इस लोकसभा चुनाव में प्रयोगों के लिए जानी जाएगी बसपा, गठबंधन की नीति सहित ये हुए बदलाव
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17 वीं लोकसभा के चुनाव से बसपा को क्या हासिल हुआ, यह तो 23 मई को पता चलेगा, लेकिन यह चुनाव बसपा में कई नीतिगत बदलावों के लिए जाना जाएगा। इससे बसपा की आगे की दिशा का संकेत भी मिलने लगा है।
बसपा संस्थापक कांशीराम के समय में सपा, कांग्रेस और भाजपा से गठबंधन का प्रयोग कर राज्य की सत्ता के शिखर तक पहुंची पार्टी बीते कई वर्षों से किसी भी दल से गठबंधन न करने की नीति पर चल रही थी। लेकिन 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव तथा 2014 के लोकसभा चुनाव में अनपेक्षित प्रदर्शन ने बसपा को नीति में बदलाव को मजबूर कर दिया।
नतीजा ये हुआ कि बसपा ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, तेलंगाना व आंधप्रदेश जैसे कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा। यूपी में तो धुरविरोधी सपा से गठबंधन का निर्णय इसलिए भी अहम रहा क्योंकि माया कई बार यह कहते नजर आईं कि वे गेस्ट हाउस कांड को भूली नहीं हैं। पर बाद में उन्होंने न सिर्फ सपा से गठबंधन किया, बल्कि सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के लिए वोट भी मांगा। अब चुनाव नतीजे बताएंगे निजी मान-अपमान मन में दबाकर सियासी सम्मान का यह प्रयोग कितना कारगर साबित हुआ है?
पार्टी के भविष्य को लेकर दिया संदेश
इसी तरह बसपा की बुनियाद ही परिवारवाद के खिलाफ मानी जाती रही है। कांशीराम से लेकर मायावती तक की घर-परिवार त्यागकर पार्टी को आगे बढ़ाने की मुहिम अर्से तक मिसाल दी जाती रही। लेकिन इस लोकसभा चुनाव में पार्टी के इस सिद्धांत में बदलाव हुआ।
माया ने भतीजे आकाश आनंद को पहले पार्टी गतिविधियों में सामने लाना शुरू किया। फिर 16 अप्रैल को आगरा की जनसभा में आनंद को अपने विकल्प में बतौर वक्ता उतारकर यह खुला संदेश दे दिया कि उनके बाद लोगों को पार्टी का भविष्य आकाश को मान लेना चाहिए।
माया ने इस चुनाव में खुद को पीएम पद के दावेदार के तौर पर पेश किया और इसके लिए पीएम मोदी के खिलाफ विपक्षी नेताओं में ममता बनर्जी के बाद सर्वाधिक मुखर मोर्चा खोला।
मायावती में बड़ा बदलाव
माया हमेशा भाषण पढ़कर देती हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी वह लिखा ही पढ़ती हैं। समझा जा सकता है कि उनके मुंह से निकली हर बात बहुत सोची-समझी होती है। मगर इस चुनाव में माया भी धार्मिक आधार पर मतदाताओं के ध्रुवीकरण के लोभ से बच नहीं पाईं। इस आरोप में उन्हें भी चुनावी प्रचार पर प्रतिबंध झेलना पड़ा।
बढ़ा सम्मान
बसपा का बड़ा से बड़ा नेता मायावती के पैर छूकर आशीर्वाद लेता रहा है। लेकिन यह पहला चुनाव था जिसमें दूसरे दलों के दिग्गज नेता भी माया के पैर छूकर आशीर्वाद लेते दिखे। सपा-बसपा गठबंधन के एलान के बाद राजद नेता तेजस्वी यादव और चुनाव प्रचार के दौरान सपा मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव मायावती की पैर छूती नजर आईं। सामाजिक व राजनीतिक फलक पर इसे बड़े बदलाव के तौर पर महसूस किया गया।
सोशल मीडिया पर दी दस्तक
मायावती सोशल मीडिया से इस चुनाव से पहले दूर रहती थीं। पर इस बार वे ट्विटर पर आईं और पूरे चुनाव सक्रिय रहीं। यह सक्रियता जारी है। अब तक उनके 2.71 लाख फॉलोवर हो चुके हैं।