिले युवक ने दो हजार रुपये लिया। उसने अपना नाम विकास पंडित बताया। शताब्दी के गेट पर पर्चा दिया और फिर दो नंबर काउंटर पर भेजा। जहां ब्लड ग्रूप की जांच हुई। फिर उसने अलग-अलग तीन पर्चे भरे। रसीद भी कटवाकर दे दी। इसके बाद पांच नबंर काउंटर पर भेजा, जहां पता चला कि पर्चे और उस पर हस्ताक्षर भी फर्जी हैं।
केजीएमयू में खून की दलाली करने वाला गिरोह काफी शातिर है। गिरोह के हर सदस्य को अलग-अलग जिम्मेदारी दी गई है। ये काउंटर पर भी नजर रखते हैं। खास बात ये कि बायोमीट्रिक व्यवस्था का भी तोड़ निकालने में कामयाब हो जाते हैं। मामला पकड़ में आने की भनक लगते ही गायब भी हो जाते हैं। 31 दिसंबर और एक जनवरी के मामले में भी यही हुआ।
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प्रयागराज जिले के करछना निवासी दिलीप कुमार यादव का एक माह का बच्चा एनआईसीयू में भर्ती है। डॉक्टर ने खून की जरूरत बताई तो दिलीप ब्लड सैंपल लेकर शताब्दी अस्पताल पहुंचे। दिलीप का कहना है कि शताब्दी अस्पताल में मिले युवक ने बताया कि वह अस्पताल का कर्मचारी है। बिना डोनर ब्लड दिला देगा। उसने रुपये लिए और सैंपल लेकर अंदर गया। फिर हस्ताक्षर के बाद एक पर्ची दी। उसने दिलीप को काउंटर नंबर पांच पर भेजा। कहा कि वहां ब्लड मिल जाएगा। उसने अपना मोबाइल नंबर भी दिया। लेकिन काउंटर पांच पर जाने पर पता चला कि पर्ची फर्जी है और उस पर हस्ताक्षर भी फर्जी हैं।
केस-2
सीतापुर निवासी राजकुमार कन्नौजिया का भाई गांधी वार्ड में भर्ती था। वह ब्लड लेने गए तो वहां मिले युवक ने दो हजार रुपये लिया। उसने अपना नाम विकास पंडित बताया। शताब्दी के गेट पर पर्चा दिया और फिर दो नंबर काउंटर पर भेजा। जहां ब्लड ग्रूप की जांच हुई। फिर उसने अलग-अलग तीन पर्चे भरे। रसीद भी कटवाकर दे दी। इसके बाद पांच नबंर काउंटर पर भेजा, जहां पता चला कि पर्चे और उस पर हस्ताक्षर भी फर्जी हैं।
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केजीएमयू में खून की दलाली करने वाला गिरोह काफी शातिर है। गिरोह के हर सदस्य को अलग-अलग जिम्मेदारी दी गई है। ये काउंटर पर भी नजर रखते हैं। खास बात ये कि बायोमीट्रिक व्यवस्था का भी तोड़ निकालने में कामयाब हो जाते हैं। मामला पकड़ में आने की भनक लगते ही गायब भी हो जाते हैं। 31 दिसंबर और एक जनवरी के मामले में भी यही हुआ।
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काफी दिनों से चल रहा है कारोबार
प्रतीकात्मक तस्वीर
केजीएमयू में खून की दलाली का कारोबार काफी दिनों से चल रहा है। यहां लगातार इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं। विभागाध्यक्ष डॉ. तूलिका चंद्रा ने चीफ प्रॉक्टर प्रो. आरएएस कुशवाहा को लिखे पत्र में बताया कि प्रतिदिन ब्लड बैंक में फर्जी हस्ताक्षर वाले पत्र आ रहे हैं।
