Loksabha Election: कैसरगंज सीट पर तस्वीर साफ, गर्माया सियासी माहौल, विधायकों की जिम्मेदारी बढ़ी
कैसरगंज संसदीय सीट पर प्रमुख दलों से दावेदारों के नामांकन से सियासी तस्वीर साफ हो गई है। लंबे इंतजार के बाद क्षेत्र में सियासी माहौल गरमा गया है। सियासी समीकरण को साधने के लिए हर दल ने सधे दांव चले हैं।
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कैसरगंज संसदीय सीट पर प्रमुख दलों से दावेदारों के नामांकन से सियासी तस्वीर साफ हो गई है। लंबे इंतजार के बाद क्षेत्र में सियासी माहौल गरमा गया है। सियासी समीकरण को साधने के लिए हर दल ने सधे दांव चले हैं। राजनीति की असल तस्वीर कैसरगंज में ही देखते ही बन रही है। भाजपा ने जिस तरह एक तीर से कई निशाने साधे हैं, उससे एक नई राजनीतिक दांवपेंच की गवाही दे रहे हैं। सियासी अखाड़ेबाज के बेटे पर ही दांव चल कर उनकी प्रतिष्ठा से जहां चुनाव को जोड़ दिया है, वहीं विपक्ष के हमलों से बचने का रास्ता भी निकाल लिया। पहले से तैयार चुनावी प्रबंधन के सहारे पार्टी परिणाम को भी साधने में जुट गई है। नामांकन में डिप्टी सीएम केशव मौर्य की हुंकार से ज्यादा पार्टी की एका पर जोर रहा।
बहुचर्चित कैसरगंज सीट पर नामांकन के साथ ही असमंजस्य के बादल भी छंट गए हैं। ऐन वक्त तक विपक्षी दलों की निगाहें भाजपा की रणनीति पर टिकी रहीं। लंबे समय तक पार्टियां भाजपा के ऐलान का इंतजार करती रहीं। बसपा ने भले ही भाजपा के एलान से पहले प्रत्याशी तय कर अपने पत्ते खोल दिए थे। बसपा ने ब्राह्मण कार्ड खेलकर चुनौती दी थी। पयागपुर के निवासी व लखनऊ में ट्रांसपोर्टर नरेंद्र पांडेय को मैदान में उतार कर बड़ा दांव चला है। भाजपा ने जब करण भूषण सिंह का ऐलान किया तो सपा ने अपनी पुरानी रणनीति पर कायम रहते हुए ब्राह्मण दांव के साथ किसान कार्ड खेला है। भगतराम मिश्र को मैदान में उतार कर रोचकता बढ़ा दी है।
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सपा प्रत्याशी कैसरगंज संसदीय सीट में ही शामिल पयागपुर विधानसभा के निवासी हैं और बड़े किसानों में शुमार हैं। वह एक लोकसभा व दो विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं, इससे माना जा रहा है कि वह राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। वहीं भाजपा के करण का भले ही चुनाव पहला हो, लेकिन पिता व बड़े भाई के चुनावी मिशन में शामिल होकर राजनीति में माहिर हो चुके हैं।
पिता के सियासी पिच पर किस्मत चमकाने का मौका
नए परिसीमन के बाद साल 2009 में कैसरगंज संसदीय सीट का पहला चुनाव बृजभूषण शरण सिंह ने सपा से जीता था। इसके बाद साल 2014 में वह भाजपा के साथ आए और दो बार लगातार जीते। इस बार उन्हें टिकट नहीं मिला, लेकिन टिकट मिलने की उम्मीद में उन्होंने पर पूरे संसदीय क्षेत्र में सियासी पिच तैयार कर रखी है जिससे अब बेटे को किस्मत चमकाने का मौका मिला है। माना जा रहा है कि भाजपा के साथ ही सांसद की व्यक्तिगत टीमें भी पूरे क्षेत्र में सक्रिय हो गई है। प्रत्याशी होने के बाद उनके बेटे से भी क्षेत्र के लोगों ने मिलकर रणनीति तैयार की है। इस तरह कैसरगंज में अब सियासी चकल्लस की धूम मची है। परसपुर के सचिन कहते हैं कि सांसद का प्रभाव क्षेत्र में है, इससे उनके बेटे को मजबूती मिल रही है।
विधायकों की जिम्मेदारी भी बढ़ी, अब दिखानी होगी ताकत
कैसरगंज संसदीय सीट की पांच विधानसभाओं में चार पर भाजपा का कब्जा है। तरबगंज में प्रेमनरायन पांडेय, करनैलगंज में अजय कुमार सिंह, कटरा बाजार में बावन सिंह, पयागपुर में सुभाष त्रिपाठी भाजपा के विधायक हैं। वहीं कैसरगंज में सपा के आनंद यादव विधायक हैं। इन सभी विधायकों की जिम्मेदारी संसदीय चुनाव में बढ़ गई है। वहीं कैसरगंज में भाजपा के कद्दावर नेता पूर्व मंत्री मुकुट बिहारी वर्मा का भी प्रभाव है। जबकि सपा में तरबगंज में राम भजन चौबे, करनैलगंज में पूर्व विधायक योगेश प्रताप सिंह, पयागपुर में पूर्व विधायक मुकेश श्रीवास्तव, कटरा बाजार में पूर्व विधायक बैजनाथ दूबे को भी दम दिखाना होगा। बसपा ने भी कैडर वोटों को सहेजने की रणनीति तैयार की है। फिलहाल यहां के चुनाव पर सभी दलों के हाईकमान की नजर है। कद्दावरों का कद भी तय होगा।
कैसरगंज सीट पर जातिगत समीकरण
| कुल मतदाता | 18,83,301 |
| ब्राह्मण | 21 प्रतिशत |
| क्षत्रिय | 14 प्रतिशत |
| मुस्लिम | 18 प्रतिशत |
| अनुसूचित जाति | 15 प्रतिशत |
| कुर्मी | 06 प्रतिशत |
| यादव | 13 प्रतिशत |
| अन्य | 14 प्रतिशत |