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बंगलुरू की तर्ज पर मेट्रो के लिए भूमि अधिग्रहण
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 03 Aug 2013 10:36 PM IST
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जमीन लेंगे तो ऊंचाई देंगे। मेट्रो के लिए भूमि अधिग्रहण में बंगलुरू का यह फार्मूला लखनऊ में भी आजमाया जाएगा।
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इसके मुताबिक जिन लोगों की संपत्ति मेट्रो रूट के दायरे में आएगी या जितना भी ध्वस्तीकरण होगा, उसी सापेक्ष में ट्रांसफरेबल डवलपमेंट राइट (टीडीआर) का सर्टिफिकेट दिया जाएगा।
इसके आधार पर आने वाले समय में वह व्यक्ति अतिरिक्त एफएआर (ऊंचाई) का फायदा उठाएगा और उसको इसके बदले में प्राधिकरण में कोई धन नहीं जमा करना होगा।
इससे दोहरा फायदा होगा, पहला तो मुआवजे के तौर पर मोटी रकम सरकार को नहीं देनी पड़ेगी। दूसरा ऊंचाई का महंगा लाभ देकर जिस व्यक्ति की भूमि अर्जित की जाएगी उसको भी खासा लाभ होगा।
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मेट्रो रेल संचालन और निर्माण के लिए एलएमआरसी को करीब 75 हेक्टेयर जमीन की जरूरत पड़ेगी। इसमें स्थाई और अस्थाई दोनों ही तरह की जमीन की जरूरत होगी। यह भूमि सरकारी और निजी दोनों ही क्षेत्रों से ली जाएगी।
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करीब 13 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण निजी क्षेत्र से करना पड़ेगा। दोनों ही कॉरिडोर के लिए अलग-अलग जमीन की जरूरत होगी।
स्थाई जरूरत के तौर पर नार्थ-साउथ कॉरिडोर में स्टेशन के लिए सरकार से 1.83 हेक्टेयर और प्राइवेट से 2.02 हेक्टेयर जमीन की जरूरत पड़ेगी।
रनिंग सेक्शन के लिए सरकार से 1.05 और प्राइवेट से 3.68 हेक्टेयर जमीन चाहिए होगी। सब स्टेशन और अन्य जरूरतों के लिए सरकार से 37.8 हेक्टेयर जमीन ली जाएगी।
कुल 48 हेक्टेयर जमीन इस कॉरिडोर के लिए एलएमआरसी लेगा। जबकि ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर के लिए स्थाई जरूरत के तौर पर स्टेशन के लिए 2.81 हेक्टेयर जमीन ली जाएगी। प्राइवेट क्षेत्र से इसमें 1.87 हेक्टेयर जमीन लेनी पड़ेगी।
रनिंग सेक्शन के लिए प्राइवेट क्षेत्र से .75 हेक्टेयर भूमि ली जाएगी। सब स्टेशन और अन्य जरूरतों के लिए 12.33 हेक्टेयर भूमि सरकार को देनी होगी।
अस्थाई तौर पर भी भूमि की जरूरत होगी। इसमें नार्थ-साउथ कॉरिडोर में स्टेशनों के लिए 2.94 हेक्टयेर सरकार से और 1.73 हेक्टेयर प्राइवेट क्षेत्र से भूमि की आवश्यकता होगी।
डिपो के लिए .73 हेक्टयेर सरकार से और .25 हेक्टेयर निजी क्षेत्र से जरूरत होगी। जबकि ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर में स्टेशनों के लिए 2.48 हेक्टेयर सरकार से 2.84 हेक्टयेर प्राइवेट क्षेत्र से लेने की जरूरत पड़ेगी।
मेट्रो सेल के चेयरमैन राजीव अग्रवाल का कहना है कि अधिकांश जगह हमें राह में पड़ने वाले धार्मिक स्थलों से दूर हैं। कहीं कोई समस्या आती भी है तो उससे उस समय निपटा जाएगा। इतना मैं जरूर कह सकता हूं कि, कोई भी धार्मिक स्थल मेट्रो निर्माण की चपेट में नहीं आएगा।