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लालजी टंडन: लखनऊ में जन्मे और यहीं ली आखिरी सांस, इस शहर से इतने गहरे थे संबंध
Tue, 21 Jul 2020 10:09 AM IST
प्राची प्रियम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: प्राची प्रियम
Updated Tue, 21 Jul 2020 10:09 AM IST
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लालजी टंडन
- फोटो : Amar Ujala
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मध्यप्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन के निधन की खबर से उत्तर प्रदेश और खासकर लखनऊ में शोक की लहर दौड़ पड़ी है। प्रदेश सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित कर दिया है, साथ ही मुख्यमंत्री योगी ने भी दुख जताया है।
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पहले बिहार और पिछले कुछ समय से मध्यप्रदेश की कमान संभाल रहे लालजी टंडन का लखनऊ से भी बेहद गहरा नाता रहा है। राजनीति के शुरूआती जीवन में ही लखनऊ से उनके गहरे संबंध जुड़ गए थे।
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आज उनके निधन पर मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि वो लखनऊ के प्राण थे। वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा है कि लालजी ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी।
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लखनऊ में हुआ था जन्म
लालजी टंडन का जन्म 12 अप्रैल 1935 को लखनऊ में हुआ था। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा-दीक्षा भी लखनऊ में ही हुई। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली थी।
... जब लखनऊ से नहीं लड़ना चाहते थे वाजपेयी, टंडन ने दिलाया था जीत का भरोसा
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ लोकसभा सीट से 1952, 1957 और 1962 में लगातार तीन चुनावों में हार गए थे, जिसके बाद 1991 में उन्होंने वहां से खड़े होने से मना कर दिया था। वाजपेयी अब लखनऊ से चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे।
इसपर लालजी टंडन ने उनसे इसकी वजह पूछी तो वाजपेयी ने ठहाका लगाते हुए कहा था कि अब भी कुछ बताने को बचा है क्या? इसके बाद टंडन ने ही उन्हें कहा कि लखनऊ को उनकी जरूरत है और चुनाव लड़ने को राजी कर लिया।
लालजी टंडन ने उन्हें भरोसा दिलाया कि लखनऊ अब उनके साथ है। वह सिर्फ नामांकन भरने के लिए आएं, बाकी चुनाव हम पर छोड़ दें। अटल जी तैयार हो गए और उस समय वह चुनाव जीते भी।
2009 में टंडन को सौंपी गई लखनऊ की कमान
टंडन 1996 से 2009 तक लगातार तीन बार विधायक का चुनाव जीते। 1997 में वह नगर विकास मंत्री रहे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीति से दूर होने के बाद साल 2009 में भाजपा ने लखनऊ लोकसभा सीट टंडन को ही सौंपी थी। उन्होंने यहां से चुनाव भी लड़ा।
पहले 1978 से 1984 तक और फिर 1990 से 96 तक लालजी टंडन दो बार यूपी विधानपरिषद के सदस्य रहे। 1991 में वह यूपी के मंत्री पद पर भी रहे।
यूपी की राजनीति में टंडन ने किए कई प्रयोग
लालजी टंडन को उत्तर प्रदेश की राजनीति में अलग अलग किस्म के प्रयोगों के लिए जाना जाता है। 90 के दशक में उत्तर प्रदेश में बनी भाजपा और बसपा की सरकार के पीछे के गठजोड़ में उनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है।
बताया जाता है कि बसपा प्रमुख मायावती लालजी टंडन को राखी बांधती थीं और टंडन ने ही उन्हें भाजपा का साथ देने के लिए मनाया था। दोनों के बीच भाई-बहन के संबंध थे, इसीलिए मायावती ने लालजी टंडन की बात मानकर भाजपा से गठबंधन किया था।
टंडन ने लखनऊ पर लिखी थी विवादित पुस्तक 'अनकहा लखनऊ'
लालजी टंडन ने अपनी पुस्तक 'अनकहा लखनऊ' में लखनऊ के बारे में ऐसी कई चीजें लिखीं हैं जिसे लेकर वो विवादों में फंसे रहे। इस पुस्तक में टंडन ने लखनऊ की संस्कृति पर लिखा था कि इसे जबरन 'नवाबी तहजीब का शहर' बनाने की कोशिशें की गईं।
उन्होंने लक्ष्मण टीले का उल्लेख करते हुए लिखा था कि लखनऊ में पहले एक गुफा थी, जिसपर मुस्लिम शासकों ने मस्जिद बनवा दी। इस तरह के तमाम तथ्यों से उनकी पुस्तक पर विवाद खड़े हुए थे।
टंडन बाद में भले ही बिहार और मध्यप्रदेश के राज्यपाल रहे, लेकिन लखनऊ से उनका नाता कभी कमजोर नहीं हुआ। उन्होंने भाजपा सरकार में अन्य राज्यों में अपनी भूमिका निभाई, लेकिन अंतिम समय में एक बार फिर अपने जन्मस्थान लौट आए। लखनऊ में ही सुबह 5:35 बजे टंडन ने आखिरी सांस ली।
पहले 1978 से 1984 तक और फिर 1990 से 96 तक लालजी टंडन दो बार यूपी विधानपरिषद के सदस्य रहे। 1991 में वह यूपी के मंत्री पद पर भी रहे।
यूपी की राजनीति में टंडन ने किए कई प्रयोग
लालजी टंडन को उत्तर प्रदेश की राजनीति में अलग अलग किस्म के प्रयोगों के लिए जाना जाता है। 90 के दशक में उत्तर प्रदेश में बनी भाजपा और बसपा की सरकार के पीछे के गठजोड़ में उनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है।
बताया जाता है कि बसपा प्रमुख मायावती लालजी टंडन को राखी बांधती थीं और टंडन ने ही उन्हें भाजपा का साथ देने के लिए मनाया था। दोनों के बीच भाई-बहन के संबंध थे, इसीलिए मायावती ने लालजी टंडन की बात मानकर भाजपा से गठबंधन किया था।
टंडन ने लखनऊ पर लिखी थी विवादित पुस्तक 'अनकहा लखनऊ'
लालजी टंडन ने अपनी पुस्तक 'अनकहा लखनऊ' में लखनऊ के बारे में ऐसी कई चीजें लिखीं हैं जिसे लेकर वो विवादों में फंसे रहे। इस पुस्तक में टंडन ने लखनऊ की संस्कृति पर लिखा था कि इसे जबरन 'नवाबी तहजीब का शहर' बनाने की कोशिशें की गईं।
उन्होंने लक्ष्मण टीले का उल्लेख करते हुए लिखा था कि लखनऊ में पहले एक गुफा थी, जिसपर मुस्लिम शासकों ने मस्जिद बनवा दी। इस तरह के तमाम तथ्यों से उनकी पुस्तक पर विवाद खड़े हुए थे।
टंडन बाद में भले ही बिहार और मध्यप्रदेश के राज्यपाल रहे, लेकिन लखनऊ से उनका नाता कभी कमजोर नहीं हुआ। उन्होंने भाजपा सरकार में अन्य राज्यों में अपनी भूमिका निभाई, लेकिन अंतिम समय में एक बार फिर अपने जन्मस्थान लौट आए। लखनऊ में ही सुबह 5:35 बजे टंडन ने आखिरी सांस ली।