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कमीशन का खेल, मरीज बेहाल, जन औषधि फेल
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हिमांशु अवस्थी
महिला मरीज सरोज बाजपेई ने बलरामपुर अस्पताल की मेडिसिन विभाग की ओपीडी में दिखाया। डॉक्टर ने की लिखी दो दवाएं तो अस्पताल काउंटर से मिल गई। बाकी दवा के लिए जेनेरिक स्टोर पर गईं तो वहां पर मोनोपोली दवा नहीं मिली। आखिर में उन्हें बाहर खुले मेडिकल स्टोर से महंगी दवा लेनी पड़ी।
ममता देवी ने मनोरोग विभाग की ओपीडी में दिखाया। डॉक्टर ने एजीकाल, बिटास्टीन मानसिक दवा लिखी। महिला मरीज जेनेरिक स्टोर पर पर्चा लेकर गई। वहां कोई दवा नहीं मिली। महिला मरीज दो दिन शहर भर में दवा ढूंढती रही, मगर आखिरकार दवा बलरामपुर अस्पताल के पास बने मेडिकल स्टोर पर ही मिली।
मरीज सुमन ने ऑर्थोपेडिक विभाग की ओपीडी में डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने तीन दवा लिखी। इसमें एजकॉल मोनोपोली दवा लिखी गई। जेनेरिक स्टोर से वापस लौटने के बाद उसे बाहर ये दवा मिल गई।
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सरकारी अस्पतालों के कुछ डॉक्टरों और निजी फार्मा कंपनियों का सिंडिकेट मरीजों के लिए मुसीबत बन गया है। कमीशन के फेर में डॉक्टर जेनेरिक या ब्रांडेड दवाएं लिखने के बजाय महंगी मोनोपोली दवाएं लिख रहे हैं।
ये सिर्फ उन्हीं मेडिकल स्टोर पर मिलती हैं, जहां डॉक्टरों का कमीशन सेट होता है। ऐसे में जन औषधि केंद्रों पर दवा लेने पहुंचने वाला खाली हाथ लौटता है और घाटे के कारण ये केंद्र भी बंद होने के कगार पर पहुंच गए हैं।
राजधानी के सरकारी अस्पतालों में 26 जन औषधि केंद्र खोले गए थे। कोविड काल में ये बंद हो गए थे। कई अस्पतालों में काफी प्रयास के बाद इन्हें दोबारा शुरू कराया गया, मगर डॉक्टरों की लिखी मोनोपोली दवाएं यहां मिलती नहीं।
इससे इन केंद्रों का खर्चा तक नहीं निकल पा रहा। जन औषधि केंद्र शुरू हुए थे तो यहां मरीजों की लंबी कतार लगती थी। बलरामपुर अस्पताल के जन औषधि केंद्र पर कार्यरत फार्मासिस्ट बताता है कि हमारे यहां पर्याप्त दवाएं उपलब्ध हैं।
वहीं सांची की निदेशक संगीता सिंह भी कहती हैं कि जिन जगहों पर स्टोर बंद हैं, उन्हें दोबारा शुरू कराया जा रहा है। वहीं अस्पताल प्रशासन का कहना है सभी डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने के निर्देश हैं। इसके बाद भी कोई डॉक्टर मोनोपोली दवाएं लिखता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की जाएगी।
रामसागर मिश्रा अस्पताल में खुले स्टोर पर दवाएं नहीं
रामसागर मिश्रा अस्पताल में खुले जन औषधि केंद्र पर मरीजों को आसानी से दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। उन्हें दवाओं के लिए बाहर जाना पड़ता है। आरोप है कि केंद्र पर महज 100 के आसपास ही दवाएं उपलब्ध हैं।
लोहिया समेत पांच अस्पतालों में जन औषधि केंद्रों पर लटक रहा ताला
लोहिया संस्थान के अस्पताल ब्लॉक में खुले जन औषधि केंद्र पर करीब साल भर से ताला लटक रहा है। संस्थान प्रशासन ने उस जगह पर स्टोर संचालन न करने की बात कही थी। ऐसे में जगह तय न हो पाने से स्टोर पर ताला लगा हुआ है। यही हाल रानी लक्ष्मीबाई अस्पताल का है। पहले परिसर में जहां जन औषधि केंद्र बना था, वहां अब ऑक्सीजन प्लांट लगा दिया गया है। ऐसे में वहां पर अभी तक दोबारा स्टोर नहीं शुरू हो सका। इसी तरह मोहनलालगंज, गोसाईंगंज, सिविल अस्पताल में भी इन केंद्रों पर ताला बंद हैं।
जेनेरिक में आठ रुपये, मोनोपोली वाली पांच गुना महंगी
मानसिक बीमारी में प्रयोग होने वाली दवा स्टेलोपॉम जेनेरिक स्टोर पर महज आठ रुपये में मिल रही है। जबकि यही दवा बाहर मेडिकल स्टोर पर मेनोपोली के नाम पर 70-80 रुपये में का एक पत्ता मिल रही है।
डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने के निर्देश हैं। अगर कोई डॉक्टर मोनोपोली दवाएं लिख रहा है तो मामले की जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. आरके गुप्ता, सीएमएस, बलरामपुर अस्पताल
