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सुल्तानपुर लोकसभा सीट : बाहरियों की रही बहार... 72 में से 38 वर्ष तक फहराया जीत का झंडा
Wed, 27 Mar 2024 01:01 PM IST
ishwar ashish
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
Published by: ishwar ashish
Updated Wed, 27 Mar 2024 01:01 PM IST
सार
17 आमचुनावों और तीन उपचुनावों में आठ बार जीतकर 38 वर्ष जिले से बाहर के प्रत्याशी सांसद रहे। वहीं, 12 चुनाव स्थानीय प्रत्याशियों ने जीते।
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- फोटो : amar ujala
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विस्तार
दिलचस्प और दिलदार...। कुछ ऐसे ही हैं अपने सुल्तानपुर के मतदाता। पहले चुनाव से लेकर अब तक सुल्तानपुर का इतिहास खंगालें तो यह सीट बाहरी प्रत्याशियों को खूब रास आती है। देश के पहले आम चुनाव से ही कांग्रेस ने यह परिपाटी शुरू की जो 1961 में करारा झटका खाने के बाद बदल गई। किंतु भाजपा को जीत ही तभी मिली जब उसने बाहरी प्रत्याशियों पर भरोसा जताया। यही वजह है कि सुल्तानपुर सीट पर अब तीन उपचुनाव समेत कुल 20 चुनाव हुए। जिसमें आठ बार बाहरी प्रत्याशी जीते और 72 वर्ष में 38 वर्ष सांसद रहे।
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1951-52 के पहले आमचुनाव में सुल्तानपुर सीट का नाम था सुल्तानपुर जिला उत्तर साथ फैजाबाद जिला दक्षिण पश्चिम। अमेठी सीट पहले चुनाव में सुल्तानपुर (दक्षिण) और 1957 के दूसरे चुनाव में मुसाफिरखाना संसदीय क्षेत्र कहलाई। कांग्रेस ने दोनों ही चुनावों में दोनों ही सीटों पर 1952 और 1957 दोनों ही चुनावों में बाहरी उम्मीदवार उतारे और दोनों बार कामयाबी मिली। इससे स्थानीय कांग्रेस नेताओं में गहरी नाराजगी थी। जिसके चलते जब 1961 में गोविंद मालवीय की मृत्यु के बाद उपचुनाव हुआ तो शहर के प्रतिष्ठित अधिवक्ता व कांग्रेस नेता गणपत सहाय निर्दल उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस उम्मीदवार के सामने उतरे और कड़े मुकाबले में जीत हासिल कर ली।
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इस झटके ने कांग्रेस की रणनीति बदल दी। इसके बाद कांग्रेस स्थानीय उम्मीदवारों पर दांव लगाने लगी। जिन्हें सफलता भी मिलती रही। दौर बदला और बहुजन समाज पार्टी का दौर आया तो बसपा ने भी यहां से स्थानीय उम्मीदवार उतारे। जिसमें से जयभद्र सिंह और मोहम्मद ताहिर को सफलता भी मिली। किंतु भाजपा की ओर से केवल बाहरी प्रत्याशी ही इस सीट पर कामयाब रहे। जनसंघ से भाजपा तक एक उपचुनाव सहित 12 चुनावों में उम्मीदवार उतारने वाली भाजपा (पूर्व में जनसंघ) को पांच मौकों पर तभी जीत मिली, जब उसने बाहरी उम्मीदवार मैदान में उतारे। ऐसे में यह देखना रोचक है कि सुल्तानपुर सीट के इस इतिहास को देखते हुए राजनीतिक दल किस तरह के प्रत्याशी को तवज्जो देते हैं।
एक कार्यकाल में दो-दो उपचुनाव
संसदीय चुनाव के इतिहास में एक बार ऐसा भी हुआ, जब सुल्तानपुर सीट पर एक ही कार्यकाल में दो-दो उपचुनाव हुए। 1967 में कांग्रेस के टिकट पर गणपत सहाय सांसद बने थे। 1969 में उनके निधन पर यह सीट खाली हुई तो श्रीपति मिश्र यहां से सांसद चुने गए। 1970 में श्रीपति मिश्र प्रदेश की चौधरी चरण सिंह सरकार में शिक्षामंत्री बनाए गए तो उन्होंने संसद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1970 में यहां दोबारा उपचुनाव हुए।