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फिर सामने आ सकता है जानकीपुरम घोटाले का जिन्न!

Fri, 30 May 2014 10:25 AM IST
ऋषि मिश्र/अमर उजाला, लखनऊ
ऋषि मिश्र/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 30 May 2014 10:25 AM IST
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lightning will strike at four hundred allottees

जानकीपुरम घोटाले का जिन्न एक बार फिर जागने जा रहा है। इस बार इस घोटाले के जरिये जितने भी आवंटी प्लाट पाए हैं, उन सब पर गाज गिराने की तैयारी की जा रही है।

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एलडीए की पिछली बोर्ड मीटिंग में वर्तमान कीमत लेकर सभी आवंटियों को नियमित करने का प्रस्ताव लाया गया था।

मगर अब इन सभी आवंटियों की रजिस्ट्री रद कराने की कार्यवाही प्राधिकरण की ओर से शुरू कर दी गई है।

इसके तहत एलडीए अगली बोर्ड मीटिंग में बाकायदा प्रस्ताव लाया जा रहा है। इसको लेकर प्राधिकरण के विधिक सलाहकार से लीगल रिपोर्ट मांगी गई है।

अगर ये रजिस्ट्री रद की गईं तो सैकड़ों अवैध मकान ढहा दिए जाएंगा।

इन प्लाटों पर अब कई मंजिलों के मकान बन चुके हैं। प्राधिकरण में अधिकारियों और बाबुओं की मिलीभगत से 1996 से 1998 के बीच जानकीपुरम प्लाट आवंटन का बड़ा घोटाला हुआ था।
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इसमें जानकीपुरम के सेक्टर आई और एफ में सवा चार सौ प्लाट निकाले गए थे। पहली गड़बड़ी ये की गई कि ये प्लाट ग्रीन बेल्ट पर थे।

फिर बिना कोई प्रक्रिया अपनाए ये प्लाट लोगों को आवंटित कर दिए गए।

आवंटन के बाद जब रजिस्ट्री की गई तो उसमें भी बहुत कम धन जमा किया गया, तो कहीं कुछ भी नहीं जमा किया गया।

वर्ष 2000 आते-आते इन प्लाटों पर निर्माण के लिए नक्शे एलडीए में जमा किए जाने लगे।

नक्शे जमा किए जाने पर पता चला कि ऐसे प्लाट ही अस्तित्व में नहीं हैं।

जहां ये प्लाट इंगित किए गए थे, प्राधिकरण के मास्टर प्लान के हिसाब से उन स्थानों पर ग्रीनबेल्ट विकसित किया जाना था।

इसके बाद इस पूरे घोटाले की परत दर परत खुलती चली गई। खुलासा हुआ कि एक-एक कर के सारी फाइलें गायब कर दी गईं।

अधिकारियों ने लगातार पत्रावलियां तलब कीं, मगर कुछ भी सामने नहीं लाया गया।

आखिरकार इस प्रकरण में सीबीआई जांच का आदेश दिया गया।

सीबीआई की जांच के बाद कुछ लोगों ने अपने कागज प्रस्तुत किए। इनकी संख्या लगभग सवा सौ थी।

इसके आधार पर पता चला कि इन सारे प्लाटों का आवंटन एक सुनियोजित घोटाले का नतीजा था।

इसमें अधिकारी से लेकर नीचे के कर्मचारी तक शामिल थे। कोई योजना ही नहीं थी और न ही कहीं कोई जमीन थी।

इसके बावजूद 425 लोगों को प्लाटों का आवंटन किया गया। इनसे उस समय के सर्किल रेट के हिसाब से तय रकम भी नहीं ली गई।

सीबीआई की सिफारिश पर कई अधिकारी सस्पेंड किए गए। कुछ जेल गए।

कई कर्मचारियों को भी जेल की हवा खानी पड़ी थी। हाईकोर्ट ने अपनी पूरी जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंप दी।

जबकि, प्राधिकरण ने अपनी विभागीय जांच में तीन कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया।

पिछली बोर्ड मीटिंग में एक विवादित प्रस्ताव आया था। इसके तहत जिन 125 आवंटियों ने अपने कागज जांच में सहयोग के लिए पेश किए थे, उनको नियमित किया जाना था।

उनसे वर्तमान सर्किल रेट लेकर उनको वैध आवंटी बनाया जा रहा था। मगर इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी गई। इसके बाद अब नया प्रस्ताव लाया जाएगा।

इस मामले में विधिक राय मांगी गई है। सभी सवा चार सौ आवंटियों का आवंटन अवैध है।

इसलिए सभी की रजिस्ट्री डीड खत्म की जानी चाहिए। यह पूरी भूमि बाद में बतौर ग्रीन बेल्ट खाली कराई जाएगी।

प्राधिकरण के एक अधिकारी बताते हैं कि इस संबंध में विधिक राय मांगी गई है। घोटाले वाले प्लाटों पर वर्तमान में कई मंजिल के अनेक मकान बन चुके हैं।

अगर इन भवनों की रजिस्ट्री खत्म की गई तो इन सबको ढहाया जाएगा।

ऐसे में इन भवन स्वामियों के बीच में हड़कंप की स्थिति बन जाएगी। इसी वजह से कानूनी तौर पर यह कितना उचित या अनुचित है, इसको लेकर विधिक राय मांगी जा रही है।
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