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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Lok Sabha Elections 2019 See why alliance is important for Akhilesh Yadav and Mayawati.

जमीनी खाई पाटने को साथ लाए गए मायावती-मुलायम, भाजपा को मात देने का किया प्रयास

Sun, 21 Apr 2019 11:44 AM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sun, 21 Apr 2019 11:44 AM IST
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Lok Sabha Elections 2019 See why alliance is important for Akhilesh Yadav and Mayawati.
रैली में सपा बसपा गठबंधन नेता (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

मायावती और मुलायम सिंह यादव की मैनपुरी में मंच पर एक साथ मौजूदगी सिर्फ लोकसभा चुनाव में सीटों की जीत या हार तक ही सीमित नहीं लगती है, बल्कि नजर इससे आगे की मंजिलों पर है। वैसे गठबंधनों का इतिहास बहुत उत्साहजनक नहीं है।

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बावजूद इसके मैनपुरी रैली के बहाने सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती ने जमीन पर पिछड़ों और अनुसूचित जाति खास तौर से यादव व जाटव के बीच 24 साल पहले हो गई सियासी खाई को पाटने  को कोशिश की है।
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इसमें सफलता कितनी मिलेगी और कहां तक मिलेगी, इसका जवाब तो भविष्य में मिलेगा लेकिन इसके सहारे सपा और बसपा के प्रमुखों ने मोदी के पिछडे़ कार्ड की काट करने की कोशिश की है और सियासी शतरंज की बिसात पर भाजपा को ‘चैकमेट’ (मात) देने का प्रयास किया है।

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इस तरह चौड़ी होती गई मायावती-मुलायम के बीच की खाई

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हाथ हिलाकर अभिवादन करते मुलायम (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

दरअसल, स्टेट गेस्ट हाउस कांड सिर्फ एक घटना भर नहीं थी। यह उस समय तक पिछड़ों, खास तौर से यादवी अस्मिता के प्रतीक बन चुके मुलायम सिंह यादव और अनुसूचित जातियों के सम्मान की पहचान बन चुके कांशीराम व मायावती के समर्थकों के बीच सियासी मेड़बंदी रखने वाला मामला बना था। इस दुश्मनी को दोनों तरफ से धार देकर जातीय खेमेबाजी में बदला गया।

कांशीराम व मायावती ने अपने ऊपर हमले को अनुसूचित जातियों की अस्मिता से जोड़ा तो मुलायम की तरफ से इसे सियासी सौदेबाजी में पिछड़ों के स्वाभिमान पर चोट के रूप में चित्रित किया गया। इससे इन दोनों वर्गों के बीच खाई चौड़ी हो गई।

नरेंद्र मोदी के केंद्रीय राजनीति में आने से बदले समीकरण

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

शुरू में तो माया व अखिलेश को इससे कोई नुकसान नहीं महसूस हुआ क्योंकि इनका वोट बैंक अपने-अपने चेहरों के साथ स्थायी रूप से जुड़ा रहा। सपा के साथ 54 प्रतिशत पिछड़ों में 19 प्रतिशत से अधिक यादव वोट लामबंद रहा तो बसपा के साथ 21 प्रतिशत अनुसूचित जाति की आबादी में लगभग 55 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली जाटव बिरादरी का वोट बैंक खड़ा हुआ।

इस वोट बैंक के साथ 19 प्रतिशत मुस्लिम वोट जोड़ने का गणित तो कभी दूसरी जातियों का साथ लेकर दोनों सियासी ताकत बढ़ाते रहे। पहले 2007 में मायावती और बाद में 2012 में अखिलेश यादव ने अपने-अपने दलों की पूर्ण बहुमत की सरकार भी बना ली। पर, नरेंद्र मोदी के केंद्रीय राजनीति में प्रवेश के साथ इनके समीकरण गड़बड़ाने लगे।

