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Lucknow News: दांतों को प्राकृतिक बनाए रखेगी लेजर थेरेपी
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लखनऊ। लेजर थेरेपी दांतों को प्राकृतिक बनाए रखने में भी सहायक हो सकती है। नियमित व व्यवस्थित रूप से इसकी चिकित्सा से दांतों का भीतरी हिस्सा (डेंटल पल्प) दोबारा उग सकता है। किंग जॉर्ज चिकित्सा विवि के दंत संकाय में इसका सफल ट्रायल हुआ है। इस अध्ययन को बर्मिंघम विश्वविद्यालय में पिछले महीने हुई कांफ्रेंस में मान्यता देते हुए तीसरा स्थान देकर सम्मानित किया गया।
केजीएमयू दंत संकाय की डॉ. प्रज्ञा पांडेय ने बताया कि दांत को मजबूत रखने में भीतरी हिस्सा अहम भूमिका निभाता है। इसे डेंटल पल्प या ऊतक बोला जाता है। बचपन में एक बार दांत आने के बाद अगले ढाई से तीन साल तक उनकी जड़ें विकसित होती रहती हैं। इससे दांत मजबूत होते हैं। समस्या तब होती है जब चोट लगने से दांत के भीतरी भाग में संक्रमण हो जाता है। दवाओं, अन्य माध्यम से इस संक्रमण को समाप्त कर दिया जाता है। परंपरागत तरीके से पल्प को दोबारा उगाने का प्रयास किया जाता है। इसके मुकाबले प्राकृतिक दांत कहीं ज्यादा मजबूत होता है। इसे ध्यान रखते हुए लो लेवल लेजर थेरेपी का ट्रायल किया गया। इसमें सफलता मिली है।
डॉ. प्रज्ञा पांडेय ने बताया कि इस अध्ययन के दौरान कुल 28 मरीज शामिल थे। इनमें से 14 पर लेजर का ट्रायल किया और 14 में परंपरागत तरीके से पल्प रीजनरेशन करने का प्रयास किया गया। लेजर वाले मरीजों को 14 दिन तक हर 48 घंटे के दौरान कुछ समय के लिए लेजर का प्रभाव डाला गया। 21वें दिन दोनों समूह के मरीजों में खून का सैंपल लिया गया। इसमें देखा गया कि लेजर वाले मरीजों में डेंटल पल्प रीजनरेशन के मार्कर 80 फीसदी तक ज्यादा थे।
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केजीएमयू दंत संकाय की डॉ. प्रज्ञा पांडेय ने बताया कि दांत को मजबूत रखने में भीतरी हिस्सा अहम भूमिका निभाता है। इसे डेंटल पल्प या ऊतक बोला जाता है। बचपन में एक बार दांत आने के बाद अगले ढाई से तीन साल तक उनकी जड़ें विकसित होती रहती हैं। इससे दांत मजबूत होते हैं। समस्या तब होती है जब चोट लगने से दांत के भीतरी भाग में संक्रमण हो जाता है। दवाओं, अन्य माध्यम से इस संक्रमण को समाप्त कर दिया जाता है। परंपरागत तरीके से पल्प को दोबारा उगाने का प्रयास किया जाता है। इसके मुकाबले प्राकृतिक दांत कहीं ज्यादा मजबूत होता है। इसे ध्यान रखते हुए लो लेवल लेजर थेरेपी का ट्रायल किया गया। इसमें सफलता मिली है।
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डॉ. प्रज्ञा पांडेय ने बताया कि इस अध्ययन के दौरान कुल 28 मरीज शामिल थे। इनमें से 14 पर लेजर का ट्रायल किया और 14 में परंपरागत तरीके से पल्प रीजनरेशन करने का प्रयास किया गया। लेजर वाले मरीजों को 14 दिन तक हर 48 घंटे के दौरान कुछ समय के लिए लेजर का प्रभाव डाला गया। 21वें दिन दोनों समूह के मरीजों में खून का सैंपल लिया गया। इसमें देखा गया कि लेजर वाले मरीजों में डेंटल पल्प रीजनरेशन के मार्कर 80 फीसदी तक ज्यादा थे।
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