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नए मुद्दे-परंपराएं देकर विदा हुआ लिटरेचर कार्निवाल
दीप सिंह/लखनऊ
Updated Mon, 09 Dec 2013 02:09 PM IST
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तीन दिन तक चला लखनऊ लिटरेचर कार्निवाल कुछ नए मुद्दे और परंपराएं देकर रविवार को विदा हो गया। ‘जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल’ की तर्ज पर शुरू हुआ आयोजन भले ही वह ऊंचाइयां नहीं छू पाया लेकिन एक नई शुरुआत हुई।
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देश भर के जाने-माने लेखक जुटे। हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी लेखन से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चाओं का दौर चला। कई किताबों का विमोचन हुआ।
खास बात यह रही कि लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब को ध्यान में रखकर गूढ़ साहित्य के साथ फिल्म, नाटक, दास्तानगोई सरीखी विधाओं के अलावा संगीत की भी महफिल सजी।
पहली बार मिलिट्री राइटिंग जैसे विषय पर इस कार्निवाल में दो दिन चर्चा हुई। इसमें दो पूर्व थल सेनाध्यक्षों सहित कई पूर्व सैन्य अधिकारी शामिल हुए।
समारोह में एक ओर हिंदी और अंग्रेजी के वरिष्ठ साहित्यकार थे तो नए साहित्कारों को भी मंच मिला। बाराबंकी की युवा डीएम मिनिस्ती एस बतौर साहित्कार समारोह में मौजूद थीं।
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उनकी किताब ‘इटर्नल वुमैन’ का विमोचन हुआ और उसे पढ़ा। वीएलसीसी की संस्थापक वंदना लूथरा की किताब ‘ए गुड लाइफ’ का भी विमोचन हुआ। उस पर परिचर्चा भी हुई।
ऐसे साहित्यकार बड़ा मंच पाकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। वहीं शहर की कई हस्तियां भी साहित्यक चर्चा में शामिल हुईं।
इनमें सामाजिक कार्यकर्ता प्रो. रूपरेखा वर्मा, मौलाना मुइनुद्दीन चिश्ती विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अनीस अंसारी, फैशन डिजाइनर आसमां हुसैन, प्रो. निशि पांडेय सहित शामिल रहीं।
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इसके अलावा कई आईएएस भी साहित्यक आयोजन में शरीक हुए। सभी ने एक बड़े आयोजन की इस शुरुआत को सराहा। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजनों से शहर की पहचान बनती है और साहित्यिक माहौल बनाने में मदद मिलती है।
कार्निवाल के आखिरी दिन रविवार को पहला सत्र सैन्य अधिकारियों के नाम रहा। इसमें उन्होंने सैन्य लेखन से लेकर सरकारी नीतियों और सीमा पर लड़ने वाले जांबाजों के बारे में खुलकर चर्चा की।
यहां देखें तस्वीरें
नादिरा बब्बर के नाटकों ने आम श्रोताओं के मन को छू लिया तो अमीर खुसरो पर दास्तानगोई ‘खुसरो दरिया प्रेम का’ भी पहली बार लखनऊ के श्रोताओं को सुनने को मिली।
इसका यह पहला मंचन था। वहीं उर्दू लेखिकाओं पर परिचर्चा के दौरान महिला मुद्दों पर भी बात हुई। आरिफ सलीम के नाटक ‘हमसफर’ का मंचन हुआ और म्यूजिकल शो का भी लोगों ने आनंद लिया।
अनुपम सिन्हा ने कार्टून राइटिंग पर बात की तो प्रवीन तल्हा ने अपनी किताब ‘फिदा-ए-लखनऊ’ के कुछ अंश सुनाए। इसमें बंटवारे के समय लखनऊ के परिवारों की कहानी को बयां किया गया है। इसके अलावा भी कई किताबों पर परिचर्चा हुई।