UP: हर किसी को क्यों गले लगा रहे भाजपाई?
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एक वक्त था जब भाजपा की पहचान ऐसी पार्टी के रूप में थी जो सामान्य स्थिति में न दलबदल कराती थी और न इसे बढ़ावा ही देती थी।
पार्टी के नेता मंचों से खुलेआम चुनाव में दलबदलुओं को हराने का ऐलान करते थे, पर वही भाजपा पिछले कुछ वर्षों से दलबदल कराने में आगे दिख रही है।
कुछ नेताओं ने तो इसे अपने परिश्रम व जनाधार बढ़ाने का पैमाना बना लिया है। इस स्थिति ने भाजपा के निष्ठावान व पुराने कार्यकर्ताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं। उन्हें यह आशंका सताने लगी है कि भाजपा कहीं दलबदलुओं का दल ही बनकर न रह जाए।
लोकसभा चुनाव से पहले दलबदलुओं को एंट्री भाजपा में शुरू हुई थी, जो रुकने का नाम नहीं ले रही। चुनाव में सूबे में भाजपा के 78 में से 71 सीटें जीतने के बाद यह सिलसिला और तेज हो गया है।
पहले भाजपा छोड़ी, अब फिर आ रहे वापस
भाजपा में एक के बाद एक नेता शामिल हो रहे हैं। कोई लखनऊ में तो कोई जिलों में। इनमें वे भी हैं जो कभी भाजपा में ही थे, पर भाजपा का जहाज डूबते देख दूसरे पार्टी के साथ हो लिए।
अब जब दूसरी पार्टी के जहाज के डूबने का खतरा दिखाई देने लगा तो फिर उन्हें अपना पुराना जहाज सुरक्षित नजर आने लगा।
कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें अब अपने मौजूदा दल के बजाय भाजपा अच्छी लगने लगी है। इसलिए पुराने घर को छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं।
बन रहे हंसी के पात्र
भाजपा नेतृत्व ने दलबदलुओं के लिए लाल कालीन बिछा दी है। विभिन्न दलों के जिला, शहर व प्रदेश स्तर के कई नेता भाजपा में आ चुके हैं। पूर्व विधायक रामआसरे अग्निहोत्री, महेश त्रिवेदी, पूर्व सांसद गोरखनाथ पांडेय व बसपा शासन में एक आयोग की अध्यक्ष रहीं आभा अग्निहोत्री सहित कई भाजपा में आ चुके हैं।
बसपा विधायक बाला प्रसाद अवस्थी ने अपने पुत्र राजीव के जरिये उसी तरह भाजपा से रिश्ता जोड़ा है, जैसे लोकसभा चुनाव से पहले बृजभूषण शरण सिंह ने अपने पुत्र प्रतीक सिंह के जरिये पार्टी में एंट्री ली थी।
कुल मिलाकर जो भी भाजपा में आने को कह रहा है, भगवा टोली के नेता उसे गले लगाने को तैयार दिख रहे हैं। इस चक्कर में कुछ मौकों पर हास्यास्पद स्थिति भी उत्पन्न हो गई।
इसका हालिया उदाहरण बलिया में समाजवादी महिला मोर्चा की जिला उपाध्यक्ष सरिता सिंह का है। पार्टी की तरफ से सरिता को भाजपा में शामिल करने का बयान जारी हो गया, पर सरिता सिंह के खंडन ने भाजपा नेताओं की स्थिति हास्यास्पद बना दी।
जीत के उत्साह में भूल गईं कसमें
विधानसभा चुनाव 2012 में बाबूसिंह कुशवाहा को शामिल करने के बाद मचे बवाल और चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद भाजपा नेताओं ने दलबदलुओं को गले न लगाने की कसमें खाई थीं।
कार्यकर्ताओं को आश्वस्त किया गया था कि घर तोड़ने व छोड़ने वालों को दोबारा पार्टी में प्रवेश नहीं दिया जाएगा, पर लोकसभा चुनाव और खास तौर से नरेंद्र मोदी के भाजपा का प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित होने के बाद दूसरे दलों से भाजपा में एंट्री का सिलसिला फिर शुरू हो गया।
भाजपा नेता पुरानी कसमें और कार्यकर्ताओं से किए गए वादों को भूल दलबदलुओं को गले लगाने में जुट गए। अब जब उनके सामने लोकसभा चुनाव में 71 में 24 दलबदलुओं के जीतने का उदाहरण है तो वह दूसरों को गले लगाने में पीछे क्यों रहें।