किया 10 मंत्रियों का सफाया, बना दिया रिकॉर्ड
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इस आधार पर बनीं लोकायुक्त की रिपोर्टों को अहम मानते हुए जस्टिस मेहरोत्रा का नाम ‘मोस्ट इफेक्टिव लोकायुक्त रिपोर्ट्स’ टाइटिल के साथ सबसे अधिक प्रभावशाली लोकायुक्त के रूप में दर्ज किया गया है।
इनकी रिपोर्ट पर मायावती सरकार के छह मंत्रियों को कुर्सी गंवानी पड़ी तथा चार मंत्रियों की जांच के दौरान ही मंत्रिमंडल से छुट्टी कर दी गई थी।
बसपा सरकार ने किया सपोर्ट
प्रदेश के लोकायुक्त के इतिहास में जस्टिस मेहरोत्रा के कार्यकाल में ही सबसे ज्यादा मंत्रियों की शिकायतें आईं।
हर शिकायत पर लोकायुक्त की तफ्तीश को सरकार ने खासी तवज्जो दी और कुछ अपवादों को छोड़कर लगभग सभी मामलों में पूर्ववर्ती बसपा सरकार ने उनकी रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए कार्रवाई भी की।
इनकी रिपोर्ट पर बसपा सरकार के जिन मंत्रियों को कुर्सी छोड़नी पड़ी थी, उनमें धर्मार्थ कार्य राज्यमंत्री राजेश त्रिपाठी, पशुधन राज्यमंत्री अवध पाल सिंह यादव, माध्यमिक शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र, श्रम मंत्री बादशाह सिंह, अंबेडकर ग्राम विकास राज्यमंत्री रतन लाल अहिरवार थे।
इसके अलावा लघु उद्योग मंत्री चंद्रदेव राम यादव शामिल थे जबकि वन मंत्री फतेह बहादुर सिंह, प्राविधिक शिक्षा राज्यमंत्री सदल प्रसाद, उच्च शिक्षा मंत्री राकेश धर त्रिपाठी को लोकायुक्त जांच के दौरान ही तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
कुशवाहा की भी जांच की
एनआरएचएम घोटाले में फंसे पूर्व मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा की भी जांच जस्टिस मेहरोत्रा ने ही की थी और उन्हें भी अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी।
जस्टिस मेहरोत्रा ने 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान मायावती सरकार के सबसे कद्दावर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खिलाफ भी सरकार को रिपोर्ट भेजकर सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय से जांच की सिफारिश की थी लेकिन मायावती ने इसे स्वीकार नहीं किया।
इस बीच सूबे में सत्ता बदलने पर उन्होंने नसीमुद्दीन की जांच रिपोर्ट अखिलेश यादव सरकार को भेजी। अखिलेश सरकार ने इसे स्वीकार करके जांच शुरू करा दी है।
जस्टिस मेहरोत्रा की रिपोर्ट पर ही माया सरकार के तीन और मंत्रियों रामवीर उपाध्याय, राम अचल राजभर तथा अयोध्या प्रसाद पाल के खिलाफ भी जांच चल रही है।
मुंसिफ मजिस्ट्रेट से लोकायुक्त तक का सफर
1980 में प्रोन्नति के बाद उनकी तैनाती कानपुर में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर की गई। 1987 में वे सचिवालय में संयुक्त सचिव व संयुक्त विधि परामर्शी के पद पर तैनात किए गए।
1997 तक न्याय विभाग में विशेष सचिव व सचिव पद पर तैनात रहने के बाद उनकी नियुक्ति फैजाबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर की गई। इसके बाद वे प्रमुख सचिव न्याय तथा विधि परामर्शी बने।
5 जुलाई 2002 को उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया, जहां से वे 28 फरवरी 2006 को सेवानिवृत्त हो गए। 16 मार्च 2006 को उन्होंने प्रदेश के लोकायुक्त का कार्यभार ग्रहण किया था। 15 मार्च 2012 को उनका छह वर्ष का कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद सरकार ने उनका कार्यकाल आगे बढ़ा दिया है।