पढ़िए, यूपी में सियासी बगावत की कहानी
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जैसे-जैसे मतदान की तारीख करीब आती जा रही है, विरोधियों को मात देने के लिए एक से एक चालें तो चली जा रही हैं, कोई टिकट न मिलने से नाराज है तो किसी ने हवा का रुख भांपकर आरोप लगाते हुए दूसरे पाले में छलांग लगा दी है।
कुछ ऐसे भी हैं जो बोल तो कुछ भी नहीं रहे पर अपने समर्थकों के जरिये अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी की जड़ों में मट्ठा डालने में लगे हुए हैं।
वैसे तो इस बीमारी से कोई दल नहीं बचा लेकिन काडर बेस मानी जाने वाली भाजपा व अनुशासन प्रिय सपा में अन्तर्विरोध के स्वर कुछ ज्यादा ही मुखर हो रहे हैं।
टिकट नहीं मिला तो ये घर बैठे
टिकटों को लेकर नाराजगी में सबसे ज्यादा परेशान भाजपा ही है। यहां आम कार्यकर्ता या जिलों के नेता तो दूर पार्टी के अधिकांश पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तक नाराज चल रहे हैं।
सबसे दिलचस्प स्थिति देवरिया की है। पार्टी ने यहां पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कलराज मिश्र को उम्मीदवार घोषित किया है तो एक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व सीट के दावेदार सूर्यप्रताप शाही नाराज होकर घर बैठ गए हैं।
यहीं पर पूर्व सांसद प्रकाशमणि त्रिपाठी भी नाराज है। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी भी इलाहाबाद सीट के लिए पहले अपने नाम की घोषणा, फिर सूची से नाम गायब होने से नाराज हैं।
ओमप्रकाश सिंह भी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं।
टिकट न मिला तो छोड़ी भाजपा
ओम प्रकाश सिंह के पुत्र अनुराग सिंह लोकसभा चुनाव 2009 में मिर्जापुर से प्रत्याशी थे। इस बार भी वहीं से टिकट मांग रहे थे। पर, भाजपा ने यह सीट समझौते में अपना दल के अनुप्रिया पटेल को दे दी।
नाराज अनुराग ने भाजपा छोड़ दी है। ओमप्रकाश सिंह भी घर बैठे हैं। पार्टी के एक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विनय कटियार तो पूरे चुनावी परिदृश्य से गायब हैं।
नाराजगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आगरा के महापौर इंद्रजीत वाल्मीकि ‘आर्य’ और फतेहपुर के पूर्व सांसद डॉ. अशोक पटेल पार्टी छोड़ गए।
वाल्मीकि ने संघ और भाजपा को दिया तगड़ा झटका
वाल्मीकि का जाना भाजपा और संघ परिवार के लिए बड़ा झटका है। वाल्मीकि संघ परिवार के उस प्रकल्प से जुडे़ थे जो धर्मान्तरण करके ईसाई व मुस्लिम बने लोगों की घर वापसी कराता था।
भाजपा के पूर्व उपाध्यक्ष विधान परिषद सदस्य हृदयनारायण दीक्षित टिकट वितरण को लेकर नाराज हैं तो कल्याण सिंह के खिलाफ कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल रखा है।
मिश्री लाल राजपूत पार्टी छोड़ गए तो मुजफ्फरनगर से पार्टी विधायक संगीत सोम टिकट न मिलने से नाराज हैं। पूर्व सांसद अशोक प्रधान भी टिकट न मिलने से नाराज हैं।
अब तो अपनी ही पार्टी की काट रहे हैं जड़ें
सपा में नाराजगी के स्वर तो मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से ही उभरने लगे थे, जब बागपत सीट से घोषित प्रत्याशी सोमपाल शास्त्री ने अपना टिकट लौटा दिया था।
उसके बाद सिलसिला बढ़ता ही गया। जौनपुर से घोषित प्रत्याशी केपी यादव को बदलकर जब अखिलेश सरकार में मंत्री पारसनाथ यादव को उम्मीदवार बनाया तो केपी ने बागी तेवर अपना लिए।
अब केपी आम आदमी पार्टी से मैदान में हैं। कैसरगंज से सांसद बृजभूषण शरण सिंह नाराज होकर सपा का टिकट लौटाकर भाजपा में पहुंचे तो भाजपा ने भी फौरन टिकट थमा दिया।