राजनीति शास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं कि संगठन में काम करने के दौरान नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश को पहले से ही पूरी तरह समझ रहे थे। शायद इसीलिए उन्होंने हिंदुत्व के सहारे पिछड़ों और अनुसूचित जाति की खेमेबाजी तोड़ने पर ध्यान दिया। पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से गठबंधन सहित 73 प्रत्याशी सफल रहे। पर, सपा और बसपा के नेताओं ने शायद इसे सिर्फ संयोग और वक्ती मामला समझने की भूल की।

यह भी बना कारण

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मुलायम सिंह यादव - फोटो : अमर उजाला

लोकसभा चुनाव में हार मिली तो विधानसभा चुनाव से पहले यादव परिवार में चाचा-भतीजा के वर्चस्व की जंग छिड़ गई। इस खेमेबाजी ने सपा को और कमजोर किया। मोदी की लहर में विधानसभा चुनाव में भी दोनों पार्टियां जब सौ से भी कम सीटों पर सिमट गईं तो संभवत: मायावती और अखिलेश दोनों को अपने अस्तित्व पर संकट नजर आने लगा। इसका परिणाम गठबंधन है।

समाजशास्त्री डॉ. विनोद चंद्रा कहते भी हैं, राजनीति अवसरों का खेल है। गठबंधन सपा और बसपा दोनों की राजनीतिक जरूरत था और मैनपुरी में मंच पर मुलायम को लाना भी उसी जरूरत का हिस्सा है। दोनों की समझ में आ गया है कि एक नहीं होंगे तो सियासी तौर पर मिट जाएंगे। इसलिए एक हुए हैं।

रही बात मुलायम की तो उन्हें मंच पर मायावती के साथ लाकर समर्थकों को यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि इन दो घोर सियासी दुश्मनों ने अपनी दुश्मनी भुला दी है। इसलिए नीचे भी सब लोग एक हो जाओ।

मायावती ने मुलायम को बड़ा नेता बताते हुए दिया ये संदेश

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कई ऐसे मुद्दे रहे हैं जिनको लेकर गांव-गांव पिछड़ों में यादवों और अनुसूचित जाति में जाटवों के बीच आज भी जबरदस्त खेमेबाजी है। इनके पीछे एससी-एसटी एक्ट सहित अन्य तमाम वजहें हैं। मायावती और अखिलेश तो साथ आ गए थे लेकिन गांव-गांव यह खेमेबाजी खत्म नहीं हुई थी।

ऊपर से शिवपाल सिंह यादव जिस तरह नेताजी यानी मुलायम सिंह यादव के सम्मान को मुद्दा बना रहे थे और मुलायम भी बीच-बीच में कह देते थे कि वह गठबंधन के पक्ष में नहीं हैं, उससे भी अखिलेश व मायावती को पिछड़ों और अनुसूचित जाति के वोटों की एकजुटता में संकट लग रहा था।

अब जब चुनावी लड़ाई पिछड़ों और अनुसूचित जाति प्रभावित जमीन की तरफ बढ़ रही है तो मुलायम को मंच पर लाकर इस संकट को टालने की कोशिश की गई है। साथ ही मायावती ने मुलायम को पिछड़ों का बड़ा नेता बताते हुए यह संदेश देने का प्रयास किया है कि जब  वह नेताजी के बड़े कद को स्वीकार कर रही हैं तो पिछड़ी जातियों को नेताजी की तरह ही अखिलेश और उनके साथ आ जाना चाहिए।

मायावती ने अनुसूचित जाति के लोगों को पिछड़ों के साथ तो अखिलेश ने पिछड़ों को अनुसूचित जाति के साथ मिलकर वोट देने का संदेश दिया है। मोदी ने हिंदुत्व के हथियार से ओबीसी और एससी की दीवार गिराई थी तो अखिलेश अब मायावती और मुलायम को साथ खड़ा करके सियासी लड़ाई को अगड़ा बनाम ओबीसी व एससी बनाकर सियासी गणित ठीक करना चाहते हैं।

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