निकाय चुनाव: गुजरात व हिमाचल के साथ यूपी में भी भाजपा की परीक्षा
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नगर निकाय चुनाव की रणभेरी बजने के साथ ही प्रदेश में राजनीतिक दलों की 2017 में दूसरी परीक्षा की भी उल्टी गिनती शुरू हो गई है।
आबादी के नाते देश के सबसे बड़े प्रदेश में तीन करोड़ से अधिक मतदाताओं के जरिये तय होने जा रही जीत-हार को भाजपा के लिए गुजरात और हिमाचल में चल रहे विधानसभा चुनाव के नतीजों से कम महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता तो कांग्रेस की भावी दिशा व दशा के लिहाज से भी ये चुनाव कम अहम नहीं हैं।
भले ही ये निकाय के चुनाव हों लेकिन एक तरह से इनके नतीजे भी गुजरात और हिमाचल की तरह ही भाजपा व कांग्रेस का भविष्य बताने वाले होंगे।
नतीजों से जहां प्रदेश में 14 वर्षों के वनवास के बाद सत्ता में वापस आई भाजपा सरकार के सात महीनों के कामकाज पर जनता की राय सामने आएगी तो वहीं लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की तैयारियों की जमीन का पता चलेगा।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस व भाजपा ही नहीं बल्कि सपा और बसपा की जड़ों की गहराई भी लोगों के सामने आएगी।
वैसे तो भाजपा के लिए निकाय चुनाव हमेशा ही महत्वपूर्ण रहे हैं लेकिन इस बार के चुनाव का पार्टी के लिए कुछ कारणों से खास महत्व है। कारण, प्रदेश में भाजपा की भगवा एजेंडे को लगातार धार देने वाली सरकार है।
यह प्रदेश में भाजपा की ऐसी पहली सरकार है जिसके पास तीन चौथाई बहुमत है। मतलब, फैसले करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र। सत्ता में आने के बाद इस सरकार ने न सिर्फ पार्टी के एजेंडे की जमीन अयोध्या, मथुरा-वृंदावन और काशी को फोकस करते हुए विकास कार्य शुरू किए हैं बल्कि हिंदुओं की श्रद्धा से जुड़े स्थानों के विकास की भी कई योजनाएं बनाई हैं।
अयोध्या में छोटी दिवाली के बहाने त्रेता युग की छटा बिखेरकर जहां लोगों को यह संदेश देने की कोशिश की जा चुकी है कि पहली बार यूपी में हिंदुत्व के सरोकारों पर काम के लिए संकल्पित सरकार सत्ता में आई है।
यही नहीं, किसानों की कर्जमाफी जैसे बड़े फैसले का असर भी इस चुनाव में सामने आना है। कारण, भले ही ये चुनाव शहरों के हों लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि नगरों में रहने वालों में तमाम लोगों की जड़े आज भी गांवों से जुड़ी हैं। किसानों की कर्जमाफी का लाभ कुछ न कुछ शहरों में रहने वाले गांव वालों को भी मिला होगा। इन सब कामों का जनता के बीच असर पता चलेगा।
इसलिए भी परीक्षा
भाजपा की केंद्र और प्रदेश सरकार ने अपने शासन में शहरों के समग्र विकास के लिए अमृत योजना शुरू की। सफाई अभियान चलाए गए। लखनऊ में मेट्रो में शुरू हुई तो वाराणसी, कानपुर, आगरा, मेरठ, इलाहाबाद व गोरखपुर में प्रस्तावित की गई है।
कई शहरों में यातायात को सुगम बनाने के लिए जिस तरह कदम उठाए गए और आउटर रिंग रोड पर काम शुरू हुए। शहरों की सफाई पर फोकस करते हुए भाजपा सरकार ने नगरों को खुले में शौचालय मुक्त बनाने का अभियान चला रखा है।
नदियों की सफाई की भी योजना बनी है। सबको आवास मुहैया कराने के लिए योजनाएं शुरू की गई हैं। जाहिर है कि निकाय चुनाव में सरकार के ये काम भी कसौटी पर कसे जाएंगे। भाजपा के हिस्से में पड़ने वाले वोट से यह पता चलेगा कि जनता के बीच सरकार के इन कामों का कितना असर हुआ है।
राजनीतिक प्रयोगशाला भी
प्रदेश के निकाय चुनाव एक तरह से लोकसभा चुनाव के लिए लिटमस टेस्ट का काम करने वाले हैं। खासतौर से ये बात देखने वाली होगी कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक जंग को 80 बनाम 20 में बदलने में जुटी भाजपा इस प्रयोग को निकाय चुनाव में आजमाने में कहां तक सफल होती है।
यह बात इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा काफी पहले से नगरों में मजबूत जनाधार रखने वाली पार्टी मानी जाती रही है। इसलिए माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में आजमाए जाने वाले सभी सियासी हथियारों का भाजपा की तरफ से इस चुनाव में परीक्षण कर लिया जाएगा।
जाहिर है कि इन चुनाव के नतीजे ये भी बताएंगे कि भाजपा की रणनीति व रणनीतिकार कितना सफल है। साथ ही विधानसभा चुनाव में शहरों में भाजपा को मिले समर्थन में बीते सात महीने में कितनी बढ़ोतरी या कमी आई है।
समाजवादी पार्टी, बसपा और कांग्रेस की तरफ से किए जा रहे इन दावों में कितनी सच्चाई है कि भाजपा के सात महीने के शासन में ही जनता पूरी तरह ऊब गई है। लोग भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए तैयार बैठे हैं।