सपा छोड़ी और भाजपा में कूदे
कीर्तिवर्धन सिंह का गोंडा से टिकट कटा तो वे भाजपा के टिकट पर मैदान में उतर गए। इसके चलते उनके पिता आनंद सिंह को अखिलेश मंत्रिमंडल से हटा दिया गया।
फर्रुखाबाद में तो आपसी उठापटक के चलते पार्टी मुख्य लड़ाई से बाहर जाती दिख रही है। पहले अमृतपुर से विधायक व होमगार्ड राज्य मंत्री नरेंद्र यादव के बेटे सचिन को प्रत्याशी घोषित किया गया।
पर अचानक विधायक रामेश्वर यादव को प्रत्याशी बना दिया गया। इससे नाराज सचिन अपने समर्थकों के साथ रामेश्वर को हराने में जुटे हैं।
अब गैर ही बने अपने
कुछ ऐसा ही हाल सहानरपुर का है। पार्टी ने पहले इमरान मसूद को प्रत्याशी घोषित किया।
फिर कुछ महीने बाद अचानक उनके चाचा रशीद मसूद के बेटे शाजान को उम्मीदवार बना दिया गया। नाराज इमरान कांग्रेस पहुंच गए और मैदान में ताल ठोक रहे हैं।
लखनऊ, श्रावस्ती, गाजीपुर सहित अनेक अन्य क्षेत्रों में भी पहले से घोषित प्रत्याशियों का टिकट काटे जाने को लेकर नाराजगी है।
हाथी नहीं साइकिल की सवारी ही सही
कैराना से बसपा सांसद बेगम तबस्सुम हसन और संभल के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने ऐन चुनाव के पहले बसपा छोड़ दी।
अब बर्क खुद सपा प्रत्याशी बन कर आ गए हैं तो तबस्सुम हसन ने अपने बेटे नाहिद हसन को प्रत्याशी बनवा दिया है।
बसपा ने विधानसभा चुनाव के बाद गोंडा में रिजवान जहीर को प्रभारी घोषित किया था। बाद में मसूद आलम को प्रभारी बना दिया। कुछ दिनों बाद रिजवान को बाहर का रास्ता दिखा दिया।
टिकट चाहिए पार्टी छोटी हो मायने नहीं
श्रावस्ती से पार्टी के लोकसभा प्रभारी रहे पूर्व एमएलसी धीरेंद्र प्रताप सिंह धीरू को पार्टी ने निकाला तो वे भाजपा का दामन थाम कर बसपा को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
बसपा सरकार में मंत्री रहे नंद गोपाल नंदी को पार्टी विरोधी गतिविधि में निकाला गया। अब वे कांग्रेस से टिकट लेकर मैदान में आ डटे हैं।
अंदर ही अंदर उबल रहा गुस्सा
यूं तो कांग्रेस में खुलकर बगावती तेवर किसी भी नेता ने नहीं अपनाए हैं लेकिन अंदर ही अंदर नाराजगी खूब है।
शामली के विधायक पंकज मलिक मुजफ्फरनगर से अपने पिता और पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक को टिकट नहीं मिलने से नाराज हैं तो खुर्जा के विधायक बंशी सिंह पहाड़िया और विधायक दिलनवाज खान भी इसी वजह से नाराज हैं।
पूर्व मंत्री डॉ. अम्मार रिजवी, पूर्व केंद्रीय मंत्री रामलाल राही, प्रदेश कांग्रेस के महासचिव श्याम लाल पुजारी भी नाराज चल रहे हैं।
आप में नाराज नेताओं की फौज
नाराज होने वालों की बढ़ रही संख्या आम आदमी पार्टी में तो टिकट वितरण को लेकर नाराज होने वाले नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है। फर्रूखाबाद से मुकुल त्रिपाठी ने टिकट लौटा दिया।
पॉलीटिकल अफेयर कमेटी (पीएसी) के सदस्य एवं दो बार के सांसद रहे इलियास आजमी भी लखनऊ से टिकट न दिए जाने से नाराज हैं।
फैजाबाद सीट से इकबाल मुस्तफा ने नाराज होकर टिकट लौटा दिया तो जालौन सीट से अभिलाषा जाटव ने भी टिकट वापस कर दिया है।
मुरादाबाद सीट से खालिद परवेज का टिकट छिना तो वे विरोध के स्वर उगलने लगे हैं।
टिकट नहीं तो अपना दल भी अपना नहीं
टिकट बंटवारे से नाराज प्रदेश अध्यक्ष साजिद अली सहित कई पदाधिकारियों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है।
उन्होंने राष्ट्रीय महासचिव व प्रवक्ता अनुप्रिया पटेल पर तानाशाही रवैये का आरोप लगाया है।