ये दलाल विभाग की ओर से जारी होने वाले प्रार्थना पत्र जैसे पत्र भेजते हैं। इनपर रेजीडेंट के नाम के फर्जी तरीके से शॉर्टकट हस्ताक्षर बनाते हैं। फिर उस मांगपत्र के आधार पर ब्लड बैंक से रक्त लेते हैं। खून के दलाल तीमारदार को काउंटर पर भेजते वक्त बायोमीट्रिक जांच से बचा लेते थे। इसके बाद संबंधित तीमारदार को मोबाइल के जरिए गाइड करते थे।
ये दलाल विभाग की ओर से जारी होने वाले प्रार्थना पत्र जैसे पत्र भेजते हैं। इनपर रेजीडेंट के नाम के फर्जी तरीके से शॉर्टकट हस्ताक्षर बनाते हैं। फिर उस मांगपत्र के आधार पर ब्लड बैंक से रक्त लेते हैं। खून के दलाल तीमारदार को काउंटर पर भेजते वक्त बायोमीट्रिक जांच से बचा लेते थे। इसके बाद संबंधित तीमारदार को मोबाइल के जरिए गाइड करते थे।
डॉक्टर का ड्राइवर और गार्ड भी हैं गिरोह में
प्रतीकात्मक तस्वीर
खून दलाल गिरोह में डॉक्टर का ड्राइवर और केजीएमयू के पूर्व गार्ड भी शामिल हैं। इसका सरगना सुल्तान है। यह खुलासा हुआ है ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. तूलिका चंद्रा के पास गोपनीय तरीके से भेजे गए पत्र में। इसमें गिरोह के बारे में पूरा विवरण भी दिया गया है।
बताया गया है कि मोहम्मद सुल्तान खान गिरोह का सरगना है। मोनू व हैदर अब्बास पैड छपवाते हैं। मो. राशिद डॉक्टर की रिक्वेस्ट (डिमांड पत्र) भरवाता है और पर्चे में फ्री में ब्लड देने को लिखता है। वह केजीएमयू के ज्यादातर डॉक्टरों के फर्जी हस्ताक्षर बनाने में माहिर है।
इसी तरह मो. फैसल एक डॉक्टर की गाड़ी चलाता है। वह जरूरतमंदों को ढूंढता है। अनिल दीक्षित कभी केजीएमयू में गार्ड था। यहां से निकाले जाने के बाद वह गिरोह में शामिल हो गया। इसके अलावा मोॅ आजाद व मो. शाहिल का नाम भी गिरोह में है। पत्र में सभी के मोबाइल नंबर भी दिए गए हैं। हालांकि, पुलिस जांच के दौरान ज्यादातर मोबाइल नंबर बंद मिले हैं। कुछ पर कॉल की गई तो उधर से जवाब नहीं मिला।
बताया गया है कि मोहम्मद सुल्तान खान गिरोह का सरगना है। मोनू व हैदर अब्बास पैड छपवाते हैं। मो. राशिद डॉक्टर की रिक्वेस्ट (डिमांड पत्र) भरवाता है और पर्चे में फ्री में ब्लड देने को लिखता है। वह केजीएमयू के ज्यादातर डॉक्टरों के फर्जी हस्ताक्षर बनाने में माहिर है।
इसी तरह मो. फैसल एक डॉक्टर की गाड़ी चलाता है। वह जरूरतमंदों को ढूंढता है। अनिल दीक्षित कभी केजीएमयू में गार्ड था। यहां से निकाले जाने के बाद वह गिरोह में शामिल हो गया। इसके अलावा मोॅ आजाद व मो. शाहिल का नाम भी गिरोह में है। पत्र में सभी के मोबाइल नंबर भी दिए गए हैं। हालांकि, पुलिस जांच के दौरान ज्यादातर मोबाइल नंबर बंद मिले हैं। कुछ पर कॉल की गई तो उधर से जवाब नहीं मिला।
