फर्जी शिकायत करने वालों पर लोकायुक्त का शिकंजा
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बिना किसी ठोस सुबूत के फर्जी शिकायत करने वाले दो लोगों पर लोकायुक्त का शिकंजा कस गया है। उन्होंने दोनों शिकायतकर्ताओं को नोटिस जारी करके पूछा है कि क्यों न गलत साक्ष्य देने और झूठे आरोप लगाने के लिए उन्हें दंडित किया जाए।
इनमें से एक शिकायतकर्ता ने तो तत्कालीन राज्यपाल और तत्कालीन मुख्य सचिव तक की फर्जी शिकायत लोकायुक्त से की थी जिसे खारिज करते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है। लोकायुक्त अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार इन पर पांच हजार रुपये का जुर्माना तथा एक महीने की कैद हो सकती है।
लखनऊ के एमसी श्रीवास्तव ने राजधानी के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के निदेशक, फैकल्टी सदस्यों व अन्य विभागों में कार्यरत अधिकारियों के खिलाफ लोकायुक्त के समक्ष कुल 40 शिकायतें दाखिल की थीं।
इनमें एसजीपीजीआई के कुलाधिपति व राज्यपाल तथा मुख्य सचिव पर भी आरोप लगाए गए थे जबकि उनका इससे कोई संबंध नहीं था। लोकायुक्त ने सभी शिकायतों को खारिज करते हुए शिकायकर्ता को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए हैं।
ब्लैकमेल करने के लिए की गईं शिकायतें
लोकायुक्त के उप सचिव एके सिंघल की ओर से बुधवार को एमसी श्रीवास्तव को भेजे नोटिस में कहा गया है कि लोकायुक्त अधिनियम 1975 के प्रावधानों के अनुसार बिना औपचारिकताएं पूरी किए ये शिकायतें ब्लैकमेलिंग के उद्देश्य से किसी दुर्भावनावश की गई हैं।
एमसी श्रीवास्तव को 14 नवंबर तक अपना स्पष्टीकरण लोकायुक्त के समक्ष दाखिल करने को कहा गया है। नोटिस में यह भी कहा गया है कि क्यों न अधिनियम के प्रावधानों के तहत उन्हें फर्जी साक्ष्य व शपथ पत्र देने व झूठे आरोप लगाने के लिए दंडित किया जाए।
दूसरे शिकायतकर्ता ललित कुमार श्रीवास्तव को तत्कालीन प्रमुख वन संरक्षक (वन्यजीव) रूपक डे केखिलाफ फर्जी दस्तावेजों के आधार पर शिकायत दाखिल करने के लिए नोटिस भेजा गया है। लोकायुक्त की प्रारंभिक जांच में पता चला कि ललित ने प्रमुख वन संरक्षक के कार्यालय से रूपक डे के प्रापर्टी रिटर्न की सूचना प्राप्त करके उसमें फर्जीवाड़ा करके लोकायुक्त के समक्ष दाखिल कर दिया।
सिंघल की ओर से उन्हें भी नोटिस भेजकर 18 नवंबर को अपना स्पष्टीकरण देने को कहा गया है। नोटिस में कहा गया है कि वह व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर भी स्वयं अपना पक्ष रख सकते हैं।