आखिर क्यों 'जहरीली' होती जा रही है नेताओं की भाषा! ये हैं खास वजह
आधा चुनाव बीतने के बाद एकाएक बड़े नेताओं की हल्की भाषा हैरान करने वाली है। हालांकि बोलों में कड़वाहट सोची-समझी योजना का हिस्सा है, विरोधियों में बौखलाहट पैदा करने की रणनीति है या तीन चरणों के मतदान के रुझान पर स्वाभाविक प्रतिक्रिया, इसे लेकर लोगों की जुदा-जुदा राय हैं।
आमतौर पर यह माना जाता है कि खंडित जनादेश व चुनाव में हार की आशंका से बौखलाहट और अतिविश्वास से शब्दों में तीखापन या बड़बोलापन आ आता है।
यूं तो मेरठ की पहली चुनावी रैली से ही पीएम नरेंद्र मोदी ने विरोधी दलों को घेरने के लिए स्कैम (समाजवादी, कांग्रेस, अखिलेश, राहुल और मायावती) की नई परिभाषा दी। जवाब में अखिलेश यादव, राहुल गांधी और मायावती ने स्कैम के अपने-अपने तरीके से अर्थ बताए।
मोदी ने अखिलेश पर सीधा हमला बोला
पहले चरण से शुरू हुआ, एक-दूसरे पर हमलों का दौर तीसरे चरण की वोटिंग के साथ ही और तेज हो गया है। मोदी ने कन्नौज में अखिलेश पर सीधा हमला करते हुए पिता मुलायम सिंह की हत्या की साजिश रचने वालों से समझौता करने का आरोप लगाया।
फतेहपुर रैली में तो कब्रिस्तान, श्मसान, रमजान, दिवाली से जुड़ा भाषण वोटों के ध्रुवीकरण की भूमिका तैयार करने वाला रहा। अखिलेश ने भी उसी अंदाज में जवाब देते हुए गुजरात के गधों के प्रचार का मुद्दा उठा दिया।
वाराणसी को 24 घंटे बिजली पर भी उन्होंने मोदी से गंगा मैया की कसम खाकर सही बोलने के लिए कहा। मोदी बुंलेदखंड गए तो बसपा की नई परिभाषा बता आए। कहा बसपा अब बहनजी संपत्ति पार्टी बन गई है। इसका जवाब देने में मायावती ने भी देरी नहीं लगाई। उन्होंने नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को ‘निगेटिल दलित मैन’ बताया।
वोट बैंक को सहेजने की कोशिश
माना जा रहा है कि भाषा में कड़वाहट वोट बैंक को सहेजने और बढ़ाने की कोशिश का हिस्सा है। अभी तक 209 सीटों पर चुनाव हो चुका हैं, 194 विधानसभा सीटों पर मतदान बाकी है। सभी दलों की चिंता अगले चार चरणों में अधिक से अधिक सीट हासिल करने की है। वे ऐसे तीखे शब्द बोल रहे हैं जो उनका वोट बैंक पसंद करता है।
मोदी ने जब कहा कि रमजान में बिजली मिलती है तो दिवाली पर भी मिलनी चाहिए, ईद पर मिलती है तो होली में भी मिलनी चाहिए। एक तरह से उन्होंने बिजली को लेकर प्रदेश सरकार के मुस्लिम तुष्टिकरण पर वार किया।
उनका वोट बैंक यही चाहता है और वोटों के ध्रुवीकरण का लाभ भाजपा को मिलता है। यह स्थिति सपा-कांग्रेस व बसपा के साथ भी है। मोदी ने बसपा को बहनजी संपत्ति पार्टी बताया तो मायावती ने तत्काल दलित विरोध साबित करने के लिए उनका नया नामकरण कर दिया।
सपा का वोटर मोदी पर तीखे हमले चाहता है, इसलिए अखिलेश यादव ने अमिताभ बच्चन से गुजरात में गधों का प्रचार न करने का आग्रह किया।
बहुमत से दूर रहने का अंदेशा तो नहीं
राजनीति के जानकार मानते हैं कि जीत या बहुमत से दूर रहने का अंदेशा भी सियासी दलों के नेताओं में बौखलाहट पैदा करता है। इसका पहला असर उनकी भाषा पर पड़ता है। ऐसे में तीखे व कड़वे, लेकिन हल्के बयान सामने आते हैं।
तीन चरणों का चुनाव हो चुका है। एक सवाल यह उठ रहा है कि क्या सियासी दल 209 सीटों के चुनाव में 105 सीट जीतने के प्रति आश्वस्त नहीं हैं? ऐसी स्थिति में भी वाणी के संयम खोने का खतरा रहता है।
कही ओवर कॉन्फिडेंस तो नहीं
कई बार राजनीतिक परिस्थितियों को भांपने में चूक होती है। चुनावी हालात को अपने अनुकूल मान लेने से अतिविश्वास पैदा हो जाता है। ऐसी स्थिति में भी शब्दों के तीर, कमान से छूटने लगते हैं।
प्रदेश में सत्ता के तीनों प्रमुख दावेदार सपा-कांग्रेस गठबंधन, भाजपा और बसपा के नेता अपनी सरकार बनने का दावा कर रहे हैं। सभी कह रहे हैं कि तीन सौ के आसपास सीट जीतेंगे। राजनीति के जानकार मानते हैं कि ये ओवर कॉन्फिडेंस है। ऐसे दावे मतदान के आखिरी चरण तक होंगे।
नेताओं की भाषा बता रही, अभी परिपक्व नहीं है लोकतंत्र
लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एसके द्विवेदी कहते हैं कि चुनावी सभाओं में नेताओं की भाषा का स्तर उनके पदों की गरिमा के अनुरूप नहीं है। उनके बोल बता रहे हैं कि अभी लोकतंत्र परिपक्व नहीं है।
डॉ. द्विवेदी कहते हैं कि नरेंद्र मोदी हों, अखिलेश यादव या मायावती, वे अपने दलों के नेता के साथ ही प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री भी हैं। उनसे गरिमापूर्ण भाषा की अपेक्षा की जाती है। प्रधानमंत्री अपने भाषण में रमजान और दिवाली का नाम लेने के बजाय यह कह सकते थे कि सभी पर्वों पर एक समान बिजली मिलनी चाहिए। इसी तरह मुख्यमंत्री को गुजरात के गधों का जिक्र नहीं करना चाहिए था।
लगता है कि ईद और होली का जिक्र करके भाजपा हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती है। इसके विपरीत सपा, बसपा मुस्लिम, पिछड़े और दलित वोट चाहते हैं। तीनों दल उन मतदाताओं को टारगेट कर रहे हैं जो आमतौर पर उनके पक्ष में रहते हैं।
प्रो. द्विवेदी कहते हैं सियासी दलों का मंतव्य कुछ भी हो, उन्हें भाषा का स्तर बनाए रखना चाहिए। स्तरहीन भाषा जनतांत्रिक परिपक्वता का संकेत नहीं है। संसद के भीतर और बाहर जिस तरह का आचरण होने लगा हैं, उस पर सभी को विचार करना चाहिए। सभी को भाषा की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।