14 माह पहले भी पकड़ा जा चुका है गिरोह
प्रतीकात्मक तस्वीर
राजधानी में खून दलाल गिरोह पहले भी पकड़ा जा चुका है। अक्टूबर 2018 में ब्लड बैंककर्मियों द्वारा मिलावटी खून बेचने का मामला सामने आया था। इसमें एक यूनिट खून से तीन से चार यूनिट खून बनाया जा रहा था। पीजीआई की लैब में हुई जांच में पता चला कि मिलावटी खून जहरीला था।
अक्टूबर में एफएसडीए विभाग ने निजी ब्लड बैंक में छापेमारी कर खून के कारोबार का खुलासा किया था। इसमें स्लाइन वाटर मिलाकर खून बनाने की बात सामने आई थी। एफएसडीए ने चार लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। वे अब जमानत पर छूट गए हैं।
मिलावटी खून में लाल रंग की डाई मिलाने की भी बात सामने आई थी। डॉ. तूलिका चंद्रा के मुताबिक मिलावटी ब्लड से मरीज की जान जा सकती है। यदि किसी तरह जान बच भी गई तो किडनी, लीवर, हार्ट सहित कई बीमारियां हो सकती हैं।
डॉ. चंद्रा ने बताया कि ब्लड को अभी तक बनाने की कोई प्रक्रिया नहीं आई है। यदि इसमें कोई भी बाहरी तत्व मिलाया जाता है तो उसके जहरीला होने अथवा उसमें मौजूद विभिन्न तरह के तत्वों के प्रभावित होने का डर रहता है।
अक्टूबर में एफएसडीए विभाग ने निजी ब्लड बैंक में छापेमारी कर खून के कारोबार का खुलासा किया था। इसमें स्लाइन वाटर मिलाकर खून बनाने की बात सामने आई थी। एफएसडीए ने चार लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। वे अब जमानत पर छूट गए हैं।
मिलावटी खून में लाल रंग की डाई मिलाने की भी बात सामने आई थी। डॉ. तूलिका चंद्रा के मुताबिक मिलावटी ब्लड से मरीज की जान जा सकती है। यदि किसी तरह जान बच भी गई तो किडनी, लीवर, हार्ट सहित कई बीमारियां हो सकती हैं।
डॉ. चंद्रा ने बताया कि ब्लड को अभी तक बनाने की कोई प्रक्रिया नहीं आई है। यदि इसमें कोई भी बाहरी तत्व मिलाया जाता है तो उसके जहरीला होने अथवा उसमें मौजूद विभिन्न तरह के तत्वों के प्रभावित होने का डर रहता है।
पेशेवर डोनरों का भी धंधा
प्रतीकात्मक तस्वीर
राजधानी में पेशेवर डोनरों का भी धंधा चरम पर है। गिरोह के सदस्यों के पास पेशेवर डोनरों की सूची रहती है। वे जरूरत के हिसाब से उन्हें संबंधित ब्लड बैंक में बुलाते हैं। डोनर ढूंढ कर लाने वालों में तत्काल पैसा लेने पर पांच सौ रुपया। यदि बाद में लेते हैं तो ब्लड की बिक्री मूल्य के आधार पर 10 प्रतिशत होता है।
निगेटिव ग्रुप का डोनर है तो दोगुनी कीमत: बताया जाता है कि निगेटिव ग्रुप का डोनर मिलने पर दोगुनी कीमत दी जाती है। कई बार निगेटिव ग्रुप के डोनरों को उनकी डिमांड के मुताबिक कुछ दवाएं, खाने-पीने के सामान आदि भी उपलब्ध कराया जाता है। क्योंकि निगेटिव ग्रुप के डोनर बहुत कम मिलते हैं। ऐसी स्थिति में उनकी खासतौर से खुशामद की जाती है।