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महिला मरीज सरोज बाजपेई ने बलरामपुर अस्पताल की मेडिसिन विभाग की ओपीडी में दिखाया। डॉक्टर ने की लिखी दो दवाएं तो अस्पताल काउंटर से मिल गई। बाकी दवा के लिए जेनेरिक स्टोर पर गईं तो वहां पर मोनोपोली दवा नहीं मिली। आखिर में उन्हें बाहर खुले मेडिकल स्टोर से महंगी दवा लेनी पड़ी।
ममता देवी ने मनोरोग विभाग की ओपीडी में दिखाया। डॉक्टर ने एजीकाल, बिटास्टीन मानसिक दवा लिखी। महिला मरीज जेनेरिक स्टोर पर पर्चा लेकर गई। वहां कोई दवा नहीं मिली। महिला मरीज दो दिन शहर भर में दवा ढूंढती रही, मगर आखिरकार दवा बलरामपुर अस्पताल के पास बने मेडिकल स्टोर पर ही मिली।
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मरीज सुमन ने ऑर्थोपेडिक विभाग की ओपीडी में डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने तीन दवा लिखी। इसमें एजकॉल मोनोपोली दवा लिखी गई। जेनेरिक स्टोर से वापस लौटने के बाद उसे बाहर ये दवा मिल गई।
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सरकारी अस्पतालों के कुछ डॉक्टरों और निजी फार्मा कंपनियों का सिंडिकेट मरीजों के लिए मुसीबत बन गया है। कमीशन के फेर में डॉक्टर जेनेरिक या ब्रांडेड दवाएं लिखने के बजाय महंगी मोनोपोली दवाएं लिख रहे हैं।
ये सिर्फ उन्हीं मेडिकल स्टोर पर मिलती हैं, जहां डॉक्टरों का कमीशन सेट होता है। ऐसे में जन औषधि केंद्रों पर दवा लेने पहुंचने वाला खाली हाथ लौटता है और घाटे के कारण ये केंद्र भी बंद होने के कगार पर पहुंच गए हैं।
राजधानी के सरकारी अस्पतालों में 26 जन औषधि केंद्र खोले गए थे। कोविड काल में ये बंद हो गए थे। कई अस्पतालों में काफी प्रयास के बाद इन्हें दोबारा शुरू कराया गया, मगर डॉक्टरों की लिखी मोनोपोली दवाएं यहां मिलती नहीं।
इससे इन केंद्रों का खर्चा तक नहीं निकल पा रहा। जन औषधि केंद्र शुरू हुए थे तो यहां मरीजों की लंबी कतार लगती थी। बलरामपुर अस्पताल के जन औषधि केंद्र पर कार्यरत फार्मासिस्ट बताता है कि हमारे यहां पर्याप्त दवाएं उपलब्ध हैं।
वहीं सांची की निदेशक संगीता सिंह भी कहती हैं कि जिन जगहों पर स्टोर बंद हैं, उन्हें दोबारा शुरू कराया जा रहा है। वहीं अस्पताल प्रशासन का कहना है सभी डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने के निर्देश हैं। इसके बाद भी कोई डॉक्टर मोनोपोली दवाएं लिखता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की जाएगी।
रामसागर मिश्रा अस्पताल में खुले स्टोर पर दवाएं नहीं
रामसागर मिश्रा अस्पताल में खुले जन औषधि केंद्र पर मरीजों को आसानी से दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। उन्हें दवाओं के लिए बाहर जाना पड़ता है। आरोप है कि केंद्र पर महज 100 के आसपास ही दवाएं उपलब्ध हैं।
लोहिया समेत पांच अस्पतालों में जन औषधि केंद्रों पर लटक रहा ताला
लोहिया संस्थान के अस्पताल ब्लॉक में खुले जन औषधि केंद्र पर करीब साल भर से ताला लटक रहा है। संस्थान प्रशासन ने उस जगह पर स्टोर संचालन न करने की बात कही थी। ऐसे में जगह तय न हो पाने से स्टोर पर ताला लगा हुआ है। यही हाल रानी लक्ष्मीबाई अस्पताल का है। पहले परिसर में जहां जन औषधि केंद्र बना था, वहां अब ऑक्सीजन प्लांट लगा दिया गया है। ऐसे में वहां पर अभी तक दोबारा स्टोर नहीं शुरू हो सका। इसी तरह मोहनलालगंज, गोसाईंगंज, सिविल अस्पताल में भी इन केंद्रों पर ताला बंद हैं।
जेनेरिक में आठ रुपये, मोनोपोली वाली पांच गुना महंगी
मानसिक बीमारी में प्रयोग होने वाली दवा स्टेलोपॉम जेनेरिक स्टोर पर महज आठ रुपये में मिल रही है। जबकि यही दवा बाहर मेडिकल स्टोर पर मेनोपोली के नाम पर 70-80 रुपये में का एक पत्ता मिल रही है।
डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने के निर्देश हैं। अगर कोई डॉक्टर मोनोपोली दवाएं लिख रहा है तो मामले की जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. आरके गुप्ता, सीएमएस, बलरामपुर अस्पताल