निगेटिव ग्रुप का डोनर है तो दोगुनी कीमत: बताया जाता है कि निगेटिव ग्रुप का डोनर मिलने पर दोगुनी कीमत दी जाती है। कई बार निगेटिव ग्रुप के डोनरों को उनकी डिमांड के मुताबिक कुछ दवाएं, खाने-पीने के सामान आदि भी उपलब्ध कराया जाता है। क्योंकि निगेटिव ग्रुप के डोनर बहुत कम मिलते हैं। ऐसी स्थिति में उनकी खासतौर से खुशामद की जाती है।
आंखों में धूल झोंकने में माहिर
प्रतीकात्मक तस्वीर
खूून दलाल गिरोह हर चौकसी को धता बताने में कामयाब हो जाता है। ये ब्लड बैंककर्मियों को झांसा देने के साथ ही बायोमीट्रिक और आई स्कैनिंग व्यवस्था को तोड़ने में रिश्तों का सहारा लेते हैं। नियमानुसार एक रक्तदाता तीन माह बाद ही दोबारा रक्तदान कर सकता है।
ऐसे में पेशेवर रक्तदाताओं को रोकने के लिए केजीएमयू के ब्लड बैंक में अंगूठे के निशान और आंखों की स्कैनिंग की जाती है। ऐसे में यदि वही रक्तदाता दोबारा आता है तो सॉफ्टवेयर के जरिए आसानी से पकड़ में आ जाता है। लेकिन पेशेवर रक्तदाताओं ने इसका भी तोड़ निकाल लिया।
वे एक बार केजीएमयू में आने के बाद दूसरी बार निजी ब्लड बैंक में चले जाते हैं। पिछले दिनों काउंसलिंग के दौरान इस तरह का रक्तदाता पकड़ा गया था, जो माहभर पहले दूसरे ब्लड बैंक में रक्त दे चुका था। काउंसलर ने शक के आधार पर उससे पूछताछ की तो वह घबरा गया और माहभर पहले रक्तदान करने की जानकारी दे दी।
फर्जी रिश्तेदारी का सहारा
गिरोह से जुड़े रक्तदाता मरीज का रिश्तेदार बनकर आते हैं। वे मरीज के नाम, जाति और रिश्ते को रट कर आते हैं। काउंसलर बार-बार सवाल करता है, लेकिन वे इतने माहिर होते हैं कि पकड़ में नहीं आते। कई बार मां अथवा मरीज की मां का नाम पूछने पर पकड़े जाते हैं। कुछ दिन पहले इस तरह के केस पकड़े गए थे।
ऐसे में पेशेवर रक्तदाताओं को रोकने के लिए केजीएमयू के ब्लड बैंक में अंगूठे के निशान और आंखों की स्कैनिंग की जाती है। ऐसे में यदि वही रक्तदाता दोबारा आता है तो सॉफ्टवेयर के जरिए आसानी से पकड़ में आ जाता है। लेकिन पेशेवर रक्तदाताओं ने इसका भी तोड़ निकाल लिया।
वे एक बार केजीएमयू में आने के बाद दूसरी बार निजी ब्लड बैंक में चले जाते हैं। पिछले दिनों काउंसलिंग के दौरान इस तरह का रक्तदाता पकड़ा गया था, जो माहभर पहले दूसरे ब्लड बैंक में रक्त दे चुका था। काउंसलर ने शक के आधार पर उससे पूछताछ की तो वह घबरा गया और माहभर पहले रक्तदान करने की जानकारी दे दी।
फर्जी रिश्तेदारी का सहारा
गिरोह से जुड़े रक्तदाता मरीज का रिश्तेदार बनकर आते हैं। वे मरीज के नाम, जाति और रिश्ते को रट कर आते हैं। काउंसलर बार-बार सवाल करता है, लेकिन वे इतने माहिर होते हैं कि पकड़ में नहीं आते। कई बार मां अथवा मरीज की मां का नाम पूछने पर पकड़े जाते हैं। कुछ दिन पहले इस तरह के केस पकड़े गए थे।